रहस्यों से भरा है मध्य प्रदेश का ‘असीरगढ़ किला’

मध्य प्रदेश देश की विविधतापूर्ण संस्कृति और धरोहरों को संजोए हुए है। जिसमें से एक है बुरहानपुर जिला, जहां आपको घूमने-फिरने की कई जगहें मिलेंगी। तो आइए चलते हैं ऐसी ही एक जगह असीरगढ़ किले की ओर।

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इंदौर-इच्छापुर राजमार्ग के किनारे सतपुड़ा की ऊंची पहाड़ी पर ऐतिहासिक व अभेद्य असीरगढ़ का किला स्थित है। इसका पहला भाग मलयगढ़, दूसरा भाग कमरगढ़ और सबसे ऊपर असीरगढ़ कहलाता है। रहस्यों से भरा यह किला हर किसी को आकर्षित करता है।

इन राजाओं ने किया शासन

कहा जाता है कि 1375 ईस्वी से पहले इस किले पर आशा अहीर नामक व्यक्ति पशुपालन किया करता था। इससे उसके पास इतना धन इकट्ठा हो गया कि आसपास के राजा-महाराजा उससे कर्ज लिया करते थे। जब इस बात की खबर खानदेश के सुल्तान नसीर खान फारुकी को लगी तो उसने छल से किले पर अपना अधिकार जमा लिया।

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इस तरह किला फारुकी राजाओं के अधीन आ गया। 200 साल तक फारुकी वंश ने यहां से शासन किया। वर्ष 1601 में मुगल सम्राट अकबर ने किले को अपने कब्जे में ले लिया और उसके बाद यहां से शुरू हुआ मुगलों का दक्षिण भारत का विजय अभियान। 1731 तक यह किला मुगलों के पास रहा। उसके बाद इस पर निजाम हैदराबाद का अधिकार हो गया। 1800 ईस्वी तक आते-आते इस किले पर मराठों का वर्चस्व हो गया और 1830 के आसपास इस पर सिंधिया परिवार ने अधिकार कर लिया। 1857 तक आते-आते यह अंग्रेजों के हाथ में चला गया।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि अंग्रेजों ने यहां से पूरे मालवा प्रांत, दक्षिण भारत और महाराष्ट्र जैसे राज्यों पर नियंत्रण किया। 1906 में अंग्रेजों ने इसे खाली कर दिया। तब से इस पर किसी का अधिकार नहीं रहा और वहीं से इस किले की बर्बादी की दास्तान शुरू हो गई। आज भी यह भारत के प्रमुख किलों में गिना जाता है। देशभर के अलावा विदेश से भी पर्यटक इसे निहारने और इसके इतिहास व रहस्यों से रूबरू होने आते हैं। एडवेंचर के लिए भी पर्यटक यहां आते हैं। पहाड़ी पर होने के कारण ट्रैकिंग के शौकीनों को भी यह आकर्षित करता है।

कैसे और कब जाएं

यहां आने के लिए 190 किमी दूर इंदौर नजदीकी हवाई अड्डा है। वहां से सड़क मार्ग से बस या निजी साधन से आ सकते हैं। यहां आने के लिए जाड़े व बरसात का समय सही रहता है।

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