कोहिनूर: दुनिया के सबसे मशहूर हीरे की कहानी

लखनऊ। जनवरी 1739 में मुग़ल सल्तनत अब भी एशिया की सबसे अमीर सल्तनत थी. आधुनिक समय का पूरा भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के सारे इलाके तख्त-ए-ताऊस के ही अधीन थे. उस तख्त-ए-ताऊस के, जिसके एक छत्र के मोर की शान कोहे-ए-नूर बढ़ा रहा था. यह बात और है कि बीती आधी सदी इस सल्तनत के पतन की गवाह बन चुकी की. गुटबाज़ी, अंदरूनी सियासत और रंजिशों जैसे मुश्किलात के बावजूद मुग़ल सल्तनत अब भी काबुल से कर्नाटक तक की सबसे उपजाऊ ज़मीन पर शासन कर रही थी. खास बात है इस सल्तनत की पतनशील और नफासत भरी राजधानी दिल्ली में 20 लाख लोग रहते थे. लंदन और पेरिस दोनों की मिली-जुली आबादी से भी ज़्यादा आबादी वाली दिल्ली ओटोमनइस्तांबुल और शाही एडो (टोक्यो) के बीच का सबसे शानदार शहर था.

कोहिनूर: दुनिया के सबसे मशहूर हीरे की कहानी

इस विशाल साम्राज्य पर अशक्त सम्राट मुहम्मद शाह की हुकूमत थी – जिसे रंगीला भी कहा जाता है. वह सौंदर्यप्रेमी शासक था और इस कदर शौकीन था कि वह महिलाओं की पेशवाज़ और मोतियों जड़े जूते तक पहनता था. वह संगीत और चित्रकला का भी बड़ा संरक्षक था. वह मुहम्मद शाह ही था कि जिसने सितार और तबला को लोकसंगीत और लोकगायकों के यहां से लाकर अपने शाही दरबार तक पहुंचाया. उसने मुग़ल लघु चित्रकारी को एक बार फिर जिंदा किया. भले ही छोटे स्वरूप में, पर उसने कई उस्तादों को अपने दरबार की शान बनाया. इनमें निधा मल और चितरमन नाम प्रमुख हैं जिनके शानदार कामों के ज़रिए मुग़ल दरबारी जीवन के ग्रामीण पक्ष को उकेरा गया है. लाल और नारंगी जैसे चटख रंगों में डूबा हुआ होली का उत्सव, यमुना के तट पर चिड़ियों के शिकार के लिए जाते बादशाह का चित्र या फिर रंग महल और बागों में जाते मुग़ल बादशाह का चित्र उकेरा गया है.

यह सबसे महान तवायफों का भी युग था, जिनका सौंदर्य, रक्स, नफासत और नज़ाकत पूरे दक्षिण एशिया में मशहूर थी. ऐसी ही एक रक्कासा थी अदा बेगम. वह महफिलों में पूरी तरह नग्न होकर आती थीं, पर उनके शरीर पर कुछ इस तरह चतुराई से चित्रकारी की गई होती थी कि किसी को पता ही नहीं चलता कि उनके शरीर पर कपड़े हैं ही नहीं, ‘वो असल में पाजामा पहनने के बजाए उनकी शैली में अपनी टांगों पर खूबसूरत चित्रकारी करवाती थीं, कलाई बंद की जगह वह स्याही से फूलों और कलियों के ऐसे चित्र बनवाती थीं जैसे रोम के बेहतरीन कपड़ों में पाए जाते थे.’ उनकी प्रतिद्वंद्वी नूर बाई भी कम मशहूर नहीं थीं. वो इस क़दर मशहूर थीं कि हर रात मुग़ल उमराह के हाथियों से उसके कोठे की तंग गलियां जाम हो जाती थीं. बावजूद इसके सबसे वरिष्ठ उमराह को उसके कोठे में दाखिल होने के लिए, ‘एक बहुत बड़ी रकम देनी पड़ती थी. जो कोई इनकी अदाओं के चक्रव्यूह में फंसता वह उनकी मांगों के एक भंवर के ऐसे चंगुल में आ जाता कि उन्हें पूरा करने के लिए उसे अपने घर-बार से बेज़ार और बर्बाद होना पड़ता लेकिन उसे पाने की खुशी तभी तक रहती जब तक किसी के पास नूर के हुस्न पर लुटाने के लिए दौलत होती.’

