तेज रफ्तार से आगे बढ़ता चीन, शोध खर्च में अमेरिका को पछाड़ा

अमेरिका जहां 80 वर्षों तक विज्ञान और तकनीक में दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र रहा, वहीं अब चीन ने उस बढ़त को सीधी चुनौती दे दी है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन का शोध एवं विकास खर्च अब अमेरिका के बराबर पहुंच गया है और क्रय शक्ति के आधार पर उसे पार भी कर चुका है।
दोनों देशों ने एक लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा का निवेश कर दिया है, लेकिन असली कहानी चीन की तेज चढ़ाई है। 1980 में जहां चीन शोध खर्च में सबसे पीछे था, वहीं आज वह सबसे आगे निकलने की स्थिति में है।
नेचर इंडेक्स में भी चीन ने हासिल की 17 प्रतिशत की बढ़त
यह बढ़त अचानक नहीं आई। 2019 में चीन ने सबसे ज्यादा उद्धृत होने वाले शोधपत्रों में अमेरिका को पीछे छोड़ा, 2022 में कुल प्रभावशाली शोध में पहला स्थान हासिल किया और 2024 में कुल वैज्ञानिक प्रकाशनों में भी अमेरिका को पछाड़ दिया। नेचर इंडेक्स में भी चीन 17 प्रतिशत की बढ़त के साथ आगे रहा। पेटेंट के मामले में भी अंतर साफ है, 2024 में चीन ने लगभग 18 लाख पेटेंट आवेदन किए, जबकि अमेरिका करीब छह लाख पर सिमट गया।
धीरे-धीरे चीन ओर खिसक रहा वैज्ञानिक नेतृत्व
ये आंकड़े बताते हैं कि अब वैज्ञानिक नेतृत्व धीरे-धीरे चीन की ओर खिसक रहा है।अमेरिका की ढिलाई और बदलती नीतियांरिपोर्ट का दूसरा अहम पहलू यह है कि समस्या सिर्फ चीन की तेजी नहीं, बल्कि अमेरिका की धीमी पड़ती रफ्तार भी है। अमेरिका में सरकारी शोध निवेश लगातार घट रहा है।
1964 में जीडीपी का 1.86 प्रतिशत रहने वाला खर्च 2021 तक घटकर 0.66 प्रतिशत रह गया। साथ ही, निजी कंपनियों ने भी खुले वैज्ञानिक शोध से दूरी बनाकर विकास पर ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया है, जिससे साझा ज्ञान का दायरा सिमट रहा है।
इसके अलावा, अमेरिका में विदेशी शोधकर्ताओं पर सख्ती और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर नियंत्रण जैसी नीतियां भी असर डाल रही हैं। यही वह खुलापन था जिसने अमेरिका को दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली दिमागों का केंद्र बनाया था। अब वही प्रतिभाएं यूरोप और चीन जैसे देशों की ओर रुख कर रही हैं।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत के लिए यह बदलाव एक बड़ा संकेत है। हाल के वर्षों में भारत का शोध एवं विकास निवेश जीडीपी के करीब 0.6-0.7 प्रतिशत के आसपास रहा है, जो चीन और अमेरिका की तुलना में काफी कम है।
हालांकि, देश के पास युवा वैज्ञानिकों की बड़ी ताकत और तेजी से बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम मौजूद है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भारत शिक्षा, शोध संस्थानों और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल के साथ निवेश बढ़ाता है, तो वह इस बदलते वैश्विक परि²श्य में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।





