राजस्थान में तीसरी ताकत बनने की कोशिश कर रही मायावती, SPI मिला सकती हैं हाथ

राजस्थान भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई के लिए जाना जाता रहा है। यहां जनता ने कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा पर अपना विश्वास जताया है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बाहर अपना आधार बनाने की कोशिश में जुटी बसपा यहां तीसरी ताकत बनने की कोशिश कर रही है। इसके लिए वह यहां की कुछ अन्य छोटी पार्टियों को साथ लेने की कोशिश कर रही है। आज रविवार को बसपा और सीपीआई के नेताओं के साथ बैठक होनी है। बैठक में दोनों के साथ आकर चुनाव में उतरने की रणनीति पर सहमती बन सकती है। राजस्थान में तीसरी ताकत बनने की कोशिश कर रही मायावती, SPI मिला सकती हैं हाथ

पिछले विधानसभा चुनाव 2013 में बसपा ने राजस्थान की 195 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारा था। उसे कोई बड़ी सफलता नहीं मिली थी, लेकिन उसे दस लाख से भी ज्यादा (3.4%) वोट मिले थे. उसके पूर्व यानी 2008 में बसपा को कुल वोटों का लगभग 7.5% वोट मिला था।
उत्तर प्रदेश से सटे क्षेत्रों में बसपा ने अपनी ठीक-ठीक उपस्थिति दर्ज कराई थी। ऐसे में अगर उसे कुछ अन्य क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन मिल जाता है तो वह यहां अपनी मजबूत जमीन बनाने की बात सोच सकती है। यही कारण है कि बसपा नेता छत्तीसगढ़ की तर्ज पर राजस्थान में भी सीपीआई और अन्य पार्टियों के साथ आने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। शनिवार 27 अक्टूबर को दिल्ली में सीपीआई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी। इस बैठक में पार्टी ने आम सहमती से बसपा व अन्य के साथ सहयोग करने पर अपनी मुहर लगा दी है। रविवार की बातचीत के बाद इस पर अंतिम मुहर लगाई जा सकती है।

सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान ने अमर उजाला से कहा कि राजस्थान लोकतांत्रिक मोर्चा में सात दल हैं। इसमें सीपीआई, सीपीआई (एम), एनसीपी, आरएलडी प्रमुख हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौडा इसकी एक बैठक भी ले चुके हैं।

अगर छत्तीसगढ़ की तरह राजस्थान में भी बसपा उनके साथ आने पर सहमत हो जाती है तो वे यहां एक तीसरा विकल्प बन सकते हैं। वे आम आदमी पार्टी से भी बातचीत कर रहे हैं। गठबंधन का नेतृत्व अमराराम के हाथों में है जो सीपीएम से विधायक रह चुके हैं। सांगांनेर से विधायक भाजपा के बागी नेता घनश्याम तिवाड़ी ने भी इस गठबंधन के साथ हाथ मिलाने की कोशिश की थी। लेकिन आरएसएस की पृष्ठभूमि के कारण सीपीआई ने इसका कड़ा विरोध किया जिसके कारण वे इस गठबंधन का हिस्सा नहीं बन सके। 

राजस्थान में बसपा अपना कितना असर छोड़ पाएगी, इस सवाल पर राज्य के वरिष्ठ पत्रकार अजय गुप्ता कहते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार की तरह राजस्थान में दलित आन्दोलन मजबूत नहीं हो पाया है। यहां की राजनीति स्थानीय कारणों और स्थानीय जातीय समीकरणों पर ज्यादा निर्भर करता है। यही कारण है कि बसपा यहां विशेष असर छोड़ने में अब तक नाकाम साबित हुई है।

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