चीन ने अमेरिका को तरेरी आंखें : दी युद्ध की चेतावनी, कहा लड़ने को तैयार

नई दिल्ली। दुनिया को कोरोना वायरस महामारी में झोंकने वाला चीन अब युद्ध की धमकियाँ दे रहा है। चीन के प्रेसिडेंट शी जिनपिंग ने कोरियाई युद्ध की सत्तरवीं बरसी पर सेना को संबोधित करते हुए उन्हें ‘हमलावरों’ से सावधान किया। कोरियाई युद्ध इतिहास का अकेला ऐसा मौका है जब चीनी सेना के सामने अमेरिका की सेना थी। सो जिनपिंग का इशारा अमेरिका की तरफ था। चीन अब ये सुर अपना रहा है कि जब वो 70 साल पहले अमेरिका से नहीं डरा तो अब भला क्यों डरेगा।

लड़ने को तैयार

शी जिनपिंग ने चीनी सेना को संबोधित करते हुए 1950-53 के बीच चले युद्ध को इस बात की निशानी कहा कि यह देश उस ताकत से लड़ने के लिए तैयार है जो, ‘चीन के दरवाजे पर मुश्किल पैदा करेगा।‘ जिनपिंग ने कहा – सत्तर साल पहले औपनिवेशिक हमलावरों ने चीन के दरवाजे पर आग लगाई थी। चीनी लोग जानते हैं कि हमें उसी भाषा का इस्तेमाल करना है जिसे हमलावर समझता है। युद्ध का जवाब युद्ध से दिया जाएगा और आक्रमण को ताकत के इस्तेमाल से रोका जाएगा। दुनिया ये जान ले कि चीन के लोग अब संगठित हैं और उनके साथ पंगा नहीं लिया जा सकता। जिनपिंग ने कहा कि मिलिट्री के त्वरित आधुनिकीकरण की जरूरत है ताकि एक विश्वस्तरीय सेना का निराम किया जा सके। चीन हमेशा से युद्ध की बरसियों का इस्तेमाल नए चीन की सैन्य ताकत से अमेरिका को परोक्ष रूप से धमकाने के लिए करता है।

चीन ने अमेरिका को तरेरी आंखें

कम्युनिस्ट पार्टी जन्मी थी कोरिया युद्ध से

चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी को कोरियाई युद्ध के बाद अपनी जड़ें जमाने में मदद दी थी। इस युद्ध की सत्तरवीं बरसी ऐसे दौर में मनाई जा रही है जब अमेरिका के साथ कारोबारी और तकनीक के लिए मुकाबलेबाजी, मानवाधिकार और ताइवान को लेकर पार्टी पर दबाव है।

जिनपिंग ने निशाना साधा

अमेरिका का नाम लिए बगैर शी जिनपिंग ने कोरियाई युद्ध की ऐतिहासिक घटनाओं की मदद से मौजूदा दौर में ‘एकाधिकारवाद, संरक्षणवाद और चरम अहंकार’ पर निशाना साधा और कहा – चीन के लोग समस्या पैदा नहीं करते, ना ही हम उनसे डरते हैं। हम कभी अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता का नुकसान हाथ पर हाथ धरे नहीं देख सकते। और हम कभी भी किसी ताकत को हम पर हमला करने और हमारी मातृभूमि के पवित्र इलाके को बांटने नहीं देंगे।

अमेरिका-चीन आमने सामने

कोरियाई युद्ध पहली और अब तक की एकमात्र घटना है जब चीन और अमेरिका की सेना एक दूसरे से सीधे लड़ीं थीं। चीन की सरकार का कहना है कि तीन साल ये युद्ध में करीब दो लाख चीनी सैनिक मारे गए थे। इस युद्ध में अमेरिका के नेतृत्व वाली संयुक्त राष्ट्र के गठबंधन की सेना पीछे जाने पर मजबूर हुई थी। ये युद्ध उत्तर कोरिया के साथ चीन की कम्युनिस्ट सेना के आने की वजह से हुआ था। इस युद्ध को चीन में विजय की तरह देखा जाता है।

बहरहाल, जिस तरह के हालात बन रहे हैं उससे लगता है कि चीन और अमेरिका के बीच तनाव का केंद्र कोरिया प्रायद्वीप होगा। और इसमें ताइवान की प्रमुख भूमिका होगी। चीनी मीडिया लिख रही है कि जब चीन बेहद गरीब था, तब वह अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुका। आज चीन एक मजबूत देश के रूप में उभरा है तो चीन भला अमेरिका की धमकी से क्यों डरेगा।

चीन और नार्थ कोरिया

परमाणु हथियारों की वजह से नार्थ कोरिया पर संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंध लगाये थे जिसका चीन ने समर्थन किया था। इससे दोनों देशों के रिश्ते में खटास आ गई थी लेकिन अब दोनों में फिर मित्रता हो गयी है। बीते ढाई साल में शी जिनपिंग और नार्थ कोरियाई नेता किम जोंग उन पांच बार मिल चुके हैं।

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