90% स्वदेशी उपकरणों से लैस है सेमी-हाईस्पीड नमो भारत रेल

नमो भारत ट्रेन मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की सबसे बड़ी मिसाल भी है। आरआरटीएस प्रोजेक्ट में उपयोग हो रही तकनीक और कोच का 90% हिस्सा देश में ही बना है।

दिल्ली-मेरठ के बीच 160 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ रही नमो भारत ट्रेन सिर्फ स्पीड का कमाल नहीं है। यह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की सबसे बड़ी मिसाल भी है। आरआरटीएस प्रोजेक्ट में उपयोग हो रही तकनीक और कोच का 90% हिस्सा देश में ही बना है।

आरआरटीएस परियोजना में कोच, बंंगलूरू से तकनीक, तीन राज्यों के 1800 एमएसएमई से दिए गए पार्ट्स का उपयोग किया गया है। जापान की मदद से मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन 2028 से पहले आने की संभावना नहीं है। नमो भारत वर्तमान में 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकती है।

वर्तमान में दिल्ली से मेरठ तक 160 किमी/घंटा की स्पीड से दौड़ रही है। एनसीआरटीसी के अनुसार आरआरटीएस ने साबित किया कि सेमी-हाईस्पीड का पूरा इकोसिस्टम भारत में बन सकता है। अब अगला लक्ष्य 250 किमी/घंटा की रफ्तार वाली ट्रेन चलाना है। नमो भारत ने दिखाया कि भारत सिर्फ हाईस्पीड ट्रेन चला नहीं सकता, बना भी सकता है।

नमो भारत रेल में कौन से स्वदेशी उपकरण
कोच निर्माण: नमो भारत के सभी कोच गुजरात के सावली स्थित बॉम्बार्डियर-अल्सटॉम प्लांट में बने हैं। नमो रेल का एयरोडायनामिक नोज वाला डिजाइन, हल्का स्टेनलेस स्टील बॉडी और 100% एयरकंडीशंड कोच भारत में तैयार हुए। एक ट्रेनसेट में 6 कोच हैं और हर कोच 72 सीटों वाला है।
सिग्नलिंग सिस्टम: यूरोपियन ट्रेन कंट्रोल सिस्टम लेवल-2 आधारित ईटीसीएस सिग्नलिंग पहली बार भारत में आरआरटीएस पर लगी है। इसका सॉफ्टवेयर और इंटीग्रेशन अल्सटॉम इंडिया ने बंगलूरू में किया। यह सिस्टम 180 किमी/घंटा तक की स्पीड को सपोर्ट करता है और ट्रेनों के बीच 3 मिनट का अंतराल संभव बनाता है।
प्लेटफॉर्म स्क्रीन डोर: यात्रियों की सुरक्षा के लिए हर स्टेशन पर लगाए गए फुल-हाइट पीएसडी भी भारत में बने हैं। इन्हें मानेसर की एक कंपनी ने एनसीआरटीसी के साथ मिलकर डिजाइन किया।
ऊर्जा बचत तकनीक: ट्रेनों में रिजनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम है। ब्रेक लगाने पर 30% बिजली वापस सिस्टम में चली जाती है। इससे सालाना 25 करोड़ यूनिट बिजली बचने का अनुमान है।
मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम: कोच के लिए दरवाजे, सीटें, वातानुकूल और हवादार, लाइटिंग, विंडो ग्लास – 80% वेंडर भारतीय हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, हरियाणा के एमएसएमई सप्लाई चेन का हिस्सा बने। कुल 1,800 करोड़ के ऑर्डर भारतीय कंपनियों को मिले।

सिर्फ ट्रेन नहीं, नई इंडस्ट्री खड़ी हुई

एक्सपोर्ट का रास्ता : सावली प्लांट में बना आरआरटीएस डिजाइन अब एशिया-अफ्रीका के देशों को एक्सपोर्ट करने की तैयारी है। भारत हाईस्पीड ट्रेन का मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है।
स्किल डेवलपमेंट: इस प्रोजेक्ट से 5,000 से ज्यादा इंजीनियर और टेक्नीशियन को हाईस्पीड रोलिंग स्टॉक, सिग्नलिंग और पीएसडी की स्पेशल ट्रेनिंग मिली। मेरठ आईटीआई में आरआरटीएस से संबंधित कोर्स शुरू किया जाने वाला है।
लागत में कमी: पूरी तरह आयातित सिस्टम के मुकाबले नमो भारत की लागत 40% कम है। प्रति किमी निर्माण लागत 280 करोड़ है, जबकि बुलेट ट्रेन की 1,100 करोड़ अनुमानित है।
अगला फेज: दिल्ली-अलवर और दिल्ली-पानीपत कॉरिडोर के लिए भी 60 ट्रेनसेट का ऑर्डर भारतीय प्लांट को ही मिलेगा। इससे 2030 तक 10 हजार करोड़ का घरेलू बाजार बनेगा।

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