शिक्षा मंत्री मेवालाल चौधरी ने दिया इस्तीफा, नीतीश सरकार ने कैबिनेट से हटाए आधा दर्जन मंत्री

एनडीए सरकार में शिक्षा मंत्री मेवालाल चौधरी ने पदभार ग्रहण करने के चंद घंटों के बाद ही इस्तीफा दे दिया. बिहार की सत्ता पर नीतीश कुमार सातवीं बार विराजमान हुए हैं. मेवालाल पहले मंत्री नहीं है, जिनका विवादों में नाम आने के बाद नीतीश ने अपनी छवि को मिस्टर क्लीन बनाए रखने के लिए इस्तीफा ले लिया हो. वह इससे पहले आधा दर्जन मंत्रियों को कैबिनेट से हटा चुके हैं. हालांकि, आरोपों से मुक्त होने के बाद उन्होंने कुछ मंत्रियों को दोबारा से अपनी कैबिनेट में शामिल भी किया है. 

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नीतीश कुमार ने पहली बार अपनी कैबिनेट से किसी मंत्री को नहीं हटाया. नीतीश अक्टूबर 2005 में मुख्यमंत्री बने और अपनी पहली सरकार में ही उन्होंने मंत्री बनाने के 24 घंटे के भीतर जीतनराम मांझी का इस्तीफा लिया था. इसके बाद 2008 में रामानंद सिंह, 2011 में रामधार सिंह, 2015 में अवधेश कुशवाहा और 2018 में मंजू वर्मा को मंत्रिमंडल से हटा चुके हैं. 

मेवालाल चौधरी
बिहार की तारापुर विधानसभा सीट से दूसरी बार जेडीयू के टिकट पर विधायक बने डॉ. मेवालाल चौधरी को नीतीश कुमार ने अपनी कैबिनेट में शामिल कर शिक्षा मंत्री का विभाग सौंपा था. मेवालाल कृषि विश्वविद्यालय के वीसी रहते हुए सबौर में नियुक्ति घोटाले में आरोपित हैं. उन्हें कैबिनेट में जगह देकर नीतीश कुमार फंस गए थे. एक दागी नेता को मंत्री बनाए जाने पर विपक्ष ने सीएम नीतीश की जीरो टॉलरेंस नीति पर सवाल खड़े कर घेरना शुरू कर दिया था. 

मेवालाल चौधरी ने गुरुवार दोपहर करीब पौने एक बजे शिक्षा विभाग में पदभार ग्रहण किया. प्रधान सचिव संजय कुमार समेत तमाम आलाधिकारियों ने उनका स्वागत किया. तब चौधरी ने अपने ऊपर विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे तमाम आरोपों को निराधार बताया. वे छठ के कार्यक्रम को लेकर विभाग से ही अपने क्षेत्र तारापुर जाने वाले थे, लेकिन अचानक सीएम आवास पहुंचे और इस्तीफा दे दिया, जिसे राज्यपाल फागू चौहान ने स्वीकार भी कर लिया है. 

जीतनराम मांझी 
जीतन राम मांझी 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बने मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे, पर मंत्री पद की शपथ लेने के कुछ ही घंटे बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. जेडीयू से पहले मांझी आरजेडी में थे और 1999 में लालू प्रसाद यादव की सरकार में वो शिक्षा राज्य मंत्री थे. जीतनराम मांझी के कार्यकाल में ही एक फर्जी डिग्री घोटाला हुआ था, जिसमें उनका नाम आया था. यही वजह रही कि 2005 में उनके मंत्री बनने के साथ ही सवाल खड़े होने लगे थे, जिसके बाद नीतीश कुमार ने उनसे इस्तीफा ले लिया. हालांकि, बाद में फर्जी डिग्री मामले में आरोप मुक्त हो गए थे, जिसके बाद उन्हें दोबारा से मंत्री बनने का मौका मिला था. 

रामानंद सिंह 
नीतीश कुमार की पहली सरकार में ही परिवहन मंत्री रहे रामानंद सिंह को निगरानी ब्यूरो से जुड़े एक मामले में नाम आने के बाद इस्तीफा देना पड़ा था. दरअसल, मामला 1990 का था, तब निगरानी ब्यूरो ने उनके विरुद्ध चार्जशीट दायर की थी. रामानंद सिंह सियासत में आने से पहले मुजफ्फरपुर थर्मल पावर स्टेशन में फ्यूएल टेक्नोलॉजिस्ट के रूप में काम कर रहे थे, उन पर यह आरोप था कि उन्होंने खराब क्वालिटी के पाइप की खरीदारी थर्मल पावर स्टेशन के लिए की थी. इसी आरोप के चलते नीतीश कुमार ने उनसे इस्तीफा ले लिया था. हालांकि, बाद में न्यायालय से बरी होने के बाद उन्हें दोबारा से मंत्री बनाया था. 

अवधेश कुशवाहा 
नीतीश कुमार की पिछली सरकार में निबंधन उत्पाद मंत्री अवधेश कुशवाहा को भी इस्तीफा देना पड़ा था. अक्टूबर, 2015 में स्टिंग ऑपरेशन में 4 लाख घूस लेने के आरोप में नीतीश कुमार ने उनकी मंत्री पद से छुट्टी कर दी थी. अवधेश कुशवाहा को एक स्टिंग ऑपरेशन में मुंबई के एक व्यवसायी से चार लाख रुपये लेते दिखाया गया था, जिसमें सरकार बनने पर कथित व्यवसायी को बिहार में करोबार करने में मदद का भरोसा दिला रहे थे. जेडीयू ने इसे गंभीरता से लेते हुए उन्हें मंत्रिमंडल से हटा दिया था. 

मंजू वर्मा 
नीतीश कुमार की पिछली सरकार में समाज कल्याण मंत्री रही मंजू वर्मा को भी मंत्री पद गंवाना पड़ा है. मुजफ्फरपुर बालिकागृह कांड में मंजू वर्मा का नाम आया था, जिसके बाद सीबीआई की तलाशी के दौरान उनके ससुराल से कारतूस बरामद हुए थे. विपक्ष मंजू वर्मा को लेकर नीतीश सरकार को घेरने में जुटा हुआ था, जिसके बाद दबाव इतना बढ़ गया था कि मुख्यमंत्री ने 2018 में उनसे इस्तीफा ले लिया था. अब इस कड़ी में महज तीन दिन के मंत्री मेवालाल चौधरी का नाम भी जुड़ गया है.  

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