कोहिनूर हीरे की उत्पत्ति कैसे हुई? क्यों कहते हैं इसे शापित

कोहिनूर हीरा (Kohinoor Diamond) और होप डायमंड (Hope Diamond) समेत दुनिया में कई रत्न हैं, जिनकी कीमत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. ये रत्न विशिष्ट हैं, तो इनकी चमक बेहद खास. ये काफी बड़े हैं, और इनके मुकाबले में दुनिया का कोई रत्न नहीं. कोहिनूर तो ब्रिटिश क्राउन ज्वेलस की शोभा है. इसका वजन 105.60 कैरेट है. जबकि वाशिंंगटन की स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में रखे गए होप डायमंड का वजन 45.52 कैरेट है. कई बार इन हीरों की उत्पत्ति को लेकर सवाल किए गए. कोहिनूर को लेकर कई कहानियां है. दावा किया जाता है कि ये हीरे 1600 से 1800 के बीच दक्षिणी भारत में खोजे गए थे. बाद में इन्हें ब्रिटेन और अन्य देशों में पहुंचाया गया. अब वैज्ञानिकों ने पहली बार इनकी उत्पत्ति का रहस्य सुलझाने का दावा किया है.
कोहिनूर हीरे को शापित हीरा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जिस राजा के पास ये गया, उनकी जान चली गई. इसी तरह होल डायमंड, रीजेंट डायमंड की कहानियां भी काफी मशहूर हैं. कहा जाता है कि लौवर म्यूजियम में रखे गए रीजेंट डायमंड को एक हीरा खनिक खदान से चुराकर लाया था. उसने इस हीरे को अपने पैर में बने घाव के अंदर छुपा लिया था. वैज्ञानिकों के मुताबिक, आमतौर पर ऐसे हीरे नदी के किनारे तलछट में खोदे गए गड्ढों में पाए जाते है. लेकिन जब ज्वालामुखी विस्फोट होता है, तो ये बाहर आ जाते हैं. इस इलाके को किम्बरलाइट फील्ड कहा जाता है.
आंध्र प्रदेश के वज्रकरुर में इनकी उत्पत्ति
हाल ही में जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में पब्लिश एक रिसर्च में दावा किया गया कि कोहिनूर समेत दुनिया के सबसे फेमस हीरे भारत के आंध्र प्रदेश के वज्रकरुर किम्बरलाइट फील्ड से 300 किलोमीटर दूर पाए गए. यरूशलेम के हिब्रू विश्वविद्यालय में हीरों का अध्ययन करने वाले भू-रसायनज्ञ याकोव वीस ने कहा, हमने पाया कि वज्रकरुर में जैसी जमीन है, वह हीरों के लिए मजबूत आधार है. हमने यहां की मिट्टी का अध्ययन किया. पता चला कि लिथोस्फीयर यानी कठोर परत और ऊपरी मेंटल में ऐसे हीरों को रखने के पर्याप्त सबूत हैं. गोलकुंडा के हीरे मेंटल में अधिक गहराई में बने हैं. शायद धरती के केंद्र के आसपास ये बने होंगे.
बड़े हीरे पृथ्वी की गहराई से आ रहे
सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के भू वैज्ञानिकों हीरो कालरा, आशीष डोंगरे और स्वप्निल व्यास ने यह रिसर्च की. कहा, हमारा मानना है कि बड़े हीरे पृथ्वी की गहराई से आ रहे हैं. वज्रकरुर क्षेत्र से किम्बरलाइट चट्टानें संभवतः उस गहराई से उठी हैं, जहां हीरे गढ़े जाते हैं. रिमोट सेंसिंग डेटा से पता चला कि यहां एक प्राचीन नदी हुआ करती थी, जो हीरों को कृष्णा नदी और उसकी सहायक नदियों तक बहाकर ले गई. जहां ये पाए गए. उन्होंने कहा, कोई नहीं जानता कि ये गहरे हीरे पृथ्वी की सतह तक कैसे पहुंचते हैं. लेकिन जब ज्वालामुखी विस्फोट होता है, तो ये धरती के गर्भ से बाहर आ जाते हैं और ऊपरी सतह मेंटल में फंस जाते हैं. फिर जब किम्बरलाइट विस्फोट होता है, तो ये धरती की सतह पर नजर आने लगते हैं. कोहिनूर और अन्य हीरे भी इसी तरह धरती से बाहर आए.





