नोटबन्दी के 21 महीने बाद पुलिस ने यहां 500 और 1,000 रुपये के लगभग एक करोड़ रुपए के चलन से बाहर हो चुके (विमुद्रीकृत) नोटों के साथ तीन लोगों को पकड़ने में कामयाबी पाई है. पुलिस के मुताबिक गुजरात के सूरत में इस करंसी को वैध मुद्रा में बदलवाने की साजिश थी.

गुजरात के सूरत में नोटों बदलने की साजिश नाकाम

पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ बहुगुणा ने मीडिया को बताया कि मुखबिर से मिली एक गोपनीय सूचना के आधार पर तीन इमली पुल के पास गुरूवार देर रात पकड़े गए लोगों की पहचान हबीब खान, सैयद इमरान और सैयद शोएब के रूप में हुई है. इनमें से दो आरोपी महाराष्ट्र से ताल्लुक रखते हैं, जबकि एक गुजरात का रहने वाला है.

उन्होंने बताया कि तीनों आरोपियों के कब्जे से 1,000-1,000 रुपये के 7,283 बन्द नोट और 500-500 रुपये के 5,436 बन्द नोट बरामद किये गये हैं. बंद नोटों की खेप महाराष्ट्र के औरंगाबाद से गुजरात के सूरत ले जाई जा रही थी. वहां इसे कमीशन के आधार पर वैध मुद्रा से बदलवाने की साजिश रची गई थी. मामले में विस्तृत जांच जारी है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर 2016 को 500 और 1,000 रुपये के उस समय तक प्रचलित नोट बंद किए जाने की घोषणा की थी. एक अनुमान के अनुसार देश में जिन लोगों ने काला धन जुटाया उनमें से ज्यादातर ने इसे जमीन-जायदाद और जेवर-गहनों की शक्ल में रखा. केवल 20 प्रतिशत लोगों ने इसे कैश में रखा था. देश में जितनी करंसी चलन में थी, उसका 80 फीसदी हिस्सा नोटबंदी से बेकार हो गया. भारत की 11.8 प्रतिशत इकॉनमी कैश पर चलती है. भारत का ज्यादातर व्यापार और खर्च बड़े नोटों में ही होता है. इस लिए नोटों को बदलने के लिए लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

बता दें कि नकद अर्थव्यवस्था में दो किस्म की नकदी होती है. एक वो जिसके बारे में पता होता है या घोषित होती है और दूसरी वो जो अनअकाउंटेड होती है. नकदी केवल तभी कानूनी बन सकती है जब या तो टैक्स खाते में उसका लेखाजोखा हो या बैंक खाते में. नोट बंदी को इतना समय बीत जाने के बाद भी बार-बार इस प्रकार के मामले सामने आना बताते हैं कि अभी भी पुराने नोट पूरी तरह से हट नहीं पाए हैं और इनको बदलने का खेल अभी भी जारी है.