कुंवारी कन्याओं ने जिसको भी यह छड़ी मारी, समझो दूर भागी सारी बीमारी

छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले के ग्राम पंतोरा में रंगपंचमी की शाम कुंवारी कन्याओं ने लठमार होली खेली। उन्होंने ग्रामीणों पर जमकर छड़ियां बरसाई और एक-दूसरे पर रंग-गुलाल लगाया। रात 8 बजे तक बाजे-गाजे के साथ कन्याओं की टोली ने गांव में भ्रमण किया और जो राह में मिले, सब पर छड़ियां बरसार्इं।

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कुंवारी कन्याओं ने जिसको भी यह छड़ी मारी, समझो दूर भागी सारी बीमारी

बलौदा ब्लाक के पंतोरा में कुंवारी कन्याओं की अनोखी लठमार होली धूल पंचमी को मनाई गई। गांव वाले इसे डंगाही त्यौहार कहते हैं। सोमवार से ही कुछ ग्रामीण मड़वारानी के जंगल गए और वहां से बांस की छड़ियां काटकर सुबह गांव पहुंचे। दोपहर में मंदिर में छड़ियों की पूजा- अर्चना की गई। मंदिर परिसर में शाम 4 बजे 12 साल तक की कुंवारी कन्याएं इकट्ठा हुईं।

बैगा दीपक सारथी व पुजारी फेंकूराम देवांगन द्वारा छड़ियों की पूजा के बाद कन्याएं इन छड़ियों को हाथ में लेकर पहले भवानी मंदिर में दाखिल हुईं और देवी-देवताओं पर छड़ी के प्रहार के साथ लठमार होली शुरू हुई। मंदिर से बाजे-गाजे व रंग गुलाल के साथ ग्रामीणों की टोली के आगे-आगे छड़ी लिए बालिकाएं चल रही थीं। रास्ते में जो भी मिले उन पर ये कन्याएं टूट पड़ीम। गांव के सभी लोग अपने-अपने घरों से निकलकर लठमार होली में शामिल हुए। इस दौरान रंग गुलाल की भी बौछार हुई।

हाथों में छड़ी लिए कन्याओं की टोली ग्रामीणों के साथ गांव में रात 8 बजे तक भ्रमण कर लोगों पर छड़ियां बरसाती रहीं। ग्रामीणों का विश्वास है कि लठमार होली में जिस पर कन्याएं छड़ी का प्रहार करती हैं, उन्हें सालभर तक कोई बीमारी नहीं होती। जिले की यह अनूठी परंपरा सालों से चली आ रही है, जिसे देखने पहरिया, बलौदा, कोरबा, जांजगीर सहित आसपास के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित हुए। कन्याओं ने उन पर भी छड़ियों से प्रहार किया।

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सालभर स्वस्थ रहने की कामना लिए मां अपने दुधमुंहे बच्चों को लेकर घर के सामने कन्याओं की टोली का इंतजार करती रहीं। जैसे ही उनकी टोली घर के सामने पहुंची, बच्चों को उनके सामने कर दिया गया। कन्याओं ने उन पर भी छड़ियों का हल्का प्रहार किया।

पुलिस पर भी प्रहार

कुंवारी कन्याओं ने ड्यूटी पर तैनात पुलिस पर भी छड़ियां बरसाई। ग्रामीणों व कुंवारी कन्याओं की टोली के साथ पुलिस के जवान भी चल रहे थे। कन्याओं ने इन पर भी छड़ियों से प्रहार किया।

 

एक बार में कटी छड़ियों का उपयोग

लठमार होली के लिए चार-पांच ग्रामीण सुबह से छड़ी काटने मड़वारानी के जंगल में जाते हैं और टांगी से एक ही बार में कटने वाली छड़ी को लाया जाता है। ग्रामीण छड़ियां काटने के बाद इसे रास्ते में कहीं भी जमीन पर नहीं रखते। वे सीधे मंदिर पहुंचते हैं, जहां छड़ियों की पूजा-अर्चना होती है।

बरसाने की तर्ज पर जिले में यहीं मनाई जाती है होली

बरसाने में देश की प्रसिद्ध लठमार होली मनाई जाती है, जबकि जिले के ग्राम पंतोरा में धूलपंचमी के दिन लठमार होली मनाई जाती है। हालांकि इसमें लाठी की जगह छड़ियों से प्रहार होता है और इसमें सिर्फ कुंवारी कन्याएं ही छड़ी बरसाती हैं। ऐसे में अपने आप में यह अनूठी होली है। ग्रामीणों को इसका इंतजार सालभर से रहता है। कई घरों में इस होली का आनंद लेने व बच्चों को आशीर्वाद दिलाने बड़ी संख्या में मेहमान भी पहुंचते हैं।

सौ साल से भी पुरानी परंपरा

 

मां भवानी मंदिर पंतोरा के पुजारी फेंकूराम देवांगन का कहना है कि लठमार होली कब से खेली जा रही है इसकी जानकारी नहीं है। पूर्वज बताते हैं कि सौ से डेढ़ सौ साल पहले से यह परम्परा चली आ रही है। यह किवदंती है कि काफी समय पहले एक बार गांव में हैजा का प्रकोप हुआ तब मां भवानी ने स्वप्न में आकर बैगा को कहा गया कि ग्रामीणों को रोग से मुक्ति दिलाने के लिए इस तरह की होली की शुरुआत करनी होगी तब से यह परम्परा चली आ रही है।

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