होलिका दहन के दिन भूलकर भी ना करें ये गलती, नहीं तो….

28 मार्च को होलिका दहन मनाया जाएगा. इस दिन लकड़ी के रूप में अपनी बुराई जलाने की परंपरा है ताकि हमारी आत्मा पवित्र हो जाए. आमतौर पर लोग इस दिन किसी भी लकड़ी से होलिका दहन कर लेते हैं जो सही नहीं है. ज्योतिर्विद कमल नंदलाल से जानते हैं कि इस दिन किन लकड़ियों से होलिका दहन किया जा सकता है और किन लकड़ी का प्रयोग होलिका दहन में नहीं करना चाहिए. 

होलिका जलाने और भस्म करने का पर्व है. महादेव ने होली से 8 दिन पहले यानी होलाष्टक के दिन कामदेव यानी अपनी बुराई को भस्म कर दिया था. शास्त्रों के अनुसार राहु-केतु से संबंधित कुछ पेड़ों को बुराई का प्रतीक माना जाता है. इसलिए होलिका दहन में इन पेड़ों की लकड़ियों को जलाना चाहिए. 

होलिका दहन में ऐसी लकड़ी की प्रयोग करना चाहिए जिससे हमारे जीवन की बुराइयां जल जाएं. इनमें पहली लकड़ी है एरंड की लकड़ी जबकि दूसरी लकड़ी है गूलर की लकड़ी. इन दोनों लकड़ियों का प्रयोग होलिका दहन के दिन जरूर करना चाहिए. इसके अलावा, इस दिन गाय के उपले इस्तेमाल किए जाते हैं. 

इस मौसम में एरंड और गूलर की लकड़ी के पत्ते झड़ने लगते हैं. इनका जल तत्व समाप्त हो जाता है. अगर इन्हें जलाया नहीं जाए तो इनके अंदर कीड़ों की उत्पत्ति हो जाती है. 

एरंड और गूलर की लकड़ी जलाने से वायु शुद्ध होती है साथ ही मच्छर और बैक्टीरिया भी खत्म होते हैं. इसलिए होलिका दहन के दिन इन दोनों लकड़ियों को गाय के उपले और खर-पतवार के साथ जलाना चाहिए. 

होलिका दहन के दिन आम की लकड़ी को कभी नहीं जलाना चाहिए. 

इस मौसम में पीपल के पेड़ पर भी नए कोपल आते हैं. इसलिए इस दिन पीपल की लकड़ी भी नहीं जलानी चाहिए. इसके अलावा, होलिका दहन में वट की लकड़ी जलाना भी अशुभ माना जाता है. होलिका दहन में इन चारों पेड़ों की लकड़ी जलाने से परहेज करना चाहिए. 

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