उत्तराखंड: ‘जल प्रहरी’ बनकर सूखे जलाशयों को नवजीवन देने में जुटी हुई क्षेत्र की बेटियां….

उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में जब भी जीवटता की बात होती है, ध्यान चौंदकोट क्षेत्र के उन बाशिंदों की ओर चला जाता है, जिन्होंने पांच के दशक में कुदाल व फावड़ा थामकर चंद दिनों में ही 30-30 किमी लंबी दो सड़कें बना पूरे क्षेत्र को मुख्य सड़क मार्ग से जोड़ दिया था। ‘जनशक्तिमार्ग’ के रूप में आज भी यह मार्ग क्षेत्रवासियों को राहत प्रदान कर रहा है। अब इसी क्षेत्र की बेटियां ‘जल प्रहरी’ बनकर सूखे जलाशयों को नवजीवन देने में जुटी हुई हैं।

क्षेत्र के गांवों की बेटियां आगे आईं तो अन्य लोग भी इस मुहिम में जुड़ते गए। अब सभी मिलकर अपने क्षेत्र में पुरखों के बनाए जलाशयों को पुनर्जीवन देने का प्रेरक प्रयास कर रहे हैं।

पौड़ी गढ़वाल जिले का चौंदकोट क्षेत्र अपनी नैसर्गिक सुंदरता और अपने निवासियों के पुरुषार्थ के बूते समूचे उत्तराखंड में अलग पहचान रखता है। जहां एक ओर वर्ष 1951 में इस क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों ने श्रमदान के बूते चंद दिनों में ही 30-30 किमी के मोटर मार्गों का निर्माण कर देश-दुनिया को श्रमशक्तिकी अहमियत समझाई, वहीं अब क्षेत्र की मातृशक्तियुवा जोश को साथ ले क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे पेयजल संकट को खत्म करने की दिशा में कार्य कर रही है।

जल प्रहरी के रूप में बालिकाएं अपने-अपने गांवों में वर्षा जल संरक्षण के लिए चाल-खाल (छोटे-बड़े जलाशय) बनाने में जुटी हुई हैं। स्थानीय संस्था भलु लगदु इन्हें इस काम में सहयोग कर रही है। आसपास के अनेक गावों की बेटियों ने मिलकर पूरे क्षेत्र में पुराने चाल-खालों और तालाबों को सहेजने का संकल्प लिया है और इस दिशा में वह तेजी से आगे भी बढ़ रही हैं।

12वीं कक्षा में अध्ययनरत पोखड़ा ब्लॉक की दीपा को आभास है कि उनके क्षेत्र के लोग ही नहीं, वरन पूरी दुनिया आज जल संकट की गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। दीपा ने कुदाल उठाई और अकेले ही चाल-खाल बनाने में जुट गई। प्रयास सफल रहा और दीपा ने स्वयं की मेहनत से दो मीटर लंबा, एक मीटर चौड़ा और दो मीटर गहरा ताल बना डाला।

यह प्रयास क्षेत्रवासियों की प्रेरणा का सबब बना। नूतन, तनु, निर्मला सुंद्रियाल, वंदना बिष्ट… अब दीपा जैसी अनेक बेटियां जल प्रहरी बन इस काम में जुट गई हैं। इनके नेतृत्व में अब तक करीब दर्जनभर जलाशय तैयार किए जा चुके हैं।

भलु लगदु संस्था के सुधीर सुंद्रियाल बताते हैं कि गत वर्ष शुरू हुई इस मुहिम में 150  महिलाएं और अनेक ग्रामीण शामिल हैं। उन्होंने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में कभी पेयजल के अनेक प्राकृतिक स्रोत हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ ये जलस्रोत सूखते चले गए।

पर्वतीय क्षेत्रों में जहां-जहां पानी के भूमिगत सोते (जलस्रोत) होने की संभावना होती है, वहां छोटे-छोटे तालाब बनाकर पानी को एकत्र किया जाता है। उन्हीं छोटे तालाबों को चाल-खाल कहा जाता है। बरसात में चाल-खाल में वर्षा जल एकत्र होता है, जो जमीन में से रिसकर कमजोर या मृत हो चुके प्राकृतिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करता है।

Back to top button