कर्नाटक विधानसभा चुनाव: अमित शाह की व्यूह रचना तोड़ने में जुटे सिद्धारमैया

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भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हर दांव का उन्हीं की भाषा में जवाब दे रहे हैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया। कर्नाटक भाजपा के प्रभारी और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने राज्य विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए पूरा जोर लगा रखा है। जावड़ेकर पिछले छह महीने से लगातार कर्नाटक में काफी सक्रिय हैं। भाजपा को मुख्यमंत्री के तौर पर घोषित बीएस येदियुरप्पा की क्षमता पर पूरा भरोसा है, लेकिन मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या के दांव ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की परेशानी बढ़ा दी है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव: अमित शाह की व्यूह रचना तोड़ने में जुटे सिद्धारमैयाकांग्रेस बनाम भाजपा
कर्नाटक में भाजपा ने बीएस येदियुरप्पा को राज्य का भावी मुख्यमंत्री घोषित कर रखा है, लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर राज्य विधानसभा चुनाव में सफलता का खाका खींच रही है। इसके बरक्स कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व और पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, उनकी साफ-सुथरी छवि, सिद्धारमैया के पांच साल के शासन को केंद्र में रखकर सत्ता में वापसी का खाका खींच रहे हैं। इसके लिए सिद्धारमैया की राय काफी अहमियत रख रही है।

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व सिद्धारमैया के पीछा खड़ा होकर पार्टी में एकजुटता बनाकर चुनाव का सामना करने की रणनीति पर चल रहा है। भाजपा अप्रैल के तीसरे सप्ताह के बाद से अपने केंद्रीय नेताओं, केंद्र सरकार के दो दर्जन से अधिक मंत्रियों के व्यापक दौरे का कार्यक्रम बना रही है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस, उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत अन्य के कार्यक्रम तय किए जा रहे हैं। वहीं कांग्रेस के पास सबसे बड़े चेहरे के रूप में पार्टी के एक दर्जन केंद्रीय नेताओं के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही हैं।

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां हाईटेक प्रचार पर पूरा जोर लगा रही हैं। सोशल मीडिया से लेकर हर प्लेटफॉर्म का भरपूर उपयोग करने की रणनीति बनी है। भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय की पूरी टीम कर्नाटक में हर गतिविधि पर लगातार नजर रख रही है। इसके बरक्स कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम की स्टार और कन्नड़ फिल्म अमिनेत्री दिव्या स्पंदना ने भी पूरी तैयारी कर रखी है।

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप समेत सभी का जमकर उपयोग होने की संभावना है। यहां तक कि कॉल सेंटर से भी प्रचार को धार देने की योजना है। माना जा रहा है कि अप्रैल के तीसरे सप्ताह के बाद कर्नाटक का चुनाव प्रचार अपने निर्णायक दौर की तरफ बढ़ जाएगा। बूथ प्रबंधन तकनीक पर भी कर्नाटक भाजपा की पूरी निगाह है। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने भाजपा के बूथ और पन्ना प्रमुख की सक्रियता को ध्यान में रखकर अपने बूथ प्रबंधन को जमकर धार देने की कोशिश की है।
जातिगत समीकरण

कर्नाटक में विधानसभा की 224 सीटें हैं। इनमें 36 सीट अनुसूचित जाति और 15 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। राज्य में 19 फीसदी दलित, 17 फीसदी लिंगायत, 16 फीसदी ओबीसी, 11 फीसदी वोक्कालिगा, 07 फीसदी कुरुब, 05 फीसदी एसटी, 03 फीसदी ब्राह्मण हैं। इनमें लिंगायत, वोक्कालिगा काफी आक्रामक मतदान करते हैं और इनके मतदान का प्रतिशत भी अधिक रहता है।

पिछले चुनाव में कुरुब वोट भी काफी पड़े थे। राज्य में 12.92 प्रतिशत मुस्लिम, 1.87 प्रतिशत ईसाई, 1.94 प्रतिशत अन्य और 84 प्रतिशत हिंदू मतदाता हैं। करीब 90 से अधिक सीटों पर लिंगायत असर डालते हैं। लिंगायत और ब्राह्मण मिलकर (लिब्रा) हार जीत का समीकरण बना देते हैं। वोक्कालिगा भी 70 से अधिक सीटों पर अपना प्रभाव दिखाते हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मौजूदा सदन में 55 विधायक वोक्कालिगा समुदाय से हैं तो 52 लिंगायत। अब तक हुए 14 मुख्यमंत्रियों में 8 लिंगायत हुए तो 6 वोक्कालिगा। सिद्धारमैया कुरुबा समुदाय से आते हैं।
चल दिया है दांव

लिंगायत काफी समय से अलग धर्म की मांग कर रहे थे। ये कर्नाटक में काफी अच्छा प्रभाव रखते हैं। समृद्ध भी हैं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लिंगायत वीरशैव को अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा देने की पहल कर दी है। लिंगायत समाज के धार्मिक पुजारी ने सिद्धारमैया की काफी तारीफ कर दी है।

लिंगायत समुदाय में इसका असर भी साफ देखा जा रहा है। इससे भाजपा की बेचैनी बढ़ रही है। दरअसल यह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की भाषा में उन्हें सिद्धारमैया ने राजनीतिक जवाब दे दिया है। इसके बाद से भाजपा अब कांग्रेस में हिंदुओं के बंटवारे का आरोप लगा रही है।

