अब पर्यावरणीय सेवाओं की कीमत मांगेगा उत्तराखंड, जानने के लिए पढ़िए पूरी खबर

देहरादून: हिमालयी क्षेत्र का उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है, जिसने अपने हितों को दरकिनार करते हुए देश के फायदे को सबसे आगे रखा है। देशवासियों को शुद्ध आबो हवा मिल सके, इसके लिए उत्तराखंड ने अपने विकास को पीछे छोड़ दिया। जी हां वन आच्छादित उत्तराखंड हमेशा से ही पर्यावरण संरक्षण के मामले में आगे रहा है। इसके बावजूद आजतक राज्य को इसका फायदा नहीं मिल पाया। इसलिए अब उत्तराखंड केंद्र सरकार के सामने ऑक्सीजन की कीमत के लिए खड़ा होगा। वहीं, 15वें वित्त आयोग ने राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी), जीएसटी से राज्य की आमदनी में 39 फीसद की कमी, तकरीबन हर साल आपदा से हो रहे बड़े नुकसान और पर्यावरणीय सेवाओं और प्रतिबंधों से राज्य की आर्थिक प्रगति में पेश आ रही बाधाओं के समाधान भरोसा बंधाया।

खुद तकलीफें झेलकर पर्यावरण संरक्षण के जरिये देश की आबोहवा को शुद्ध और सांस लेने लायक बनाने में उत्तराखंड अहम योगदान दे रहा है। विषम भूगोल वाला यह राज्य करीब तीन लाख करोड़ की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। इसमें अकेले यहां के वनों का योगदान 98 हजार करोड़ के लगभग है।

ज्यादा सुरक्षित हैं यहां के जंगल  

71.05 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में जंगलों को सहेज पर्यावरण संरक्षण यहां की परंपरा का हिस्सा है। यही वजह भी है कि यहां के जंगल अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित हैं। कुल भूभाग का लगभग 46 फीसद फॉरेस्ट कवर इसकी तस्दीक भी करता है। इससे न सिर्फ पहाड़ महफूज हैं, बल्कि पर्यावरण के मुख्य कारक हवा, मिट्टी व पानी भी। यही नहीं, गंगा-यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों का उद्गम भी उत्तराखंड ही है। हर साल ही वर्षाकाल में बड़े पैमाने पर यहां की नदियां अपने साथ बहाकर ले जाने वाली करोड़ों टन मिट्टी से निचले इलाकों को उपजाऊ माटी देती आ रही है।

उत्तराखंड सालाना कितने की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। इसे लेकर पूर्व में 107 बिलियन रुपये का अनुमान लगाया गया था, लेकिन बाद में राज्य सरकार ने खुद इसका आकलन कराने का निश्चय किया। नियोजन विभाग के जरिये इको सिस्टम सर्विसेज को लेकर सालभर तक यह अध्ययन चला। इस अध्ययन से अनुमान लगाया गया कि राज्य के वनों से ही अकेले 98 हजार करोड़ रुपये की सालाना पर्यावरणीय सेवाएं मिल रही हैं।

जंगलों के साथ ही नदी, सॉयल समेत अन्य बिंदुओं को भी शामिल कर लिया जाए तो इन सेवाओं का मोल लगभग तीन लाख करोड़ से अधिक बैठेगा। इन पर्यावरणीय सेवाओं के चक्कर में राज्य को कर्इ मुश्किलों से होकर गुजरना पड़ रहा है। वन कानूनों की बंदिशों के चलते कर्इ परियोजनाएं धरातल पर नहीं उतर पा रही हैं, जबकि संरक्षित क्षेत्रों और इको सेंसिटिव जोन के प्रावधानों ने नींद उड़ा दी है। 

जल विद्युत परियोजनाएं अधर में 

देश को शुद्ध हवा तो मिल जाएगी, लेकिन उत्तराखंड के विकास में अहम भूमिका निभाने वाली जल विद्युत परियोजनाओं का क्या। पर्यावरण संरक्षण के फेर में जल विद्युत परियोजनाएं भी फंसी हुर्इ हैं। राज्य में करीब चौबीस जल विद्युत परियोजनाएं अधर में हैं। दस परियोजनाएं अकेले भागीरथी इको सेंसिटिव जोन की हैं। 

वन संरक्षण पर खतरे में जनजीवन 

उत्तराखंड भले ही वन संरक्षण के मामले में आगे हो, लेकिन ये बात भी सच है कि वन संरक्षण का खामियाजा उसे बड़ी कीमत चुकाकर भी भुगतना पड़ रहा है। राज्य गठन से लेकर अब तक वन्यजीव हमलों में करीब छह सौ पंद्रह लोग मारे जा चुके हैं तो एक हजार आठ सौ लोग घायल हुए हैं।

