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रिश्तों को राजनीति से ऊपर रखतें हैं भागवत

यह बात मज़ाक की नहीं लेकिन हकीकत है कि अगर संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत को दो बार यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के साथ चाय पीने का मौका मिल गया तो वे भी सहज तौर पर नागपुर मुख्यालय में पहुंच सकती हैं. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक वरिष्ठ विभाग प्रचारक ने खुलकर यह बात कही कि सर संघचालक डा. भागवत अपने रिश्तों को बियांड पॉलिटिक्स ले जाने में माहिर हैं. वे जिस तरह से समाज में लोगों से घुलते- मिलते हैं वह बहुत ही उल्लेखनीय है.रिश्तों को राजनीति से ऊपर रखतें हैं भागवत

मेगा स्टार अमिताभ बच्चन हो या रतन टाटा या फिर कोई बड़ा लेखक या पत्रकार या कलाकार डॉ. भागवत के सबसे व्यक्तिगत रिश्ते हैं. उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन महत्वपूर्ण व्यक्ति किस पार्टी या विचारधारा है? वे उसका निमंत्रण स्वीकार करते हैं और अपने यहां उसे खुद भी अपने यहां बुलाते हैं. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का संघ के नागपुर मुख्यालय में जाना और पूर्णकालिक प्रचारक बन चुके स्वयंसेवकों को संबोधित करना एक तरह से संघ के लिए अनूठी घटना है और यह डॉ. भागवत की उदार कार्यशैली का नज़ारा है.

संघ के एक पदाधिकारी का कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सर संघचलाक के भाषणों और व्यवहार का अध्ययन करना होगा. डॉ. भागवत ने हाल ही में एक से ज़्यादा बार संघ के समावेशी चरित्र पर जोर दिया है.  पुणे के एक कार्यक्रम में तो उन्होंने खुलकर घोषणा कर दी कि कांग्रेस मुक्त भारत एक राजनीतिक नारा है. यह संघ की भाषा नहीं है. संघ कभी भी किसी को छोड़ने की भाषा का इस्तेमाल नहीं करता. इसी के आलोक में देखें तो पता चलता है कि प्रणब मुखर्जी का वहां जाना कोई अनहोनी नहीं है.

राजनीतिक तौर पर देखें तो डा. भागवत और मुखर्जी की यह मुलाकात तब भी खूब सुर्खियों में आई थी जब ऐन राष्ट्रपति चुनाव से पहले डा. भागवत राष्ट्रपति भवन दोपहर के भोज पर पहुंचे थे. तब माना गया था कि प्रणब दा को दूसरा कार्यकाल मिल सकता है. हालांकि यह तब संभव नहीं हुआ लेकिन यह साबित हो गया कि बुनियादी तौर पर दोनों के रिश्ते बेहतर हैं.

संघ के एक पूर्व पदाधिकारी का कहना है कि संघ के हर एक सरसंघचालक की कार्यशैली कई संदर्भों में खास रही है. हेडगेवारजी ने संघ को विस्तार दिया. गुरूजी गोलवलकर ने संघ को आध्यात्मिक महत्व से जोड़ा ताकि समाज निर्माण में स्वयंसेवकों के बीच कोमल भाव का अंकुरण रहे. देवरस जब बनें तब उन्होंने संघ के राजनीतिक विस्तार पर काम किया. अब डा. भागवत का दौर उदारता और विस्तार का है. 2002 में पूर्व संघ चालक केसी सुदर्शन द्वारा स्थापित किए गए मुस्लिम राष्ट्रीय मंच को वे विस्तारित कर रहे हैं. संघ प्रचारक इंद्रेश कुमार की अगुवाई में यह मंच अयोध्या में राम मंदिर के लिए कार सेवा करने के लिए भी तैयार है.

संघ के अंदरूनी हलकों का कहना है कि यह पहली बार हुआ है जब संघ की अखिल भारतीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अधिकतम पदाधिकारी हैं उनकी उम्र 50 साल है यानी बड़ी संख्या में युवाओं को फ्रंटलाइन लीडरशीप देने का काम चल रहा है. इतना ही नहीं 91 साल बाद संघ के गणवेश में परिवर्तन करना, और हर प्रचारक को टेबलेट, आईपेड में पारंगत होने की अनिवार्यता बताना डा. भागवत की शैली है. संघ पदाधिकारी का कहना है कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि प्रणब मुखर्जी ने नागपुर पहुंच कर  प. नेहरू का जिक्र किया, या राष्ट्रवाद पर अपने क्या विचार प्रस्तुत किए. मुद्दा यह है कि उन्होंने संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार को भारत मां का महान सपूत बताया.

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