महापुरुष इन कटपीस…सस्ता, टिकाऊ और उपजाऊ

मुझे याद है जब मैं बचपन मे माँ के साथ कपड़े लेने के लिए बाज़ार जाता था तो माँ थान से पहले कट पीस देखा करती थी क्योंकि अक्सर ये बहुत सस्ते मिला करते थे और हमारे हालात भी ऐसे नही थे कि हम थान से कटवा कर कपड़े ले सके।
माना कि उस वक्त हमारी आर्थिक मजबूरियां हमे कटपीस लेने के लिए बाध्य करती थीं। लेकिन आजकल तो कटपीस का फैशन सा ही चल पड़ा है। खासकर महापुरुषों को कटपीस में लेने का।पूरा महापुरुष लेने की अगर आपकी इच्छा (औकात) नही है और उनकी सम्पूर्ण विचारधारा अगर आपको सूट नही करती तो आजकल आप इन्हें कटपीस में भी ले सकते हैं और उतने टुकड़े भर महापुरुष का प्रचार कर अपना मकसद साध सकते हैं।
जैसे महात्मा गांधी को ही ले। उनका चरखा हमे चाहिए लेकिन उनका ग्राम स्वराज नही चाहिए। उनकी अहिंसा की नीति के हम प्रशंसक हैं और विश्व पटल पर इसका गुणगान करते हैं लेकिन हम उनकी हत्या को जायज ठहराने वालों का समर्थन भी करते हैं और उनको गोली मारने वाले के सामने शीश भी नवाते हैं। उनके सर्वधर्म समभाव के समर्थन में हम ईश्वर अल्लाह तेरो नाम भी गाते हैं और उन पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए मुस्लिमो को दरकिनार भी करते हैं।
ये हाल केवल गाँधीजी का ही नही बल्कि ऐसे बहुत से महापुरुष हैं जो आजकल कटपीस में ही लिए जा रहे हैं।
अब भगत सिंह को ले लें। देश पर मर मिटने की उनकी छवि को, उनकी देशभक्ति को हम खूब भुनाते हैं। लेकिन संस्थागत धर्मो की उनकी आलोचना, उनकी वामपंथी सोच और मैं नास्तिक क्यों बना जैसे उनके लेखों को सीधा गोल कर जाते हैं। उनका ये रूप हमे नही भाता।
कुछ ऐसा ही हाल हमारे वल्लभ भाई पटेल यानि सरदार पटेल जी का भी है। उनके नाम पर रन फ़ॉर यूनिटी का खेल हम खेलते हैं। उनकी विशाल मूर्ति बनवा कर हम अपना मकसद साधने की कोशिश में हैं। लेकिन प्रथम गृह मंत्री के रूप में आर एस एस पर फरवरी 1948 को लगाए उनके बैन और उसके कारणों को हम गोल कर जाते हैं। उस पर हम चर्चा भी नही करते।
दलितों के हितैषी अंबेडकर जी का हाल भी कुछ ऐसा ही है। दलितों के नाम पर, उनके वोटों की खातिर हम उनके महिमा मंडन के लिए मजबूर हैं। हम इसी वजह से एससी, एसटी एक्ट में परिवर्तन भी करते हैं। लेकिन अंबेडकर जी बौद्ध धर्म अपनाने के लिए क्यों बाध्य हुए, क्यों हिन्दू धर्म से उनको विरक्ति हो गयी। दलितों के हालात आज भी ऐसे क्यों हैं कि वो घोड़ी पर ना चढ़ सके। इस पर हम कोई चिंतन नही करना चाहते।
तो मित्रों, कटपीस में कपड़े खरीदने की मेरी माता जी की आर्थिक मजबूरी तो मुझे समझ मे आती है। लेकिन कटपीस में महापुरुषों को लेने की इनकी मानसिक मजबूरी भी मुझे समझ में आती है। इन्हें महापुरुषों के विचार भी वही चाहिए जो इनकी विचारधारा को पोषित करते हों।
वर्तमान के राजनीतिक दल आर्थिक रूप से भले ही अमीर हों। अपना एक फाइव स्टार होटल जैसा मुख्यालय बनवा लें। लेकिन ये पूरी जमात मानसिक रूप से बहुत गरीब है। इनकी औकात नही है कि महापुरुषों को ये थान में ले सकें। वैसे थान में लेने पर चूंकि इनका मकसद भी हल नही होगा। इसलिए ये समझदार हमेशा कटपीस में ही महापुरुषों को लेते हैं।
और ये इतने शातिर हैं कि टुकड़ा भर महापुरुष से ही अपना मतलब साध लेते हैं।
 Tajinder Singh

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