सुप्रीम कोर्ट ने खाजिर की सरकारी की याचिका, फिर होगी…

नई दिल्ली– जबलपुर। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश शासन को जोर का झटका देते हुए उसकी अपील खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के बाद मध्यप्रदेश के मूल निवासी छात्र-छात्राओं को मेडिकल-डेंटल कॉलेजों में प्रवेश लेने का रास्ता साफ हो गया। काउंसिलिंग के जरिए पूर्व में भरी जा चुकी 90 फीसदी सीटों को निरस्त कर दिया गया है।

Supreme court's petition for the government of Khajir, will be ...

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इसी के साथ अब नए सिरे से समूची काउंसिलिंग प्रक्रिया महज 10 दिन के भीतर पूरी करनी होगी। मध्यप्रदेश सरकार हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ मप्र शासन की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस शरद अरविन्द बोबड़े और जस्टिस नागेश्वर राव की युगलपीठ में सुनी गई।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अपने पूर्व फैसले में मूलनिवासियों को ही दाखिला दिए जाने का सख्त निर्देश दिया था। इसी के साथ 30 सितम्बर तक पूरी पारदर्शिता से काउंसिलिंग प्रक्रिया पूर्ण करने कहा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 30 सितम्बर तक इंतजार न करने का रुख अपनाते हुए केवल 10 दिन में सभी चरणों की काउंसिलिंग पूरी पारदर्शिता से सम्पन्न् किए जाने की व्यवस्था दे दी।

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से महाधिवक्ता पुरुषेन्द्र कौरव खड़े हुए। जबकि मध्यप्रदेश के मूलनिवासी छात्र-छात्राओं और जनहित याचिकाकर्ता विनायक परिहार की ओर से अधिवक्ता आदित्य संघी ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि न केवल सरकारी मेडिकल-डेंटल कॉलेजों ही नहीं प्राईवेट मेडिकल-डेंटल कॉलेजों में भी काउंसिलिंग के जरिए एमबीबीएस और बीडीएस सीटों पर हुए दाखिलों में धांधली हुई है।

सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 200 और प्राईवेट मेडिकल कॉलेजों में अब तक भरी जा चुकी 350 सीटें कठघरे में आ गई हैं। यूपी, राजस्थान और छग के छात्रों के जरिए सीटें ब्लॉक करके अंतिम समय में करोड़ों में बेचने का रास्ता अपनाया गया है। इसकी पोल खुलने पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया, जिसमें बची हुई काउंसिलिंग में मूलनिवासी आवेदकों को ही दाखिला देने कह दिया गया था।

ये था हाईकोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश में साफ कर दिया था कि मध्यप्रदेश के मूलनिवासी छात्र-छात्राओं को ही एमबीबीएस व बीडीएस कोर्स में दाखिले दिए जाएं। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने आदेश में साफ कर दिया कि 26 अगस्त से शुरू हो रही तीसरे चरण की काउंसिलिंग 11 जुलाई 2017 को राजपत्र में प्रकाशित रूल्स के शत-प्रतिशत अनुरूप आयोजित की जाए। इसमें नीट परीक्षा उत्तीर्ण आवेदकों को शामिल करके योग्यता के हिसाब से एमबीबीएस-बीडीएस सीटें आवंटित की जाएं।

व्यापमं घोटाले का दूसरा रूप

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि मध्यप्रदेश के मूलनिवासी छात्र-छात्राओं को एमबीबीएस व बीडीएस की सीटों से वंचित करने का अनुचित रवैया व्यापमं घोटाले के ही दूसरे रूप की तरह लिया जाना चाहिए। कायदे से शासकीय मेडिकल-डेंटल कॉलेजों में दाखिले की प्रक्रिया के अंतर्गत मध्यप्रदेश के मूलनिवासी छात्र-छात्राओं को उनकी मैरिट के हिसाब से लाभ मिलना चाहिए। लेकिन इस बार सुनिश्चित नियम के बावजूद बड़ी चालाकी से प्रदेश के बाहर के छात्र-छात्राओं के जरिए सीट ब्लॉक करने का खेल खेला गया है।

यह तरीका डेडलाइन के साथ ब्लॉक की गई सीटें मोटी रकम लेकर रसूखदारों के बच्चों को बेचे जाने की मंशा से अपनाया गया है। आपत्ति का एक अन्य बिन्दु यह भी है कि काउंसिलिंग की अंतिम सीमा 30 सितम्बर है, इसके बावजूद पहले दो चरण की काउंसिलिंग बिजली सी गति से आयोजित कर ली गई। इससे साफ है कि नीट परीक्षा जैसी बेहतर व्यवस्था के बावजूद मध्यप्रदेश में मेडिकल दाखिले घोटाले की बलि चढ़ाने का खेल रुका नहीं है।

पिछले सेशन में भी हुआ था आदेश

26 सितम्बर 2016 को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आरएस झा व जस्टिस सीवी सिरपुरकर की युगलपीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया था। जिसके जरिए यह साफ कर दिया गया था कि भविष्य में केवल मध्यप्रदेश के मूलनिवासी छात्र-छात्राओं को ही एमबीबीएस-बीडीएस सीटों पर दाखिला दिया जाए।

नीट के बावजूद मप्र में घोटाले की नई तरकीब निकाली

इसके बाद नीट-2017 का आयोजन किया गया। जिससे पूर्व मध्यप्रदेश शासन ने 5 जुलाई 2017 को मध्यप्रदेश शासकीय चिकित्सा एवं दंतचिकित्सा (एमबीबीएस/बीडीएस) पाठ्यक्रम में प्रवेश के नियम बनाए। ये नियम नीट की मूलभावना के पालन में बनाए गए। इस नियम के उपनियम-6 में पात्रता को परिभाषित किया गया। जिसमें स्पष्ट लिखा गया है कि केवल मध्यप्रदेश के मूलनिवासी को ही एमबीबीएस-बीडीएस कोर्स में प्रवेश दिया जाएगा। इसके बावजूद इस प्रावधान का खुला उल्लंघन चिंताजनक है। जनहित याचिकाकर्ता द्वारा अवगत कराया गया कि छत्तीसगढ़ के 17, उत्तरप्रदेश के 10 और राजस्थान के 2 मूलनिवासियों के बारे में पक्की जानकारी हासिल की गई है, जिन्होंने फर्जी तरीके से मध्यप्रदेश के मूलनिवासी प्रमाणपत्र हासिल कर मेडिकल-डेंटल सीटें ब्लॉक करने का खेल खेला। इस वजह से मप्र की प्रतिभाओं का शासकीय मेडिकल कॉलेज में दाखिले का हक मारा गया।

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