शहरी निकाय चुनाव के लिए भाजपा ने की मजबूत किलेबंदी, मुद्दों में उलझे विपक्षी दल

पं.दीनदयाल जन्मशती समारोह कार्ययोजना के जरिये भाजपा कार्यकर्ता क्षेत्रों में सक्रिय
एक साल के लिए लगाए गए पूर्ण कालिक विस्तारकों ने कमजोर बूथों पर किया काम
निकाय चुनाव के बहाने भाजपा हाईकमान ने लोकसभा चुनाव के लिए तैयार की जमीन
लखनऊ। शहरी नगर निकाय चुनाव की सुगबुगाहट एक बार फिर तेज हो गई है। अक्टूबर में चुनाव की अधिसूचना जारी होने और नवंबर में चुनाव कराने की सरकार की योजना को देखते हुए भाजपा ने इस चुनाव के लिए व्यापक किलेबंदी कर ली है। सिंबल पर चुनाव लडऩे की घोषणा करने वाली समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जहां दूसरे मुद्दों पर उलझी हुई है वहीं भाजपा ने विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से महानगर और नगरों के बूथों पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर दिया है। भाजपा की जबरदस्त तैयारियों को देखते हुए इन दलों के सामने निकाय चुनाव में भाजपा को शिकस्त देना बड़ी चुनौती होगी।
भाजपा की चुनाव तैयारियों का सबसे बड़ा आधार पं. दीनदयाल उपाध्याय जन्मशती वर्ष समारोह है। इस साल जून से शुरू हुए इन कार्यक्रमों को 25 सितंबर तक चलाया जाना है। भाजपा इन कार्यक्रमों के सहारे बूथ स्तरीय कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर चुकी है। यूं तो पार्टी के कार्यक्रम सभी बूथों पर सामान्य रूप से चल रहे हैं किंतु भाजपा इन 18 हजार बूथों को फोकस कर रही है जहां विधान सभा चुनाव के दौरान अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। बूथों को मजबूत करने में दीनदयाल विस्तारक योजना के तहत भेजे गए पूर्ण कालिक कार्यकर्ता महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह विस्तारक एक साल तक अपने कार्यभार वाले जिले में सक्रिय भूमिका निभाएंगे।
प्रदेश में 16 नगर निगम, 198 नगर पालिका परिषद व 439 नगर पंचायतें हैं, जहां सरकार चुनाव कराएगी। वर्ष 2012 में भाजपा ने 12 नगर निगमों के चुनाव में नौ पर जीत हासिल की थी। वहीं कांग्रेस कहीं भी खाता नहीं खोल सकी थी। समाजवादी पार्टी समर्थित दो और बहुजन समाज पार्टी समर्थित एक उम्मीदवार को ही जीत मिली थी। बीजेपी ने कानपुर, मुरादाबाद, गोरखपुर, वाराणसी, झांसी, आगरा, मेरठ, लखनऊ और अलीगढ़ में जीत हासिल की थी। पार्टी फिर से यही परिणाम दोहराना चाहती है। हालांकि पिछले पांच महीने में कुछेक मंत्रियों ने सरकार की फजीहत कराने में भी कसर नहीं छोड़ी है। मंत्रियों के कारनामों से जनता के बीच खराब संदेश गया है। पार्टी इसके लिए डैमेज कंट्रोल में भी जुटी है। निकाय चुनाव से पहले ही सरकार में कुछ ऐसे मंत्री भी शामिल किए जा सकते हैं जो पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और संघ पृष्ठभूमि से आते हैं। इन लोगों को शामिल कराकर पार्टी यह संदेश भी देना चाहेगी कि दूसर दलों से आने नेताओं की तुलना में कार्यकर्ता उनके लिए महत्वपूर्ण हैं। उधर, दूसरे दलों की बात करें तो समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव व अखिलेश यादव के आंतरिक कलह से जूझ रही है। मायावती आगे का कोई रास्ता तय नहीं कर पा रही हैं। कांग्रेस की हालत पिछले निकाय चुनाव में भी पतली थी। इस बार भी उससे किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं है।
निकाय चुनाव से पहले संगठन में फेरबदल करेगी सपा
यूपी में मुख्य विपक्षी दल सपा प्रदेश में शहरी स्थानीय निकाय चुनाव से ठीक पहले अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की तैयारी में है। पार्टी सूत्रों ने बताया कि कई जिलों के अध्यक्षों को बदलने की संभावना है। पार्टी में संगठनात्मक चुनाव अगले महीने होने हैं। सपा संगठन चुनाव के जरिए स्थानीय निकाय चुनाव से ठीक पहले फेरबदल करने जा रही है। पार्टी के सभी जिला अध्यक्षों का चुनाव आगामी 5 सितंबर को उनके क्षेत्र में होगा। पार्टी निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए प्रत्येक जिले में पर्यपेक्षक नियुक्तकरेगी। गत मार्च में हुए राज्य विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त से सबक लेते हुए पार्टी संगठनात्मक चुनाव में महत्वपूर्ण पदों पर निष्ठावान कार्यकर्ताओं को बैठाना चाहती है। साथ ही यह आशंका भी जताई जा रही है कि संगठन के कील कांटे दुरुस्त करने की यह प्रक्रिया कहीं पार्टी की आंतरिक गुटबाजी तक सीमित होकर न रह जाए।