खेती हो रही है चौपट, पलायन कर रहे लोग  

अब जंगल बढ़ेंगे तो वन्यजीवों भी आबादी तक पहुंचेंगे ही। ऐसे में लोगों की दुश्वारियां बढ़ना लाजमी है। लोगों पर हमलों के साथ ही वन्यजीव खेतों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जिसके चलते किसान मायूस हैं। वन्यजीव आबादी की तरफ रुख न करें इसको लेकर भी ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। वन्यजीवों के हमले और खेती के चौपट होने से लोग गांवों को छोड़ मैदान की तरफ पलायन करने को मजबूर हैं। पिछले अट्ठारह सालों में कुल एक लाख हेक्टेयर भूमि भी बंजर हो गर्इ है, जो एक बड़ी समस्या है। 

आजतक नहीं मिल पाया ग्रीन बोनस 

पर्यावरणीय सेवाओं के लिए भले ही उत्तराखंड को हमेशा सराहना मिली हो, लेकिन इसके नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए कुछ भी नसीब नहीं हुआ है और राज्य का ग्रीन बोनस के लिए इंतजार सालों से खत्म नहीं हो पाया है। ऐसे में किस तरह से पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाया जाए ये चुनौती अब भी बनी हुर्इ है। 

राज्य की झोली में अब ज्यादा केंद्रीय मदद

उत्तराखंड को 14वें वित्त आयोग से मिली मायूसी दूर होने के संकेत हैं। ऐसा हुआ तो वर्ष 2020 से 2025 तक पांच वर्षों के लिए केंद्र सरकार से अधिक मदद राज्य की झोली में गिरेगी। 15वें वित्त आयोग ने राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी), जीएसटी से राज्य की आमदनी में 39 फीसद की कमी, तकरीबन हर साल आपदा से हो रहे बड़े नुकसान और पर्यावरणीय सेवाओं और प्रतिबधों से राज्य की आर्थिक प्रगति में आ रही बाधाओं के समाधान भरोसा बंधाया। आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह ने कहा कि आयोग राजस्व घाटा अनुदान देने समेत अन्य मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक और सकारात्मक दृष्टि से विचार करेगा।    

15वें वित्त आयोग ने दो दिनों तक सरकार, आला अधिकारियों, राजनीतिक दलों व शहरी निकायों व पंचायतों के जनप्रतिनिधियों, उद्यमियों-कारोबारियों समेत तमाम स्टेक होल्डर्स के साथ बैठक कर उत्तराखंड के आर्थिक और वित्तीय हालात का जायजा लिया। मंगलवार को सचिवालय स्थित मीडिया सेंटर में पत्रकारों से मुखातिब आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह ने राजस्व घाटा अनुदान, ग्रीन बोनस, जीएसटी के राजस्व में कमी और तकरीबन हर साल आपदाओं को लेकर राज्य की चिंताओं को प्रथम दृष्ट्या वाजिब माना।

उन्होंने कहा कि पिछले वित्त आयोग से राजस्व घाटा अनुदान नहीं मिलने की निराशा को राज्य सरकार ने सामने रखा है। उन्होंने आरडीजी पर सकारात्मक दृष्टिकोण से विचार करने की बात कही। राज्य को दोबारा निराश नहीं होना पड़ेगा। 

आरडीजी मामले में एक आयोग की किसी दूसरे आयोग पर टिप्पणी परंपरा के मुताबिक अथवा संवैधानिक, दोनों ही दृष्टि से सही नहीं मानने के बावजूद उन्होंने परोक्ष तौर पर राज्य के साथ हुई नाइंसाफी को स्वीकार किया। राज्य सरकार ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए, उससे प्रतीत होता है कि राज्य की राजस्व प्राप्ति और खर्च को लेकर लगाए गए अनुमान ज्यादा आशावादी थे। उन्होंने आश्वस्त किया कि राजस्व प्राप्ति और खर्च का अनुमान वास्तविकता से परे न हो, आयोग आंकड़ों की समीक्षा में इसका ध्यान रखेगा।

विषम भौगोलिक परिस्थितियों, आपदा समेत तमाम चुनौतियों से राज्य की प्रगति की रफ्तार बनी रहे, आयोग इन पहलुओं पर गौर करेगा। राज्य में ढांचागत विकास की जरूरत को उन्होंने रेखांकित किया। आयोग के इस नजरिये को राज्य सरकार के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। गौरतलब है कि बीते रोज सत्तापक्ष व विपक्ष समेत सभी दलों ने एकजुट होकर 14वें वित्त आयोग से राज्य को राजस्व घाटा अनुदान नहीं मिलने के तौर पर हासिल निराशा और राज्य की विषम परिस्थितियों और चुनौतियों को नजरअंदाज किए जाने का एक सुर से विरोध किया था। 

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