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अपने शयनकक्ष में उसकी स्थिति चाहे जो हो, मोहम्मद शाह ‘रंगीला’ रणभूमि में निश्चित तौर पर योद्धा नहीं था. वह सत्ता में सिर्फ इसलिए बना हुआ था क्योंकि उसने शासन करने के किसी दिखावे से ही छुटकारा पा लिया था: सुबह वह हाथियों की लड़ाई देखता तो दोपहर में कलाकार, कलाबाज़ और अभिनेता उसका मनोरंजन करते. सियासत को उसने बेहद चतुराई से अपने सलाहकारों और दरबारियों के हवाले कर रखा था.

मोहम्मद शाह का दुर्भाग्य यही नहीं था कि उसे अपनी संप्रभुता अपने ही क्षेत्रीय क्षत्रपों से बांटनी पड़ी, बल्कि यह भी था कि उसका पश्चिमी पड़ोसी फारसी भाषी जंगी सरदार नादिर शाह था. एक गरीब चरवाहे के बेटे नादिर शाह ने फौज में एक छोटे से मुलाज़िम की तरह दाखिला लिया लेकिन जल्द ही अपने सैन्य कौशल के चलते वह सेना में एक के बाद एक बड़े ओहदे हासिल करता गया. वह उतना ही कठोर, क्रूर और रस विहीन था, जितना मोहम्मद शाह कोमल हृदय, कलात्मक और परिष्कृत सुरुचि वाला था.

मुहम्मद शाह से उलट नादिर बिलकुल भी कलाप्रेमी नहीं था. यह ज़रूर था कि उसे रत्नों की गहरी परख थी. वह भारत पर हमला ही सिर्फ इसलिए करना चाहता था कि वह भारतीय रत्नों से अपने खजाने को भर सके- भारतीय रत्नों के भंडार के बारे में उसने बहुत कुछ सुन रखा था. उसे यह भी इल्म था कि मुगलों की दिल्ली में रत्नों के भंडार का यह सैलाब अब रोके नहीं रुक रहा है.

नादिर शाह, जिसने डेढ़ लाख सिपाहियों की मदद से 10 लाख की सेना को हरा दिया

नादिर शाह की पेंटिंग

10 मई 1738 को नादिर शाह ने उत्तरी अफगानिस्तान पर चढ़ाई शुरू कर दी. तीन महीने के भीतर ही उसने दिल्ली से पचहत्तर मील उत्तर करनाल में उसने तीन मिली-जुली मुग़ल फौजों को हरा दिया- उनमें से एक मुग़ल बादशाह की फौज थी, दूसरी अवध की और तीसरी दक्कन से थी. नादिर ने करीब 10 लाख की सेना को महज़ डेढ़ लाख बंदूकधारी हथियारबंद सिपाहियों के हाथों पराजित कर दिया. युद्ध की शुरुआत में यह स्पष्ट हो गया था कि मुगलों की यह भारी भरकम फौज एक अनुशासनहीन भीड़ के अलावा कुछ भी नहीं थी. डचईस्ट इंडिया कंपनी के दिल्ली प्रतिनिधियों की रिपोर्ट के मुताबिक यह विशालकाय फौज दिल्ली से करीब छह मील दूर इकट्ठा हुई थी यह इंसानों का समुद्र था, ‘दो मील चौड़ी और 15 मील लंबे आकार में फैली इस सेना को अगर यूरोपीय मापदंडों के मुताबिक ट्रेनिंग दी गई होती तो यह पूरी दूनिया पर फतह हासिल कर सकती थी. पर सबसे ज़्यादा कमी अनुशासन की थी, जिस सरदार को जो समझ में आता वही करता था, जो उसकी मर्ज़ी होती उसी तरह युद्ध लड़ता था.’

