एक साल में काफी बदल गई बिकरू गांव की तस्वीर, जानें अब कैसा चल रहा हैनं वहां सबकुछ…

बिकरू… कानपुर देहात का वो गांव जो आज से ठीक एक साल पहले देशभर में चर्चा का विषय बन गया था। दो जुलाई की उस स्याह रात में यहां जो घटा वो आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। बेशक, बेहिसाब जख्मों को दिल में दबाए बैठा ये गांव अब शांत है और यहां के लोग शांति से जीवन जी रहे हैं, लेकिन बहुत कुछ ऐसा है जो आज भी क चोटता है। आगे विकास का ‘किला’ कही जाने वाली खंडहर इमारत और मलबा दिखा, जहां अब घास उग आई है। आसपास कुछ ग्रामीण भी थे जो पेड़ की छांव में बैठे चर्चा कर रहे थे। जब इनसे बातचीत की तो ठीक एक साल पहले का वो दिन याद कर इनका चेहरा भाव शून्य हो गया। बोले- आज भी गोलियों की तड़तड़ाहट और पुलिस वालों की चीखें कानों में ऐसे गूंजती हैं, जैसे कल की ही बात हो।

मसलन विकास के खंडहर मकान के सामने एक बरात के लिए स्वागत द्वार भी सजा दिखा। गांव निवासी एक परिवार की बेटी की शादी तैयारियां चल रही थीं। विकास के रहते उसके दरवाजे पर कोई गाड़ी खड़ी नहीं कर सकता था। जहां दिनभर चहलकदमी रहती थी अब सन्नाटा था। 

ये हुआ था उस दिन: दो जुलाई 2020 की रात बिकरू गांव में पुलिस ने विकास दुबे को पकड़ने के लिए उसके घर दबिश दी थी। दुर्दांत ने रास्ते में जेसीबी लगाकर पुलिसकर्मियों की घेराबंदी करके ताबड़तोड़ फायरिंग कर तत्कालीन सीओ बिल्हौर देवेंद्र मिश्र समेत आठ पुलिस कर्मियों को शहीद कर दिया था। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने विकास समेत छह लोगों को एनकाउंटर में मार गिराया था, जबकि 37 लोगों को गिरफ्तार करके जेल भेजा जा चुका है।

नहीं बनी अस्थायी पुलिस चौकी, दो सिपाहियों के कंधे पर सुरक्षा: बिकरू कांड के बाद ग्रामीणों ने यहां अस्थायी पुलिस चौकी बनाने की मांग की थी। बिकरू कांड को एक साल हो गया है, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से अब तक यहां पर चौकी नहीं बनाई जा सकी है। रात के वक्त दो सिपाहियों के कंधों पर बिकरू गांव की सुरक्षा की जिम्मेदारी रहती है।

पहली बार हुआ मतदान: 25 वर्षों बाद ग्रामीणों को स्वतंत्र रूप से मतदान कर गांव की सरकार चुनने का भी मौका मिला। अब यहां की प्रधान डिब्बा निवादा निवासी मधू कमल हैं। आसपास के बसेन, कंजती, देवकली, सखरेज, दिलीप नगर आदि में भी वोट पड़े और नए प्रधान चुने जा चुके हैं।

दुर्दांत के गुर्गों के स्वजन की नाराजगी: कुछ लोगों में आज भी विकास का खौफ बरकरार है। ग्रामीण खुलकर बोलने से कतराते हैं। उनकी एक आवाज पर जान गंवाने वाले गुर्गों के स्वजन भी विकास की मां और पत्नी से नाराज हैं। कहते हैं कि वह गांव तो आती हैं, लेकिन किसी भी परिवार से नहीं मिलतीं, जिनके लिए उनका परिवार उजड़ गया, उन्हीं ने बेगाना कर दिया है।    

अमर दुबे की दादी ने की बातचीत: विकास के शूटर और मुठभेड़ में मारे गए अमर दुबे के घर पहुंची। अमर की दादी ज्ञानवती बोलीं कि जेल में बंद अपनी बहू से मिलने के लिए कई बार माती जा चुकी हूं। उसके परिवार वालों से मुलाकात हो जाती है। यहां हाल लेने कोई नहीं आता। विकास के लिए पूरा परिवार बर्बाद हो गया। उसकी मां सरला देवी और पत्नी रिचा गांव आते हैं, लेकिन हाल नहीं पूछते। 

इनकी भी सुनिए: 

  • दुकानदार नबी बक्स ने बताया कि घटना के बाद से अक्सर पुलिस गांव आती-जाती रहती है। अब्दुल सत्तार बोले, अब तो शांति ही है। गांव में कहीं भी आने-जाने में कोई पाबंदी नहीं है। 
  • विकास के घर के सामने रहने वाले और मामले में गिरफ्तार हुए उमाकांत के दरवाजे पर बैठी बेटियों ने बताया कि पुलिस की कार्रवाई से परेशान हैं। गुजर के लिए रिश्तेदारों के आगे हाथ फैलाने पड़ रहे हैं। सरकारी राशन एक साल से नहीं मिला। 
  • कुख्यात के मुंह बोले मामा प्रेम कुमार पांडेय की पत्नी सुषमा ने पहले तो दरवाजा नहीं खोला। समझाने पर दरवाजा खोलकर बताया कि चलने-फिरने में असहाय हैं। बहू वर्षा उर्फ मनू भी बच्चों को लेकर अपने मायके चली गई है। गांव के लोग जो देते हैं खा लेती हूं। ऊपर वाले से दो चीजें मांगती हूं, या तो बेटे की रिहाई या अपनी मौत।

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