मणिपुर से भी छोटा देश इसराइल, जानिए फिर कैसे बना ‘सुपरपावर’?

हजारों साल पहले से यहूदियों का इस इलाके से ऐतिहासिक और धार्मिक संबंध रहा है। वे मानते रहे हैं कि उन्हें फलस्तीनी इलाके में रहने का ईश्वरीय हक है। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में हजारों यहूदी इसराइल बनने से पहले इस इलाके में आने लगे थे। यूरोप और रूस में यहूदियों को यहूदी होने के कारण घोर यातना सहनी पड़ी थी। दूसरे विश्व युद्ध में नाजियों का यहूदियों पर अत्याचार के बाद बड़ी संख्या में यहूदी इस इलाके में आए।
इसराइल का बनना
इसराइल की घोषणा के साथ ही युद्ध शुरू हो गया। महीनों चले युद्ध के बाद इसराइल और अरबी पड़ोसी युद्ध रोकने पर राजी हो गए। आगे चलकर एक देश के रूप में इसराइल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलती गई। इसराइल पूर्वी भूमध्य सागर के आखिरी छोर पर स्थित है। इसका दक्षिणी छोर लाल सागर तक है। पश्चिम में यह मिस्र से लगता है और पूर्व में जॉर्डन से। लेबनान इसके उत्तर में है और सीरिया उत्तर-पूर्व में।
ताकतवर इसराइल
इसराइल 1948 में बना। 69 साल का इसराइल क्षेत्रफल के मामले में भारत के मणिपुर से भी छोटा है। आबादी भी 85 लाख के आसपास है। खनिज संपदा के मामले में भी इसराइल भारत के सामने कहीं टिकता नहीं है। इसके बावजूद इसराइल का शुमार दुनिया के उन देशों में है, जिनकी तकनीकी और सैन्य क्षमता की मिसाल दुनिया भर में दी जाती है।
यरूशलम पोस्ट के पूर्व संपादक याकोव कात्ज ने ‘द वेपन विजार्ड्स: हाउ इसराइल बिकम अ हाई-टेक मिलिटरी सुपरपावर’ नाम की एक किताब लिखी है। यावकोव कात्ज ने लिखा है, ”इसराइल के गठन के महज दो साल बाद 1950 में देश का पहला व्यावसायिक प्रतिनिधिमंडल दक्षिणी अमरीका के लिए भेजा गया। इसराइल बिजनेस पार्टनर के लिए परेशान था। इसराइल के पास उस तरह के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे जिसके आधार पर वो अपनी अर्थव्यवस्था को आकार दे पाता। तब वहां न तेल था और न ही खनिज संपदा।”
यावकोव ने लिखा है, ”उस प्रतिनिधिमंडल ने कई बैठकें कीं, लेकिन सबने मजाक उड़ाया। इसराइली संतरा, केरोसीन स्टोव और नकली दांत बेचने की कोशिश कर रहे थे। अंर्जेंटीना जैसे देशों में संतरा का उत्पादन पहले से ही काफी होता था और वहां बिजली की कमी नहीं थी, इसलिए केरोसीन की भी जरूरत नहीं थी। कल्पना करना मुश्किल होता है कि इसराइल पहले निर्यात क्या करता था। आज की तारीख में इसराइल हाई-टेक सुपरपावर है और वह दुनिया भर में आधुनिक हथियार बेचने के मामले में काफी आगे है। हर साल वो करीब 6।5 अरब डॉलर का हथियार बेचता है।”
यावकोव ने लिखा है, ”1985 तक इसराइल दुनिया भर में सबसे बड़ा ड्रोन निर्यातक देश रहा। उसका ड्रोन का 60 फीसदी वैश्विक मार्केट पर कब्जा था। मिसाल के लिए 2010 में पांच नेटो देश अफग़ानिस्तान में इसराइली ड्रोन ही उड़ाते थे। आखिर जिस देश की उम्र 70 साल भी नहीं हुई है उसने दुनिया की सबसे आधुनिक सेना कैसे तैयार कर ली? इसका जवाब उसकी राष्ट्रीय संरचना में ही निहित है। पहली बात यह कि छोटा देश होने का बावजूद इसराइल अपनी जीडीपी का 4।5 फीसदी शोध पर खर्च करता है।”