एक हफ्ते बाद पूरी तरह से नादिर के लड़ाकों से घिरी मुग़ल फौज की रसद खत्म हो चुकी थी. ऐसे में नादिर ने समझौते के झंडे के साथ मिलने के लिए मोहम्मद शाह को बुलावा भेजा. मुग़ल बादशाह ने इसे न सिर्फ कबूल कर लिया, बल्कि निहायत बेवकूफी का परिचय देते हुए महज मुट्ठीभर सैनिकों और अंगरक्षकों के साथ ही युद्ध भूमि की सीमा रेखा पार कर गया. बातचीत के लिए बुलाए जाने और शानदार मनोरंजन किए जाने के बाद मोहम्मद शाह रंगीला ने पाया कि नादिर ने वापस उसे जाने देने से ही मना कर दिया है. उसके अंगरक्षकों से हथियार छीन लिए गए और अपने महान मुग़ल की पहरेदारी में उन सैनिकों को तैनात कर दिया.

अगले दिन नादिर की फौज मुगल शिविर में गई और मोहम्मद शाह का निजी हरम, उसके निजी सेवकों और उसके शिविरों को ले आई. एक बार उनके जाने के बाद, फारसी लोग मुग़ल सरदारों को युद्ध भूमि की सीमा रेखा की दूसरी ओर उनके बादशाह के पास ले आए. शाम होते-होते उन्होंने मुग़ल तोपखाने को भी वहां से हटाना शुरू कर दिया. इसके अगले ही दिन बाकी बची भूखी और बिना नेतृत्व वाली मुग़ल सैनिकों से कह दिया गया कि वो अपने घर वापस जा सकते हैं.

एक हफ्ते बाद दोनों शासक एक खास लाल पगड़ी धारी क़ज़लबाश फारसी फौजों के साए में दिल्ली की तरफ बढ़े और एक साथ ही दिल्ली में दाखिल हुए. उन्होंने पूरा सफर हाथी के हौदे पर तय किया. 20 मार्च को मुहम्मद शाह शाहजहांनाबाद के किले में बेहद खामोशी से दाखिल हुए; वहीं विजेता राजा नादिर शाह 21 मार्च यानी नौरोज़़ के दिन विजय की शानोशौकत के साथ किले में दाखिल हुआ. नादिर शाह ने शाहजहां के व्यक्तिगत महल पर कब्ज़ा कर लिया और बादशाह यानी मुहम्मद शाह को जनानखाने में जाकर रहने पर मजबूर कर दिया.

अपने बारे में उड़ी अफवाह का जवाब नादिर शाह ने आम जनता के कत्लेआम से दिया

इसका अगला दिन मुग़ल राजधानी के इतिहास का सबसे त्रासद दिन था. नादिर शाह के करीब 40 हज़ार सैनिकों ने शहर में डेरा डाल दिया था, उनमें से अनेक रहने के लिए लोगों के घरों में घुस गए. इसकी वजह से अनाज का दाम बढ़ गया. जब कीमत को कम कराने के लिए नादिर शाह के सैनिक पहाड़गंज, आज के रेलवे स्टेशन के करीब, इलाके में पहुंचे तो व्यापारियों ने दाम कम करने से मना कर दिया. इस वजह से झगड़ा शुरू हुआ. इसी बीच एक अफवाह उड़ गई कि नादिर शाह को जनानखाने की एक महिला रक्षक ने मौत के घाट उतार दिया है. यह अफवाह फैलते ही लोग उग्र हो गए और फारसी फौजों पर हमला कर दिया. भीड़ को जहां भी फारसी सैनिक मिलते, वो उन पर हमला कर देती. दोपहर तक 900 फारसी सैनिक मारे जा चुके थे.

