अलग तरह से लोगों के चेहरे पहचानते हैं नवजात शिशु, मां की गंध की लेते हैं मदद

यह सच है कि नवजात शिशुओं को अपने आसपास की समझ पनपने में समय लगता है. पर रोजमर्रा की जिंदगी में हम यह समझ नहीं पाते हैं. हमें लगता है कि बच्चा हमें देख रहा है, पहचानने की कोशिश कर रहा है. या सुनकर समझने की कोशिश कर रहा है. लेकिन ऐसा शुरू से नहीं होता है. साइंटिस्ट की एक टीम ने एक नई खोज की है कि शिशु अपनी मां की गंध के कारण चेहरे देख पाते हैं. यह खोज काफी हैरान करने वाली मानी जा रही है.

कई संस्थानों के शोधकर्ताओं ने यह समझने के लिए एक अध्ययन किया कि शिशु अपनी माताओं की गंध का उपयोग चेहरे को समझने के लिए कैसे करते हैं. अध्ययन के नतीजे दिलचस्प हैं और पहले कभी नहीं सुने गए. पाया गया है कि शिशु की इस खास क्षमता में चार से 12 महीनों के बीच बहुत सुधार होता है.

बड़े शिशु मुख्य रूप से चेहरे को समझने के लिए दिखने वाली जानकारी का उपयोग करने में काबिल होते हैं. यूनिवर्सिटी डी बोर्गोग्ने के सेंटर फॉर टेस्ट, स्मेल एंड फीडिंग साइंसेज (CSGA) के मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अर्नोद लेलेउ ने कहा, “मानव मस्तिष्क में संवेदी धारणा कैसे काम करती है, इसमें मेरी लंबे समय से रुचि है.

“देखने की समझ” एक जटिल तंत्रिका संबंधी काबिलियत है जो पिछले अनुभव से मिलती है जिसमें एक ही समय में सभी इंद्रियों से अलग-अलग उत्तेजनाएं आती हैं.” डॉ. लेलेउ ने यह जांच करने के लिए शोध किया कि शिशु के मस्तिष्क में सूंधने के जरिए देखने की समझ का विकास किस तरह से आकार लेता है.

अध्ययन में, यह पाया गया कि चेहरे को देख कर समझने की क्षमता मां की गंध से बढ़ जाती है. वही जब शिशु बड़े हो जाते हैं और केवल देखने के संकेतों से ही चेहरे को कुशलतापूर्वक समझने में लगते हैं, तो यह क्षमता कम हो जाती है.

शिशिओं में ऐसी छोटी छोटी बातें, जैसे नजारों को समझना, आवाज को समझना, वगैरह, सीखने के लिए दिमाग और अंगों के बीच के संकेतों का आदान प्रदान तो अहम है, लेकिन उसके शुरुआती संपर्क ज्यादा जरूरी है. बाद में यह याद्दाश्त, भाषा और वैचारिक तर्क जैसी काबिलियतों के विकास के लिए भी एक आधारशिला का काम करता है.

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