बिहार के ऐसे सीएम जिन्होंने जनता के बीच जाकर वोट नहीं मांगा, 15 साल संभाली कुर्सी

बिहार में कई ऐसे मुख्‍यमंत्री हुए हैं जो अपनी कार्यशैली के लिए अलग ही पहचान रखते थे। मुख्‍यमंत्रियों की लिस्‍ट में एक ऐसे भी थे जिन्‍होंने लम्‍बे वक्‍त तक कुर्सी संभाली,

पटना। बिहार में कई ऐसे मुख्‍यमंत्री हुए हैं जो अपनी कार्यशैली के लिए अलग ही पहचान रखते थे। मुख्‍यमंत्रियों की लिस्‍ट में एक ऐसे भी थे जिन्‍होंने लम्‍बे वक्‍त तक कुर्सी संभाली, बिहार के उत्‍थान के कार्यों से अलग पहचान बनाई लेकिन कभी खुद के लिए जनता के बीच जाकर वोट नहीं मांगा।बावजूद इसके अपने जीवन की आखिर सांस तक वह अपने दौर के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे।

कहानी पहले सीएम श्रीबाबू की

बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्‍ण सिंह उर्फ श्रीबाबू 1946 से लेकर 1961 तक सीएम रहे। उनके दौर में ही राज्‍य में पहली बार औद्योगिक क्रांति आई थी। उन्‍हें आधुनिक बिहार का शिल्पकार भी कहा जाता है. उन्‍होंने लम्‍बे समय तक मुख्‍यमंत्री के तौर पर काम किया था। जब भी चुनाव आते वो अपने विधानसभा क्षेत्र में खुद के लिए वोट मांगने नहीं गए। उनका सिद्धांत था कि यदि मैंने काम किया है तो जनता बिना मांगे मुझे वोट देगी।

लायक समझेंगे तो लोग वोट देंगे

श्रीबाबू ने वैसे तो 1946 में ही बिहार में सीएम की कुर्सी संभाल ली थी। 1957 में वह शेखपुरा जिले के बरबीघा से चुनाव लड़ रहे थे। उनके प्रचार के लिए सहयोगी सक्रिय थे। लेकिन श्री बाबू बरबीघा सीट में प्रचार के लिए नहीं जाते थे। जब सहयोगियों ने इसकी वजह पूछा तो उन्‍होंने कहा कि वह अपने लिए वोट मांगने नहीं जाएंगे। उन्होंने कहा था कि अगर मैंने काम किया है या जनता मुझे अपने नेता के लायक समझेगी, तो मुझे खुद ही वोट देगी।

सादगी के पर्याय और उसूलों के पक्‍के

बिहार केसरी के नाम से मशहूर श्री कृष्ण सिंह उर्फ श्रीबाबू का जन्‍म बिहार के नवादा जिले स्थित खनवां गांव में हुआ था। उन्हें करीब से जानने वाले लोग कहते हैं कि श्रीबाबू उसूलों से कभी कोई समझौता नहीं करते थे। बिहार में जमींदारी प्रथा खत्म करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। वह हमेशा वीआईपी व्‍यवस्‍था से दूरी बना कर आम लोगों के लिए सुलभ रहते थे। इसी वजह से उनकी लोकप्रियता बहुत ज्‍यादा थी।

बिना सुरक्षा के जाते थे अपने गांव

श्रीबाबू के बारे में एक किस्‍सा ये भी है कि सीएम रहते हुए जब अपने गांव आते थे, तब वह सिक्‍योरिटी गाड्रर्स को गांव के बाहर ही रोक देते थे. अपनी सुरक्षा गार्ड से कहते थे कि यह मेरा गांव है, यहां मुझे कोई खतरा नहीं है। वह अपने गांव के अंदर बिलकुल देसी अंदाज में रहते थे। किसी को महसूस ही नहीं होता था कि उनके राज्‍य का सीएम उनके बीच में है।

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