नादिर शाह ने इसका जवाब आम जनता के कत्लेआम के हुक्म से दिया. अगले दिन सूरज उगने के साथ ही वह लाल किले से निकला, ताकि वह खुद अपनी निगरानी में इसे अंजाम दिला सके. पूरे जंगी लिबास में वह रोशन-उद-दौला की सुनहरी मस्जिद पर पहुंचा जो लाल किले के चांदनी चौक की तरफ आधे मील की दूरी पर है. बदले की कार्रवाई को वह पूरी सहूलियत से देख सके इसके लिए उसने यहां के ऊंचे बरामदे का इस्तेमाल किया. सुबह ठीक 9 बजे कत्लेआम शुरू हुआ.

सबसे खौफनाक कत्लेआम चांदनी चौक के लाल किले, दरीबा और जामा मस्जिद के आसपास के इलाके में हुआ. यहीं पर सबसे महंगी दुकानें और जौहरियों के घर आबाद थे. ‘नादिर शाह के सैनिक घर-घर जाकर लोगों को मार रहे थे, कत्लेआम करते हुए वे लोगों की संपत्ति लूट रहे थे, और उनकी बहू-बेटियों को उठा ले रहे थे,‘ इतिहासकार गुलाम हुसैन खान ने याद किया. ‘कई घरों में आग लगा दी गई. कुछ ही दिनों में गलियों और घरों में भरी सड़ती लाशों की दुर्गंध इस कदर ज़्यादा थी कि पूरे शहर की हवा इससे खराब हो गई थी.”

इस कत्लेआम से बचने के लिए किसी ने जहर खा लिया तो किसी ने खुद को छुरी घोंप ली

कुल मिलाकर करीब 30 हज़ार दिल्ली वालों को बेरहमी से मार दिया गया था: ‘पारसी सैनिकों ने अपने हिंसक हाथ हर चीज़ पर और हर आदमी पर डाले; कपड़े, गहने, सोने-चांदी के बर्तन स्वीकार योग्य लूट का माल थे.’ दिल्ली की बहुत सी महिलाओं को गुलाम बना लिया गया.

निज़ामउल-मुल्क ने सआदत खान से फरियाद की कि वो नादिर शाह को हिंसा रोकने के लिए मनाए. साआदत खान ने उसे निकल जाने का आदेश दिया पर उसी शाम सआदत खान ने ज़हर खाकर खुदकुशी कर ली. वह इस बात से खौफज़दा था कि इतने बड़े जनसंहार में एक तरह से उसने मदद की थी. इसके बाद निज़ाम ने अपनी पगड़ी उतारी, उसे अपने हाथ में बांधकर वोनादिर शाह के सामने पहुंचा. नादिर शाह के सामने घुटने टेकर यह इल्तिजा की कि नादिर अपने सैनिकों को आदेश दें कि वह निर्दोष और मज़लूम लोगों पर रहम करें उनको न मारें. चाहें तो उससे बदला ले लें. नादिर शाह ने अपनी तलवार म्यान में रख ली और अपने सैनिकों को आदेश दिया वह लूटपाट और हत्या आदि बंद कर दें. उसके सैनिकों ने अपने बादशाह का हुक्म तुरंत मान लिया. लेकिन नादिर शाह ने एक शर्त रख दी कि उससे दिल्ली छोड़ने से पहले निज़ाम, नादिर शाह को 100 करोड़ रुपए देगा.

अगला दिन निजाम के लिए बेहद नागवार और बदनुमा था जब उसे अपनी ही राजधानी को लूटकर एक विजेता को मुआवज़े की रकम देनी थी. दिल्ली को पांच हिस्सो में बांट दिया गया और हर हिस्से से हर्ज़ाने की रकम का एक बड़ा हिस्सा वसूल किया जाना था. आनंद राम मुखलिस लिखते हैं, ‘असली लूट तो अब शुरू हुई थी. इस दिन को लोगों के आंसुओं से सींचा गया था. न सिर्फ लोगों की संपत्ति लूट ली गयी बल्कि कई परिवार बर्बाद हो गए. बहुत से लोगों ने ज़हर खाकर जान दे दी तो कुछ ने खुद को छुरी घोंप कर खुदकुशी कर ली. अगर संक्षेप में कहा जाए तो 348 साल की अर्जित संपत्ति का मालिक कुछ क्षणों में ही बदल गया था.’

