इंदौर. “बच्चियों समेत आत्महत्या के ख़याल भी आए मुझे, गरीबी, भूख चरित्र पर उठते सवालों और घरेलू हिंसा ने मेरे हौसलों को भी कमज़ोर किया, लेकिन मैंने मुसीबतों के आगे घुटने नहीं टेके, मैंने तय किया था कि अपमान का जवाब अभी नहीं दूंगी, कुछ बनकर दिखाऊंगी…’ वारंगल के खेतों में मजदूरी करती थीं कभी ज्योति रेड्डी, आज यूएस की मल्टीमिलिनेयर सॉफ्टवेयर कम्पनी की सीईओ हैं… पढ़िए पीड़ा, अपमान, संघर्ष और जीत की यह बेमिसाल कहानी ज्योति के ही शब्दों में-
“माता पिता के होते हुए मैं अनाथालय में रही क्योंकि परिवार बड़ा था और स्थिति बदहाल। भरपेट खाना भी नहीं खा पाते थे हम। मैंने देखा है रातों में मां को रोते हुए। वो रोती थीं क्योंकि उन्हें पता होता था कि उनके बच्चे भूखे हैं। पिता ने हम दो बहनों को अनाथालय के होस्टल में डालने को कहा। पता चला मातापिता के होते हुए दाखिला नहीं देंगे। वहां ऑर्फन या सेमी ऑर्फन को ही दाखिला देते थे। हम ठीक से खा सकें इसलिए पिता ने झूठ बोलकर वहां एडमिशन कराया। उन्होंने कहा कि इनकी मां गुज़र गई है। क्या करते हम। मजबूर थे लेकिन यह झूठ आज भी मुझे बहुत तकलीफ देता है।
आजकल के बच्चों को देखती हूं, सबकुछ है फिर भी शिकायत करते हैं। मैंने 10 वीं से पहले कभी जूते नहीं पहने थे। नंगे पैर चावल के खेतों में रोज़ के पांच रुपए कमाने के लिए 10 घंटे मजदूरी की। ऑर्फनेज के सामने सेंट जोसफ स्कूल में संभ्रांत घरों की लड़कियां आती थीं। खूबसूरत कपड़े, महंगे जूते पहनकर। मन ललचाता वो चीज़ें पाने को। लेकिन मैं भूली नहीं कुछ। सब याद रखा। आगे चलकर जब मैं सक्षम हुई, तो मैंने अपनी दोनों बेटियों को उसी स्कूल में पढ़ाया। अपनी बेबसी के प्रति बदले की भावना थी मेरे अंदर। और मैं नहीं मानती यह गलत है। एक एक बूंद पानी के लिए भी घंटों धूप में तपी हूं। कुएं से पानी निकालने में हाथों में घाव हो जाते थे। उन्हीं हाथों से खेतों में कुदाली चलाई है पांच साल। आसानी से नहीं मिला कुछ भी। बहुत लड़ाई की है जीने के लिए।
16 की उम्र में मेरे पिता ने मेरी शादी करा दी। सब सपने टूट गए। 18 की थी तब मेरी दो बेटियां थीं। मेरे सपने मुझे चैन से सोने नहीं देते थे, लेकिन यह दुनिया पुरुषप्रधान है। हां यह सच है। गांव में तो बात बात पर पीट देते हैं औरत को। मेरे साथ भी हुआ है ये। बच्चे हो जाने के बाद काम करने या पढ़ने की बात पर मेरे पति ने कहा तुम्हें दिखावा करना है। मैंने कहा मैं तो पढूंगी। मैं अपनी बच्चियों को उन चीजों के लिए तरसते नहीं देखना चाहती थी जिनके लिए मैं तरसती रही। नेहरू युवा केंद्र में एडल्ट एजुकेशन टीचर चाहिए था। मैंने वो नौकरी कर ली। लोग चरित्र पर कीचड़ उछालते रहे। मैंने हर अपमान सहा। लेकिन यह अपमान मैं भूली नहीं। वो हर पत्थर जो मुझे पर फेंका गया उसे मैंने अपनी झोली में रख लिया और कसम खाई कि एक दिन चट्टान की तरह बनकर दिखाऊंगी।
यह बात है मई 1990 की जब मैंने तय किया कि मुझे कुछ और करना है। मैंने टाइपिंग सीखी। एक रुपए में एक पेटिकोट सिया। फिर ओपन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। फिर मेरी पहली गवर्नमेंट जॉब लगी। मुझे दो साल के 398 रुपए मिलते थे। जबकि ट्रेन से ट्रेवल करने में 600 रुपए खर्च हो जाते थे। फिर भी मैंने नौकरी नहीं छोड़ी। मैंने ट्रेन में साड़ियां बेचीं। एक दोस्त जया जो अमेरिका से आई थी उसने कहा अमेरिका चल। मैंने पीजीडीसए कोर्स जॉइन किया। वीज़ा के लिए एप्लाय किया। नहीं मिला। दूसरी कोशिश की। पहुंच तो गई लेकिन विज़िटर वीज़ा पर। वहां एक गुजराती परिवार के घर में पीजी रही। पहली जॉब एक कैसेट शॉप में लगी। 60 डॉलर तनख्वाह पर। इतने पैसे पहली बार देखे। फिर एक इंडियन लड़के ने मुझे सॉफ्टवेयर रिक्रूटर का जॉब ऑफर किया। मैंने यह जॉब किया। 43 हजार डॉलर जमा किए और इन पैसों से अपना बिज़नेस सेट किया।’
जिस यूनिवर्सिटी में फेल हुई, वहां आज मेरी सक्सेस स्टोरी पढ़ाई जा रही है
वारंगल की काकतिया यूनिवर्सिटी में एमए इंग्लिश के लिए एप्लाय किया मैंने। मैं फस्र्ट इयर में फेल हो गई। लेकिन आज इस यूनिवर्सिटी के 498 कॉलेजेस में मेरी सक्सेस स्टोरी के चैप्टर्स कॅरिकुलम में शामिल किए गए हैं। फेल्योर्स से डरना नहीं। डरना तो किसी भी चीज़ से नहीं। फेल्योर के बाद जो सक्सेस मिलती है वो ग्रैंड होती है।
ज़िंदगी में आई मुसीबतों से सीखे ये 4 बड़े सबक
– दुनिया का सबसे घिनौना भाव है डर मेरी ज़िंदगी में इसके लिए कोई जगह नहीं।
– ख्वाब देखो और उन्हें पूरा करने के लिए मौत से भी लड़ना पड़े तो लड़ो।
– वक्त का सम्मान करो, टीवी सीरियल्स देखकर टाइम वेस्ट मत करो, खुद के लिए कुछ करो।
– अपमान से प्रेरणा और हार से सबक लो, ये दोनों सबसे बड़े टीचर हैं।