बड़े ब्रांड के कपड़ों के पीछे का ये बड़ा सच जानकर उड़ जाएगे आपके होश…

एक नई रिसर्च के मुताबिक़ साउथ इंडिया में चल रहीं लगभग सभी धागे की फैक्टरियों में चाइल्ड लेबर से काम लिया जा रहा है. यानी इन फैक्टरियों में 14 साल से कम उम्र के बच्चे बहुतायत में काम कर रहे हैं. इंडिया कमिटी ऑफ़ द नीदरलैंड्स नाम की एक मानवाधिकारों वाली संस्था ने ये सर्वे किया और पता चला कि लगभग 90 परसेंट फैक्टरियों में बच्चे काम कर रहे हैं. अब सवाल के घेरे में वो बड़े ब्रांड आ रहे हैं जो इन मिलों से बिना मानवाधिकारों की चिंता किया लगातार धागे खरीद रहे हैं. ये वही बड़े ब्रांड हैं जिनके कपड़े हमारे आस-पास के मॉल और शोरूम में खूब बिकते हैं.

धनबाद

रिसर्च के दौरान पता चला कि लगभग इन 750 फैक्टरियों में काम करने वाली लड़कियों में अधिकतर 14 और 18 साल की उम्र के बीच की हैं. और हर 5 में से एक वर्कर अंडरएज है. यानी 14 साल से कम उम्र के बच्चे हैं.

इन बच्चों से केवल बैलों की तरह मेहनत ही नहीं कराई जाती. इनके पैसे रोक लिए जाते हैं. कई बार इन्हें फैक्टरियों के हॉस्टल में लॉक कर दिया जाता है. कई बच्चों का ये भी कहना है कि उनके साथ यौन उत्पीड़न भी हुआ है.

तमिलनाडु स्पिनिंग मिल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट की वेंकटचलम से जब बात की गई, तो मालूम पड़ा कि उन्हें ऐसे किसी सर्वे की जानकारी नहीं है. जब ये पूछा गया कि फैक्टरियों में बच्चों से काम कराने के बारे में क्या कहेंगे, तो उन्होंने कहा ये अब नहीं होता. पहले होता था. अब ये चैप्टर ख़तम हो चुका है.

आज से ही नहीं, सैकड़ों सालों से इंडिया दुनिया के सबसे बड़े यार्न यानी धागे का एक्सपोर्टर है. कपड़े बनाने वाला भी. अकेले तमिलनाडु में ही डेढ़ हजार से ज्यादा मिलें हैं. जिनमें 2 से 4 लाख लोग नौकरी करते हैं. कपड़े रंगने, बुनने और सिलने की फैक्टरियों को सबसे ज्यादा मजदूर तमिलनाडु के गांवों से मिलते हैं. ये जब कपड़े बन जाते हैं तो देश भर के महंगे शोरूम्स में 10 गुना दामों पर बिकते हैं. ये सारे मजदूर गरीब और दलित परिवारों से होते हैं. पढ़े-लिखे नहीं होते. और इस बात का फायदा फैक्टरियों के मालिक उठाते हैं. दलित होने की वजह से इन्हें डराया जाता है, मां-बहन की गालियां दी जाती हैं. और यौन उत्पीड़न किया जाता है.

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रिसर्च के मुताबिक़ काम के घंटे खत्म होने के बाद भी मजदूरों को कंपनी के हॉस्टल में बंद कर रखा जाता है. बाहर नहीं निकलने दिया जाता. इतनी सारी मिलों में केवल 40 मिलें हैं जो सरकार से तय की गईं मिनिमम दहाड़ी देते हैं. और इन मिलों का स्टैण्डर्ड वर्किंग ऑवर हफ्ते में 60 घंटे है. यानी अगर एक दिन की छुट्टी मान ली जाए, तो हर दिन तकरीबन 10 घंटे मजदूरी करने के बाद भी उन्हें घर जाने की छुट्टी नहीं मिलती. और लड़कियां हों, तो ये टॉर्चर बढ़ जाता है.

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“मुझसे 12 घंटे लगातार काम कराया. खाना खाने या पेशाब जाने का भी समय नहीं दिया. मेरी आंखे जलती थीं, बुखार था, टांगें दर्द करती थीं और पेट ख़राब हो गया था.”

क्या हम कभी कपड़े पहनते वक़्त सोचते हैं कि इसके बनने की पीछे बुखार और दर्द से कराहती एक बच्ची की ख़ुशी बिकी है? नहीं सोचते. और सोचें भी कैसे, हमें तो ये मालूम ही नहीं होता. लगातार पहले से ज्यादा पूंजीवाद की ओर बढ़ती इस दुनिया की यही नंगी सच्चाई है.

 
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