आसाराम की विरासत को संभाल रही है उसकी बेटी, ली बड़ी जिम्मेदारी

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नाबालिग से रेप के मामले में सजा के बाद अब आसाराम की जिंदगी ताउम्र लाल चारदीवारी के भीतर गुजरेगी. लेकिन उस चारदीवारी के बाहर उसके आलीशान बंगले, 400 से अधिक आश्रम, 40 से अधिक स्कूल, सैकड़ों एकड़ जमीन, कारोबार और करोड़ों के बैंक बैलेंस हैं. एक आकंड़े के मुताबिक, आसाराम की संपत्ति करीब 10 हजार करोड़ रुपये है. अब सवाल उठ रहा है कि आखिर कौन उसके साम्राज्य को संभाल रहा है?

आसाराम का बेटा नारायण सांई भी कानून के शिकंजे में है. रेप, मारपीट और हत्या के आरोप जैसे कई मामले उसके खिलाफ चल रहे हैं. फिलहाल वह पिता की ही तरह जेल में बंद है और जेल से निकलने की संभावना भी कम दिख रही है. ऐसे में अब आसाराम की बेटी भारतीश्री ने दागदार विरासत को संभाल रखा है. उसके निर्देश के अनुसार आश्रम, कारोबार चल रहे हैं.

आसाराम की बेटी करती क्या है?

आसाराम की तरह ही उसकी बेटी भारतीश्री धार्मिक प्रवचन देती है. इस दौरान वह नाचती-गाती भी है. पिछले कुछ सालों से उसके पास आसाराम की विरासत संभालने की भी जिम्मेदारी है. 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में आसाराम के आश्रम का भारतीश्री अक्सर दौरा करती हैं और हर दिन आश्रम से जुड़े पदाधिकारियों से मीटिंग करती हैं. इस काम में बूढ़ी हो चली मां लक्ष्मी भी सहयोग करती है.

आपको बता दें कि 2013 में आसाराम के खिलाफ लगे रेप के आरोप के बाद उसकी पत्नी लक्ष्मी और बेटी भारतीश्री को भी गुजरात के सूरत से गिरफ्तार किया गया था. हालांकि दोनों को बाद में जमानत मिल गई. भारतीश्री और लक्ष्मी देवी पर रेप केस में आसाराम और साईं की मदद करने का आरोप है.

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आसाराम की वो संपत्ति जिसे देख रही है उसकी बेटी

आसाराम की संपत्ति की बात करें तो आसाराम के 400 से अधिक आश्रम हैं. एक जांच से खुलासा हुआ है कि 77 वर्षीय आसाराम ने जेल जाने से पहले करीब 10,000 करोड़ रुपये की संपत्ति बना ली. इसमें उस जमीन की बाजार कीमत शामिल नहीं हैं जो उसके पास है. आसाराम को रेप के मामले में उम्रकैद होने के बाद अब एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर कैसे एक गरीब परिवार के शख्स ने अध्यात्म की बात करते-करते अरबों की संपत्ति बना ली. आपको बता दें कि 1970 के दशक में साबरमती नदी के किनारे एक झोंपड़ी से उसने शुरुआत की थी.

साल 1947 के विभाजन के बाद आसाराम अपने माता-पिता के साथ पाकिस्तान के सिंध से अहमदाबाद आया और वह मणिनगर इलाके में एक स्कूल में केवल चौथी कक्षा तक पढ़ा. उसे दस साल की उम्र में अपने पिता की मौत के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी. उसने अपनी डॉक्यूमेंट्री में दावा किया है कि युवावस्था में छिटपुट नौकरियां करने के बाद आसाराम (आसुमल) ‘‘आध्यात्मिक खोज’’ पर हिमालय की ओर निकन पड़ा जहां वह अपने गुरू लीलाशाह बापू से मिला.

यही वह गुरू थे जिन्होंने 1964 में उसे ‘आसाराम’ नाम दिया. इसके बाद आसाराम अहमदाबाद आया और उसने मोतेरा इलाके के समीप साबरमती के किनारे तपस्या शुरू की. आध्यात्मिक गुरू के रूप में उसका असल सफर 1972 में शुरू हुआ जब उसने नदी के किनारे ‘मोक्ष कुटीर’ स्थापित की. साल-दर-साल ‘संत आसारामजी बापू’ के रूप में उसकी लोकप्रियता बढ़ती गई और उसकी छोटी सी झोंपड़ी आश्रम में तब्दील हो गयी. उस पर सूरत और अहमदाबाद में अपने आश्रमों के लिए जमीन हड़पने का भी आरोप है.

 

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