वहीं कांग्रेस के नेता बीके हरिप्रसाद इसे कर्नाटक में तुरुप का पत्ता मान रहे हैं। कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि सिद्धारमैया ने यह दांव चलकर भाजपा के वोटों के ध्रुवीकरण के प्रयासों पर पानी फेर दिया है। इसलिए मुकाबला काफी दिलचस्प होगा।

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपनी एक अलग छवि भी बनाई है। वह कन्नड़ भाषा में भाषण देते हैं। राज्य के अलग झंडे की पहल कर चुके हैं। वह हिंदू व हिंदू विरोध के नारे के विरोध में खड़े भी दिखते हैं। भगवान बाहुबली के मस्तकाभिषेक में बढ़ चढ़कर हिस्सा ही नहीं लिए बल्कि राज्य सरकार ने भरपूर सहयोग दिया। लिंगायत को अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा देने की पहल कर दी है। ओबीसी, अल्पसंख्यक के साथ मिलकर अलग समीकरण बनाते भी नजर आ रहे हैं। कुल मिलाकर कवायद 37-38 फीसदी वोट पाने तक की है।
देवगौड़ा बिगाड़ेंगे गणित

पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की पार्टी जद (एस) कांग्रेस की जीत में पेंच फंसा सकती है। कर्नाटक में जद (एस) बसपा के साथ तालमेल से चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस इस गठबंधन को लेकर जद (एस) पर भाजपा की टीम बी का आरोप मढ़ रही है। देवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। बीएस येदियुरप्पा लिंगायत हैं। सिद्धारमैया कुरुब हैं।

वोक्कालिगा राज्य में 11 प्रतिशत तो दलित सर्वाधिक 19 प्रतिशत हैं। यह बात अलग है कि कर्नाटक में दलित उ.प्र. की तरह मतदान नहीं करते, लेकिन यह तालमेल कुछ असर डाल सकता है। 2013 के विधानसभा चुनाव में देवगौड़ा की पार्टी को 20.19 प्रतिशत वोट के साथ 40 सीट मिली थी।

2008 में 18.9 प्रतिशत वोट के साथ 28 सीट तो 2004 में 20.7 प्रतिशत वोट के साथ 58 सीट मिली थी। यानी थोड़े बहुत वोटों का अंतर कर्नाटक में बड़े रुझान दिखा रहा है। ऐसे में 21-22 प्रतिशत वोट (अनुमान 60-62 सीट) पाने के बाद जद (एस) कांग्रेस और भाजपा का समीकरण बिगाड़ सकता है। ऐसी स्थिति त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति भी आ सकती है। जानकारों के मुताबिक यही इस बार के चुनाव का पॉवर गेम है।
तीन चुनाव में भाजपा

भाजपा को 2013 के विधानसभा चुनाव में 19.9 प्रतिशत वोट और 40 सीट मिली थी। हालांकि इस चुनाव में भाजपा के दो बार के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पार्टी से अलग होकर और नई पार्टी बनाकर भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए चुनाव लड़े थे। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि इसके चलते 20 से अधिक सीटों पर भाजपा को नुकसान हुआ था। इस बार येदियुरप्पा ही चेहरा हैं, इसलिए उम्मीदें जोरदार हैं।

भाजपा अपनी उम्मीद 2008 के विधानसभा चुनाव नतीजे से कर रही है। उसे तब 33.8 प्रतिशत वोट के साथ 110 सीटें मिली थी। बीएस येदियुरप्पा दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें पद छोडऩा पड़ा था।

तब कांग्रेस को 34.7 प्रतिशत वोटों के साथ 80 सीट मिली थी। इसके बरक्स 2004 के चुनाव नतीजे भी हैं। इस चुनाव में भाजपा ने 28.3 प्रतिशत वोट के साथ 79 सीट पर परचम लहराया था। कांग्रेस 35.2 प्रतिशत वोट के साथ 65 सीटों को जीतने में सफल हुई थी। जद (एस) 20.7 प्रतिशत वोट के साथ 58 सीटें पाने में सफल रहा। त्रिकोणीय मुकाबले में त्रिशंकु विधानसभा ने पहले कांग्रेस और आधे समय बाद भाजपा के हाथ में सत्ता का अवसर दे दिया था।
कहां से कौन?

अभी तक के ट्रेंड में कोस्टल कर्नाटक में भाजपा अच्छा चुनाव लड़ती है। उडुपी, उत्तर और दक्षिण कर्नाटक तथा चिकमंगलूर में कांग्रेस का पलड़ा भारी रहता है। उत्तरी और दक्षिणी कर्नाटक में भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलता है। देखना है इस बार कमल खिलता है या फिर पंजा की लहर आती है।

एक तीसरी संभावना त्रिशंकु विधानसभा की भी बन गई है, क्योंकि किसानों के हित में काम करने की छवि बना चुके एचडी देवगौड़ा की पार्टी राज्य में 20-21 प्रतिशत तक वोट का जनाधार रखकर चल रही है। काफी समय से कर्नाटक की सत्ता से भी बाहर है।

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