57 दिन तक कोहराम मचाने के बाद जब उसने दिल्ली को अलविदा कहा

ईरानियों को यकीन नहीं हो रहा था कि कुछ ही दिनों में उन्हें इतनी दौलत मिल जाएगी. उन्होंने कभी इतनी दौलत देखी ही नहीं थी. नादिर शाह के दरबार के इतिहासकार मिर्ज़ा महदीअस्तराबादी की आंखें फटी की फटी रह गईं. उसने लिखा है, ‘बेहद कम दिनों में ही शाही खज़ाने और कारखानों की ज़ब्ती के लिए तैनात अधिकारियों ने अपना काम पूरा कर लिया. यहां तो हीरे, मोती, जवाहरात, रत्न, सोने, चांदी, उनके बर्तन, और दूसरी चीज़ों का सागर है. यहां पर विलासिता पूर्ण चीज़ों का इतना भंडार है कि खज़ांची और मुंशी सपने में भी इन्हें अपने बहीखातों में दर्ज़ नहीं कर पाएंगे.’ वह आगे लिखता है,

ज़ब्त किए गए सामान में तख्त-ए-ताऊस के शाही रत्नों का कोई मुकाबला ही नहीं है. यहां तक कि भारत के प्राचीनतम राजाओं के पास पाए जाने वाले बेशकीमती और दुर्लभ रत्न भी इसका मुकाबला नहीं कर सकते. इस राजगद्दी पर दो करोड़ के मूल्य के रत्न जड़े हैं. पुखराज, माणिक्य और सबसे शानदार हीरे जिनका अतीत या वर्तमान में किसी भी खज़ाने में जोड़ दिखता ही नहीं. ऐसे रत्न जड़े तख्त-ए-ताऊस को तुरंत नादिर शाह के राजकोष में जमा करा दिया गया.

इससे अलग नादिर शाह और नूर बाई को लेकर एक और कहानी है जो ज़्यादा नमकीन लगती है. एक कश्मीरी सैनिक अब्दुल करीम, नादिर की सेना का सिपाही था. उसने बतौर चश्मदीद दावा किया था कि नादिर नूर बाई के रक्स पर इस कदर फिदा हो गया था कि उसने उसे फारस जाने का प्रस्ताव दिया. साथ ही यह भी कहा कि वह अपनी आधी दौलत भी नूर बाई को दे देगा. नूर बाई इस प्रस्ताव से इस कदर दहशत में आ गई कि उसने बिस्तर पकड़ लिया, साथ ही उसने नादिर को बता दिया कि वह बहुत बीमार है और दिल्ली छोड़कर कहीं नहीं जा सकती. बाद में जब उससे यह पूछा गया कि उसने नादिर के प्रस्ताव को क्यों ठुकरा दिया तो बताया जाता कि उसने कहा, ‘अगर मैं नादिर के साथ हमबिस्तर हो जाती या उसके साथ फारस चली जाती, तो मुझे लगता कि मेरी फूल जैसी योनि भी उसके द्वारा किए जनसंहार में भागीदार थी.’

16 मई को दिल्ली में विनाशकारी 57 दिन बिताने के बाद नादिर शाह ने दिल्ली को अलविदा कहा. अपने साथ मुग़लों की आठ पीढ़ियों की अकूत संपत्ति और खज़ाना भी ले गया. उसका सबसे बड़ा इनाम तख्त-ए-ताऊस था जिसमें कोहिनूर और तिमूर माणिक्य जड़े हुए थे. 16 लूट का सामान ‘700 हाथियों, 4000 ऊंटों और 12000 घोड़ों से खींची जा रही अलग-अलग गाड़ियों पर लादा गया था. इन सभी गाड़ियों में सोने चांदी और कीमती रत्न भरे हुए थे.’

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