रहस्यमयी: दिन में सिर्फ दो बार दर्शन देकर समुद्र में समा जाता हैं ये मंदिर, वीडियो देख नही कर पाएगे यकीन

जितना विचित्र भारत देश हैं और जितने चमत्कार भारत वर्ष में होते हैं शायद ही दूसरी कोई जगह होगी जहाँ इतना सबकुछ होता होगा। यहाँ पर इतने सारे मंदिर हैं कि इंसान कभी भी अपने आपको अकेला नही पा सकता हैं। और हर एक मंदिर के पीछे कोई न कोई वजह या कोई किस्सा जुड़ा हुआ हैं, कुछ एक मंदिर ऐसे हैं जहां पर लोग दशकों से आ रहे जैसे वैष्णो देवी,केदारनाथ, बदरीनाथ। आप भी चमत्कार के कई किस्से सुनते होंगें लेकिन कभी ये सुना हैं कि कोई ऐसा मन्दिर भी हैं जिसको हम सिर्फ दिन में दो बार ही देख सकते हैं, अगर अपका जवाब ना हैं तो आज हम आपको एक ऐसे ही मंदिर से रू ब रू करवाने जा रहे हैं। गुजरात शहर में स्थित भगवान शिव का यह मंदिर स्तंभेश्वर महादेव के रूप में जाना जाता है। आइए जानते हैं पूरा किस्सा।

■ शिवपुराण में हैं सबूत

यह मंदिर कोई आम मन्दिर नही बल्कि बड़ा ही विचित्र व आकर्षित मन्दिर हैं। इस मन्दिर का उल्लेख महाशिवपुराण में रूद्र संहिता भाग-2 के अध्याय 11 में किया गया है. इस मंदिर की खोज आज से लगभग 150 साल पहले हुई थी. यह मंदिर बड़ोदरा से 40 मील  की दूरी पर अरब सागर के कैम्बे तट पर स्थित है. मंदिर में स्थापित शिवलिंग लगभग 4 फ़ीट ऊंचा और 2 फ़ीट के व्यास का है। और देखने मे ये बेहद दिलचस्प हैं।

■ मन्दिर छुपने का राज़

यह मंदिर एक दिन में सिर्फ़ दो बार ही आता हैं ऐसा इसलिए होता हैं क्योंकि जब ज्वार भाटा चढ़ता हैं तब पानी का स्तर बढ़ जाता हैं और मंदिर पानी के बीच मे समा जाता हैं और इसी तरह जब ज्वार भाटा गिरने लगता हैं तब पानी का स्तर कम हो जाता हैं और मन्दिर फिर से दिखाई देने लग जाता हैं। अब आप सोच रहे होंगे फिर दर्शन कैसे होते हैं? यहाँ पर विशेष तौर से पर्चे बाटे जाते हैं जिसमे बताया गया होता हैं कब ज्वार भाटा चढ़ेगा और कब उतरेगा। इसी के मुताबिक सब लोग दर्शन करते हैं।

■ पौरणिक कथा

प्राचीन काल मे जब ताड़कासुर तपस्या कर रही थी तब उसने अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर दिया और शिवजी प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा तब ताड़कासुर ने कहा मुझे सदैव के लिए अमर कर दो, शिवजी ने कहा कोई भी अमर नही हो सकता हैं तो इस पर ताड़कासुर ने कहा मुझे फिर सिर्फ शिव पुत्र से ही मौत चाहिए। उसका वरदान पूर्ण होते ही उसने आकश्लोक व सभी भगवानों पर अत्यचार शुरू कर दिए। फिर जब हद की सीमा पार हुई तब देवगण शिवजी के पास जा पहुँचे, श्वेत पर्वत के पिंड से कार्तिकेय का जन्म हुआ और उन्होंने ही ताड़कासुर का वध किया। परंतु यह पता लगने पर कि वह भगवान शिव का सबसे बड़ा भक्त था कार्तिकेय आत्मग्लानी से भर गए। इस पर भगवान विष्णु ने एक उपाय बताया कि वह यहां पर शिवलिंग स्थापित करें और रोज़ माफ़ी मांगें। इस तरह से यह शिवलिंग यहां विराजमान हुआ और तबसे ही इस मंदिर को स्थंभेश्वर के नाम से जाना जाता है। आपको भी ज़िन्दगी में इस मंदिर के दर्शन करने चाहिए।

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