SP-BSP Alliance : मिले मुलायम-कांशीराम, हवा हो गए जयश्रीराम

लखनऊ। अब उत्तर प्रदेश की राजनीतिक हवा का रुख बदल गया है जो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी एक दूसरे का विरोध करती थी वो अब एक हो गई है अब जब सपा-बसपा का मेल हो गया है तो अब उत्तर प्रदेश की जनता को नया नारा भी सुनने को जरूर ही मिलेगा। 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीएसपी का नारा ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है’।
वहीं ‘उत्तर प्रदेश को ये साथ पसंद है’ का नारा देने वाली एसपी को अब कांग्रेस ‘नापसंद’ है । राजनीतिक विश्लेषक विमल किशोर का कहना है कि ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा हो गए जयश्रीराम’ 1993 में जब उत्तर प्रदेश में एसपी और बीएसपी ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था तो भारतीय जनता पार्टी को टार्गेट करता हुआ यह नारा काफी चर्चित रहा।’
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उन्होंने कहा, ‘अब एक बार फिर एसपी-बीएसपी साथ हैं लेकिन नेतृत्व बदल गए हैं। मुलायम की जगह अखिलेश यादव और कांशीराम की जगह मायावती हैं। एसपी-बीएसपी ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन कर उत्तर प्रदेश की सीटों का बंटवारा भी कर लिया है तो ऐसे में दिलचस्प नारे सामने जरूर आएंगे ।’
किशोर ने पहले के कुछ दिलचस्प चुनावी नारों की याद दिलाई। 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीएसपी का नारा ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है’ खासा चला। 2014 में बीजेपी ने नारा दिया, ‘अबकी बार मोदी सरकार’ जो पार्टी की विजय का कारक बना। ‘जात पर न पात पर, मुहर लगेगी हाथ पर’, 1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का दिया गया यह नारा खूब गूंजा।
चुनावी मौसम में नारों को संगीत में पिरोकर लाउडस्पीकर के सहारे आम लोगों तक पहुंचाने वाले लोक कलाकार आशीष तिवारी ने कहा, ‘इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं।’ यह नारा एक समय जनसंघ के नारे ‘जली झोपड़ी भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल’ के जवाब में कांग्रेस का पलटवार था। उन्होंने बताया कि बीजेपी ने शुरूआती दिनों में जोरदार नारा दिया था, ‘अटल, आडवाणी, कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’।
सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए बीजेपी ने 1999 में नारा दिया, ‘राम और रोम की लड़ाई ।’ तिवारी ने कहा कि राम मंदिर आंदोलन के समय बीजेपी और आरएसएस के नारे ‘सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे’, ‘ये तो पहली झांकी है, काशी मथुरा बाकी है’, ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ जनभावनाओं के प्रचंड प्रेरक बने।
इस नारे के जवाब में आज तक यह कहकर तंज किया जाता है ‘पर तारीख नहीं बताएंगे।’ उन्होंने बताया कि बीजेपी ने 1996 में नारा दिया था, ‘सबको देखा बारी बारी, अबकी बारी अटल बिहारी’ खूब चला । पिछले चार दशकों से राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रद्युम्न तिवारी ने कहा कि 1989 के चुनाव में वी पी सिंह को लेकर ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’, दिया गया नारा उन्हें सत्ता की सीढियां चढ़ा ले गया।
साल 1971 में इंदिरा गांधी अपनी हर चुनावी सभा में भाषण के अंत में एक ही वाक्य बोलती थीं- ‘वे कहते हैं, इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, फैसला आपको करना है।’ तिवारी ने कहा कि बीएसपी ने कांग्रेस और बीजेपी की काट के लिए दिलचस्प नारा दिया था, ‘चलेगा हाथी उड़ेगी धूल, ना रहेगा हाथ, ना रहेगा फूल’। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी जब पहली बार चुनाव प्रचार करने अमेठी गई तो कांग्रेसियों का यह नारा हिट रहा था, ‘अमेठी का डंका, बेटी प्रियंका’।
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सभी पार्टी अपने अपने नए नारे बनाने में लगी है अब तो आने वाला वक़्त ही बताएगा की कौन सी पार्टी अपना कौन सा नया नारा लाएगी। उत्तर प्रदेश की जनता को इसका इंतजार तो है और गठबंधन की सरकार बनेगी या फिर किसी और पार्टी की ये तो लोकसभा चुनाव के नतीजे ही बताएँगे।





