राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद माया की पहली रैली, 70 विधानसभा सीटों पर फोकस
मेरठ. राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद बीएसपी सुप्रीमों मायावती सोमवार को एक रैली कर रही है। सुबह 11 बजे से इस रैली की शुरुआत होगी। इस रैली का मकसद कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाकर विरोधियों को ताकत का अहसास कराना है। इसके साथ खिसकते जनाधार की बात करने वाले लोगों को मुंहतोड़ जवाब भी देना है।

70 विधानसभा सीटों पर फोकस
-बीएसपी की तरफ से दावा है कि हर विधानसभा से 15 हजार कार्यकर्ता इस रैली में पहुंचेंगे। कार्यक्रम स्थल पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए है। मेटल डिटेक्टर से होकर कार्यकर्ता सम्मेलन स्थल पर पहुंच सकेंगे।
– मेरठ रैली में मेरठ, सहारनपुर और मुरादाबाद मंडल की 70 विधानसभा सीटों पर फोकस करते हुए रैली होगी। बीएसपी का मकसद है कि इस रैली में जहां दलित उत्पीड़न के विरोध में इस समाज की भागीदारी बढ़े। वहीं दलित-मुस्लिम एकता का संदेश देने के लिए अल्पसंख्यकों की भी बड़ी मौजूदगी जरूर हो। इसी के साथ पिछड़ों के साथ होने का संदेश पूरे सूबे में जाए।
माया सम्मेलन में उठा सकती है ये मुद्दे
– बीएसपी सुप्रीमो सहारनपुर मुद्दे को सम्मेलन में प्रमुखता से उठाकर बीजेपी पर अपना सीधा निशाना साध सकती हैं। सहारनपुर के दलितों की बात राज्यसभा में उठाने की अनुमति न मिलने पर ही उन्होंने अपना इस्तीफा राज्य सभा से दिया था।
– बीजेपी के किसान ऋण माफी, बढ़ते अपराध जैसे मुद्दों को भी बीएसपी अपना मुद्दा बनाने की तैयारी में है। इस कार्यकर्ता सम्मेलन के जरिए कार्यकर्ताओं से अपील की जाएगी कि वह निकाय चुनाव में भी अपनी पूरी भागीदारी के साथ जुट जाए। बीएसपी इस बार निकाय चुनावों में अपनी जीत दर्ज कर आगे बढ़ना चाहती है। इसलिए पूरा फोकस अभी निकाय चुनाव पर रखा जाएगा।
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पार्टी में बड़े चेहरों की है कमी
-पार्टी छोड़कर जाने या पार्टी से निष्कासित करने के मामले में पार्टी या संबंधित नेता जो भी कहते हों, लेकिन इसे लेकर अन्य लोगों के अपने तर्क होते हैं। पार्टी में अब ऐसे नामों और चेहरों की साफ कमी दिखेगी, जो अपने दम पर भीड़ और वोट बटोर लेते थे।
-इलाहाबाद से 4 बार जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं केशरी देवी पटेल और करछना विधानसभा सीट जीतने वाले दीपक पटेल, राष्ट्रीय महासचिव इंद्रजीत सरोज, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य, विक्रमजीत मौर्य, बाबू सिंह कुशवाहा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री नटवर सिंह, अब्दुल मन्नान और उनके भाई अब्दुल हन्नान, जिला उन्नाव की विधानसभा क्षेत्र मोहान से रहे पूर्व विधायक राधेलाल रावत, पूर्व मंत्री योगराज सिंह, विधायक अमरपाल, देवरिया के बसपा नेता संजय भारती, ब्रजेश पाठक, आरके चौधरी, राज बहादुर और जंग बहादुर, हाथरस से बसपा विधायक गेंदालाल चौधरी जैसे अनगिनत नाम है जो अब पार्टी से बाहर हैं।
1989 में जीते दो सांसद
-1984 के लोकसभा चुनाव में भले कोई सफलता नहीं मिली थी, लेकिन 1989 में पहली बार दो सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचे थे। 13वीं लोकसभा (1999-2004) में पार्टी के सदस्यों की संख्या बढ़कर 14 तो 14वीं लोकसभा में 17 हो गई।
-पंद्रहवीं 15वीं लोकसभा में चार सीट बढ़कर यह संख्या 21 तक पहुंची। इसके बाद से पार्टी में गिरावट आनी भी शुरू हो गई। 16वीं लोकसभा में संसद से सूपड़ा साफ हो गया।
-विधानसभा की बात करें तो पार्टी ने वर्ष 1989 में पहली बार विधानसभा चुनावों में हिस्सा लिया, 13 विधायक चुने गए। वर्ष 1991 में चुनाव में पार्टी की एक सीट घटकर 12 हो गई, लेकिन वर्ष 1993 और 1996 में दोनों बार 67 विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे।
-वहीं 2002 में 98 और 2007 में 206 सदस्य विधानसभा में पहुंचे, लेकिन 2012 में सदस्यों की संख्या फिर 80 पर सिमट आई तो 2017 में यह संख्या मात्र 19 रह गई।
– 2007 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही जिस तरह से बसपा जनाधार वाले नेताओं से खाली होने लगी थी, उसका असर साफ-साफ 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों और 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में दिखा।
-यही कारण है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह से मायावती का ख्वाब सातवें आसमान पर था, वह चुनाव नतीजा आते-आते रसातल में पहुंच गया था। लोकसभा में एक भी सीट उन्हें नहीं मिला, जबकि वह प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहीं थी।
-राज्यसभा में 6 सीटें थीं, उसमें से भी एक उन्होंने इस्तीफा देकर गंवा दिया। लेकिन अब जिस तरह से पार्टी में पतझड़ का दौर चल रहा है, उससे तो लगता है कि बहुजन समाज पार्टी ‘अल्पजन समाज पार्टी’ की राह पर है। बड़े और पुराने नेता दल से बाहर हैं। ताजातरीन फैसलों में 5 नेताओं का निष्कासन है।
-देखा जाए तो कुछ नेता खुद पार्टी छोड़कर जा रहे हैं तो कुछ का निष्कासन किया जा रहा है। पार्टी से अलग होने का तरीका चाहे जो भी हो, पर आरोप वही रटा रटाया है।
-खुद छोड़कर जाने वालों पर पार्टी के खिलाफ गतिविधियों में संलिप्तता और अनुशासनहीनता होता है तो छोड़कर गए नेता आरोप मायावती को धन का पुजारी बताने से जुड़ा होता है। पार्टी भले ही यह कहती घूम रही हो कि किसी के जाने से फर्क नहीं पड़ने वाला, लेकिन विधानसभा या लोकसभा चुनाव के परिणामों से स्वतः इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी: एक्सपर्ट
-विशेषज्ञों का मानना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में 403 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 19 पर सिमटने और 2014 में राज्य की 80 सीटों में से शून्य पर पहुंचने के बाद भी बसपा को चुका हुआ समझना जल्दबाजी है। मगर विधानसभा चुनाव में 22.2 फीसद वोट मिला था।





