नामचीन अस्पताल, शव और संवेदनहीनता

सवाल यह है कि फ्रीजर में रखा शव आखिर बाहर कैसे आ गया? वे कौन लोग हैं, जिन्होंने शव को बाहर निकाला? पोस्टमार्टम हाउस में तैनात सुरक्षा गार्ड क्या कर रहा था ? कुत्ते आखिर शव तक कैसे पहुंच गए? क्या इस घटना के लिए अस्पताल प्रशासन की लापरवाही जिम्मेदार नहीं है? क्या कर्मचारियों की संवेदना मर चुकी है? क्या शव की सुरक्षा का दायित्व अस्पताल प्रशासन का नहीं है?
लोहिया अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस में एक महिला के शव को कुत्तों ने अपना निवाला बना लिया। क्षत-विक्षत शव को देखकर जब परिजनों ने हंगामा मचाया तो अस्पताल कर्मियों की लापरवाही उजागर हुई। मृतका के पति का आरोप है कि कर्मचारियों ने शव को फ्रीजर से निकालकर मंगलसूत्र, पायल, अंगूठी आदि चुरा ली और शव को खुला छोडक़र भाग गए। लिहाजा कुत्तों ने शव को नोच खाया। अस्पताल प्रशासन ने इस मामले में सुपरवाइजर, सुरक्षा गार्ड और वार्ड ब्वाय को हटाने के आदेश जारी किए हैं। सवाल यह है कि फ्रीजर में रखा शव आखिर बाहर कैसे आ गया? वे कौन लोग हैं, जिन्होंने शव को बाहर निकाला? पोस्टमार्टम हाउस में तैनात सुरक्षा गार्ड क्या कर रहा था ? कुत्ते आखिर शव तक कैसे पहुंच गए? क्या इस घटना के लिए अस्पताल प्रशासन की लापरवाही जिम्मेदार नहीं है? क्या कर्मचारियों की संवेदना मर चुकी है? क्या शव की सुरक्षा का दायित्व अस्पताल प्रशासन का नहीं है? हकीकत यह है कि प्रदेश की संपूर्ण सरकारी चिकित्सा व्यवस्था चरमरा चुकी है। यहां भ्रष्टïाचार और अव्यवस्था का घुन लग चुका है। यही वजह है कि इन अस्पतालों में मरीजों और उनके तीमादारों को हर कदम पर अव्यवस्थाओं और संवेदनहीनता का रोज सामना करना पड़ता है। यहां एक सामान्य रोगी का इलाज कराना नाको चने चबाने की तरह है। पर्चा काउंटर से कर्मचारी नदारद रहते हैं तो चिकित्सकों को लेटलतीफी की आदत पड़ चुकी है। कई बार चिकित्सक न केवल तीमारदारों बल्कि मरीजों तक से दुव्र्यवहार करते नजर आते हैं। जांच के लिए मरीजों को घंटों लाइन में लगना पड़ता है। इमरजेंसी सेवाओं का हाल और भी खराब है। ट्रामा सेंटर मरीजों और तीमारदारों के लिए किसी यातनाघर से कम नहीं होते। दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को घंटों बाद इलाज मिल पाता है। सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था के बावजूद अस्पताल परिसर में आवार कुत्ते और अन्य जानवर घूमते रहते हैं। ये कुत्ते वार्डों के भीतर भी घुस जाते हैं। कई बार प्रसूति विभाग से ये आवारा कुत्ते नवजात बच्चों तक पर हमला कर उन्हें जख्मी कर देते हैं। प्रदेश के कई जिला अस्पतालों में ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं। बावजूद इसके अस्पताल प्रशासन और इसके कर्मचारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हाल की घटना ने पूरे प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था की पोल खोल दी है। ऐसी संवेदनहीनता चिकित्सा सेवा, अस्पताल प्रशासन और सरकार सभी पर सवालिया निशान लगाती है। इसे जल्द से जल्द दुरुस्त करने की जरूरत है अन्यथा सरकारी अस्पतालों की बची-खुची साख भी खत्म हो जाएगी। साथ ही पोस्टमार्टम हाउस की सुरक्षा व्यवस्था को भी चाक चौबंद करना होगा।