इसराइल के बारे में कहा जाता है कि वो अपने देश में नागरिक नहीं सेना तैयार करता है। वहां के हर नागरिक के लिए सेना में सेवा देना जरूरी है। पश्चिम के देश मध्य-पूर्व में एक ठिकाने के रूप में इसराइल को सबसे सुरक्षित देश मानते हैं।
यावकोव ने लिखा है, ”2000 में इसराइली एयरफोर्स को पहली ऑपरेशनल एरो मिसाइल बैटरी मिली थी। इस ऑपरेशनल सिस्टम के साथ ही इसराइल दुनिया का पहला देश बन गया था जिसने दुश्मन देश की मिसाइल को रास्ते में ही नष्ट करने क्षमता हासिल कर ली। इसराइल के एरो का आइडिया अपने आप में कमाल का था। इसराइल क्षेत्रफल के मामले में बहुत छोटा देश है जिसके पास खाली जमीन का अभाव है। यह बैलिस्टिक मिसाइल की तुलना में काफी प्रभावी है।”
1989 में इसराइल ने अंतरिक्ष में पहला जासूसी उपग्रह छोड़ा। इसके साथ ही इसराइल आठ देशों के उस खास समूह में शामिल हो गया जिनके पास स्वतंत्र रूप से उपग्रह प्रक्षेपण की क्षमता है। शुरुआत में कहा जा रहा था कि इसराइल शायद ही इस क्लब में शामिल हो पाए।
सैन्य ताकत
मध्य-पूर्व में F-15I को काफी घातक लड़ाकू विमान माना जाता है। इसमें हवा से हवा में मार करने की क्षमता है। इसराइल के पास जेरिको III परमाणु प्रतिरोधक क्षमता है। जेरिको I बैलिस्टिक मिसाइल को इसराइली सेना में 1970 के दशक में शामिल किया गया। बाद में इसकी जगह जेरिको II ने ली और अब जेरिको III है।
परमाणु शक्ति संपन्न है इसराइल?
अब सवाल उठता है कि क्या भारत इसराइल को उसकी ताकत के हिसाब से ज्यादा तवज्जो दे रहा है या भारत की जरूरत है? मध्य-पूर्व मामलों के जानकार कमर आगा कहते हैं कि इसराइल के साथ भारत की दोस्ती पारस्परिक है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों की अपनी-अपनी जरूरते हैं। इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू भारत के छह दिवसीय दौरे पर हैं। किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के लिए छह दिनों का दौरा काफी मायने रखता है।
अमरीका का रास्ता इसराइल होकर…
कमर आगा कहते हैं, ”इसराइल के साथ आप करीब आते हैं तो पश्चिमी देशों की सोहबत और आसान हो जाती है। सोवियत संघ के पतन के बाद भारत ने भी अमरीका की तरफ रुख किया। तब कहा जाता था कि अमरीका का रास्ता इसराइल से होकर जाता है और भारत ने इसी रास्ता को साधा। इसराइल भारत के लिए दो कारणों से काफी अहम है। एक तो उसकी तकनीकी और आतंकवाद से लड़ने की क्षमता और दूसरी पश्चिमी देशों में यहूदियों की तगड़ी लॉबीइंग है। जाहिर है भारत को दोनों चीजों की जरूरत है।”
‘यहूदी लॉबी का भारत ने उठाया फायदा’
कमर आगा कहते हैं, ”उनके पास टेक्नोलॉजी है और हमारे पास नहीं है। हमें टेक्नोलॉजी की जरूरत है। हमारे पास सस्ते मजदूर हैं। ये कम्यूटर चलाना जानते और इन्हें अंग्रेजी भी आती है। इसराइल को ऐसे मजदूरों की जरूरत है। अगर दोनों देश मिलकर कुछ बनाते हैं तो इसराइल को भारत जैसा विशाल मार्केट मिलेगा।”
आंकड़े क्या कहते हैं?
यह भारत के कुल विदेशी व्यापार का 18.25 फीसदी हिस्सा है।
वहीं इसराइल के साथ भारत का व्यापार पांच अरब डॉलर का था जो कि कुल व्यापार का एक फीसदी भी हिस्सा नहीं है। भारत का इसराइल के साथ सुरक्षा संबंध काफी गहरे हैं जबकि अरब के देश रोजगार, विदेशी मुद्रा और ऊर्जा के लिहाज से काफी अहम हैं।





