दिल्ली के सरकारी स्कूलों के छात्र-छात्राएं हो रहे हैं गंभीर बीमारी का शिकार

नई दिल्ली। निजी स्कूलों के बच्चों में मोटापे की बीमारी बढ़ रही है। वहीं दिल्ली के स्वास्थ्य सेवाएं महानिदेशालय द्वारा कराई गई स्क्रीनिंग में यह बात सामने आई है कि दिल्ली सरकार के स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 42 फीसद छात्र व 40 फीसद छात्राओं का वजन सामान्य से कम है। भरपूर पोषण न मिलने के कारण वे कुपोषित हैं। वहीं दिल्ली सरकार, करोड़ों रुपये का विज्ञापन कर राज्य के सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के बड़े-बड़े दावे करती है।दिल्ली के सरकारी स्कूलों के छात्र-छात्राएं हो रहे हैं गंभीर बीमारी का शिकार

खास बात यह कि कक्षा आठ तक के छोटे बच्चों व नौवीं से 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों में कुपोषण का दर एक समान है। कुपोषण दूर करने के लिए स्कूलों में छोटे बच्चों को मिड-डे मिल उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन चिंताजनक बात यह है कि कुपोषण से पीड़ित बड़े बच्चों की सुध नहीं ली जाती। एक रिपोर्ट के अनुसार, महानिदेशालय ने स्कूल स्वास्थ्य योजना के तहत 2017-18 में दिल्ली सरकार के 400 स्कूलों के 3.50 लाख बच्चों के स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग कराई थी।

इस दौरान बच्चों का वजन व बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआइ) की जांच की गई। बच्चों को दो श्रेणियों में विभाजित कर यह स्क्रीनिंग की गई। पहले श्रेणी में कक्षा आठ तक व दूसरे श्रेणी में कक्षा नौ से 12वीं तक के छात्र-छात्राओं को शामिल किया गया। कक्षा आठ तक के करीब 42 फीसद छात्र व 40 फीसद छात्राओं का वजन सामान्य से कम पाया गया। कक्षा नौ से 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले भी करीब 42 फीसद छात्र व 40 फीसद छात्राओं का वजन व लंबाई सामान्य से कम थी।

महानिदेशालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि वजन कम होने का कारण कुपोषण है। खानपान में भरपूर पोषाहार (कैलोरी) नहीं मिल पाने से शरीर का विकास प्रभावित होता है। इसलिए स्कूलों में मिड-डे मिल दिया जाता है, ताकि कुपोषण की समस्या दूर हो सके। मिड-डे मिल के साथ-साथ कई जगहों पर कुछ पूरक पोषाहार का भी प्रावधान है। बहरहाल स्कूलों में आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को ही दोपहर का भोजन (मिड-डे मिल) दिया जाता है। कक्षा नौ से 12वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को यह सुविधा उपलब्ध कराने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में स्कूल स्वास्थ्य योजना के आंकड़े गंभीर समस्या की ओर इशारा कर रहे हैं।

मिड-डे मिल में बच्चों को नहीं मिल पा रहा पोषक तत्व

आंकड़े बताते हैं कि आठवीं कक्षा तक के जिन बच्चों को मिड-डे मिल उपलब्ध कराया जाता है, उनमें भी कुपोषण का दर कम नहीं है। ऐसे में स्कूलों में बच्चों को परोसे जाने वाले वाले मिड-डे मिल की पोषकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अधिकारी कहते हैं कि मिड-डे मिल ऐसा होना चाहिए कि एक तिहाई कैलोरी की जरूरत पूरी हो सके। महानिदेशालय के अनुसार, जो छात्र कुपोषित पाए जाते हैं, उनके स्वास्थ्य की जानकारी व उनके खानपान पर विशेष ध्यान देने की सलाह परिजनों को दी जाती है।

दिल्ली सरकार के स्कूलों में 16 लाख से अधिक बच्चे

दिल्ली सरकार के 1000 से अधिक स्कूल हैं। उनमें 16 लाख से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। हर साल मात्र 300-400 स्कूलों के बच्चों की ही स्क्रीनिंग संभव हो पाती है। इस लिहाज से देखें तो दिल्ली में बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषित हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में पांच साल से कम उम्र वाले 27 फीसद बच्चे कुपोषित हैं। 

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