सरस्वती पूजन का पर्व है वसंत पंचमी

परंपरा से हमने जाना है कि हमारे यहां छ: ऋतुएं होती हैं। गीता में कृष्ण यह कहकर वसंत ऋतु को ऋतुराज कह जाते हैं कि ‘मैं ऋतुओं में वसंत हूं।” कहने का मतलब ये है कि वसंत सभी ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ ऋतु मानी जाती है। पौराणिक और धार्मिक महत्व से अलग वसंत प्रकृति का उत्सव है। सृजन और जीवन का उत्सव है। शायद इसीलिए इसे देवी सरस्वती के जन्म से भी जोड़ा जाता है। भारत में वसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त माना जाता है। अर्थात पंचांग देखे बिना ही कोई भी शुभ कार्य इस दिन प्रारंभ किए जा सकते हैं। ज्योतिष में पांचवी राशि के अधिष्ठाता भगवान सूर्यनारायण होते हैं। इसलिए वसंत पंचमी अज्ञान का नाश करके प्रकाश की ओर ले जाती है।

सूर्य के उत्तरायण होने के बाद वसंत पंचमी पहला उत्सव होता है। कह सकते हैं कि प्रकाश, ऊर्जा और सृजन के प्रतीक के तौर पर ही इसे देवी सरस्वती के पूजन से संबद्ध होना है। इसे पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और अन्य कई राज्यों में बड़े उन्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन स्त्रियां पीले वस्त्र पहनती हैं। प्राचीन भारत और नेपाल में पूरे साल को जिन छ: मौसमों में बांटा जाता है उनमें सबसे मनचाहा मौसम वसंत ही है। इस मौसम में फूल खिलने लगते हैं, खेतों में सरसों लहला उठती है, गेहूं पर बालियां आने लगती है, आमों के पेड़ पर बौर आने लगते हैं।
हर तरह रंग-बिरंग तितलियां मंडराने लगती है। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ मास शुक्ल पक्ष की पंचमी को वसंत पंचमी के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा की जाती है। इसके साथ ही विद्यार्थी देवी सरस्वती की पूजा करते हैं।
वसंत पतझड़ के तुरंत बाद आता है। शाखों पर कोंपले आने लगती है। नए पत्ते आते हैं, प्रकृति का कायांतरण होता है। कह सकते हैं कि इस ऋतु में प्रकृति अपने सर्वोत्कृष्ट रूप में होती है। इसी कारण वसंत ऋतु को ऋतुराज कहा जाता है।
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वसंत मतलब पीला
पीला रंग परंपरा से शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। वसंत ऋतु का संबंध भी पीले रंग से माना जाता है। इसी मौसम में सरसों में फूल आते हैं जिनका रंग पीला होता है। इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनते हैं, हल्दी और केसर का तिलक लगाया जाता है।
वसंत पंचमी का महत्व
वसंत प्रकृति का उत्सव है। माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पांचवी तिथि को वसंत पंचमी का उत्सव मनाया जाता है। इसी दिन से वसंत ऋतु की शुरुआत होती है। इस बार यह तिथि 22 जनवरी सोमवार से पड़ेगी।
जिस तरह मनुष्य के जीवन में यौवन आता है, उसी प्रकार वसंत इस सृष्टि का यौवन है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में ‘ऋतूनां कुसुमाकर:” कहकर ऋतुराज वसंत को अपनी विभूति माना है।
इस दिन विद्यार्थी, शिक्षक और अन्य सभी देवी सरस्वती का पूजन करते हैं। गरीब छात्रों को पुस्तक, पेन आदि विद्या उपयोगी वस्तु का दान किया जाता है। सरस्वती मंत्र का जाप कर कई जगहों पर सामूहिक सरस्वती पूजन का आयोजन भी किया जाता है।
शक्तियों का पुनर्जागरण होता है। वसंत पंचमी के दिन सबसे अधिक विवाह होते हैं। इसी दिन गृह-प्रलेश, वाहन-क्रय, भलन निर्माण की शुरुआत, विद्यारंभ, अनुबंध, आभूषण क्रय करना और अन्य कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य किए जाते हैं। वंसत पंचमी की पूजा सूर्योदय के बाद और दिन के मध्य भाग से पहले की जाती है। इस समय को पूर्वाह्न भी किया जाता है।
इस संबंध में एक कथा प्रचलित है। जब ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु की आज्ञा से सृष्टि की रचना की तब चारों और शांति ही शांति थी। किसी भी प्रकार की कोई ध्लनि नहीं थी। विष्णु और ब्रह्मा दोनों को ही ये रचना कुछ अधूरी प्रतीत हुई।
उस समय ब्रह्मा ने अपने कमंडल से पृथ्वी पर जल छिड़का। जल छिड़कने के बाद वृक्षों के बीच एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। जिन्हें हम देवी सरस्वती कहते हैं। सरस्वती के 4 हाथ हैं। एक हाथ में वीणा और दूसरा हाथ वर मुद्रा में है। बाकी दोनों हाथों में पुस्तक और माला है।
ब्रह्मा के अनुरोध पर जैसे ही देवी सरस्वती ने वीणा बजाई सारे संसार को वाणी मिली। इसी कारण ब्रह्मा ने सरस्वती को वाणी कहा। ये सब वसंच पंचमी के दिन ही हुआ। कहा जा सकता है कि वसंत पंचमी देवी सरस्वती की उत्पत्ति का दिन है। सरस्वती प्रतीक के तौर पर विद्या, बुद्धि, कला की देवी है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती का पूजन माघ शुक्ल पंचमी को किया था, तब से वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन की परंपरा का प्रचलन में आई। आज भारत में देवी सरस्वती की आराधना बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादिनी और वाग्देवी सहित कई नामों से की जाती है।
वसंत पंचमी की मान्यताएं
1. माघ मास को भगवान विष्णु का माह बताया जाता है।
2. शुक्ल पक्ष में चंद्रमा प्रबल होता है।
3. गुप्त नवरात्रि का समय है। सिद्धि और साधना के लिए उत्तम समय।
4. उत्तरायण, सूर्य इन दिनों पृथ्वी के सबसे निकट होते हैं।
5. वसंत ऋतु को सृष्टि का यौवन कहा जाता है।
6. ब्रह्मपुराण के अनुसार देवी सरस्वती इस दिन ब्रह्माजी के मानस से अवतीर्ण हुई थी।





