UK दौरे पर रहे नीति आयोग उपाध्यक्ष ने विद्यालयी शिक्षा उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षाविदों उच्चाधिकारियों से मुलाकात की

 उत्तराखंड राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू करने के लिए कितनी गंभीरता से तैयारी कर रहा है, केंद्र सरकार निगाह बनाए हुए है। राज्य की भाजपा सरकार नई शिक्षा नीति को लेकर राज्य में गंभीरता से प्रयास किए जाने का दावा कर रही है। इन दावों को परखा गया। बीती नौ अक्टूबर को उत्तराखंड दौरे पर रहे नीति आयोग उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने विद्यालयी शिक्षा, उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षाविदों, उच्चाधिकारियों के साथ खास मुलाकात की।

वार्ता के दौरान विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि और आला अधिकारी शिक्षा के क्षेत्र में ज्यादा अनुदान की मांग पर जोर देते रहे, लेकिन राजीव कुमार नई शिक्षा नीति को लेकर की जा रही तैयारी का जायजा लेते रहे। सिर्फ कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो एनके जोशी ने ही कहा कि अगले साल से नई नीति लागू कर दी जाएगी। एचएनबी केंद्रीय गढ़वाल विश्वविद्यालय ने भी यही भरोसा दिलाया। अन्य विश्वविद्यालयों ने मांगें रखीं, तैयारी नहीं बताई।

विपक्ष के दांव पर कैबिनेट का पलटवार

चुनावी साल में सरकारी माध्यमिक विद्यालयों से लेकर डिग्री कालेजों के छात्र-छात्राओं को मुफ्त टैबलेट बंटेंगे तो कांग्रेस का चिंतित होना स्वाभाविक है। ढाई लाख से ज्यादा छात्र-छात्राओं में 18 वर्ष और इससे ऊपर आयु के छात्र-छात्राओं की अच्छी तादाद है। डिग्री कालेजों के एक लाख पांच हजार युवाओं और 10वीं व 12वीं के एक लाख 59 हजार से ज्यादा छात्र-छात्राओं को टैबलेट दिए जाएंगे। इधर सरकार ने मुफ्त टैबलेट देने की घोषणा की, उधर कांग्रेस भी चौकन्नी हो गई। पार्टी ने मुफ्त टैबलेट देने की गुपचुप तैयारी पर हमला बोल दिया। टैबलेट खरीद में पारदर्शिता को लेकर विपक्षी दल ने सवाल खड़े कर दिए। यही दांव काम कर गया। सरकार चुनावी साल में पारदर्शिता को लेकर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती। लिहाजा टैबलेट खरीद की कार्ययोजना को ही कैबिनेट में रख दिया गया। कैबिनेट ने इसे मंजूर कर दिया। पहली बार कैबिनेट में ऐसा प्रस्ताव रखा गया।

घोषणा के सहारे घिसट रहा सैनिक स्कूल

रुद्रप्रयाग जिले के जखोली में सैनिक स्कूल खोलने की सिर्फ घोषणा कर ही श्रेय बटोरने में सियासतदां पीछे नहीं रहे। हालत ये है कि श्रेय की इस होड़ के बावजूद सैनिक स्कूल सिर्फ सपना बनकर रह गया है। दरअसल सैनिक स्कूल को लेकर जब घोषणा की गई तो यह भी दर्शाया गया कि केंद्र से तुरंत धन की व्यवस्था भी करा ली जाएगी। यह अहसास भी दिलाया गया कि केंद्र सरकार इस घोषणा को लपकने को तैयार है। हकीकत में मामला उलट गया। राज्य सरकार ने इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कर केंद्र को भिजवाया। केंद्र सरकार ने स्कूल के निर्माण को बजट उपलब्ध कराने में असमर्थता जाहिर कर दी। यह मामला राज्य सरकार की गले की फांस बना हुआ है। एक सरकार गुजर गई और दूसरी का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है, लेकिन सैनिक स्कूल नहीं बन पाया। अब राज्य सरकार खुद डीपीआर को मंजूरी दिलाएगी।

शिक्षक सधे तो फिर सब सध जाए

प्रदेश में एक ही स्थान पर चल रहे सरकारी विद्यालयों के एकीकरण का मसला बुरी तरह उलझ गया है। यह उलझन प्रशासनिक नहीं, बल्कि शिक्षकों के समझाने-बुझाने और बीच का रास्ता निकालने से ही सुलझनी है। मुख्यमंत्री ने बीते दिनों शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में विद्यालयों के एकीकरण के लिए टास्क फोर्स का गठन किया। टास्क फोर्स को अब 1500 स्थानों पर चल रहे इन 3000 से अधिक विद्यालयों को एकीकृत करने की चुनौती से जूझना है। एकीकरण में अब तक पेच प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षकों के संगठनों की वजह से है। उनकी समस्याओं का समाधान होना आवश्यक है। एकीकरण होने से सरकारी विद्यालयों की शैक्षिक प्रशासनिक व्यवस्था सुधरेगी भी और उसे बेहतर भी बनाया जा सकता है। इस मुद्दे को सुलझाने के लिए नया सुझाव शिक्षकों के लिए आवासीय भवन बनाने का भी आया है। सुझाव तो अच्छा है, पर यह समाधान नहीं है।

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