वेंटिलेटर पर स्वास्थ्य सेवाएं, गरीबों के इलाज से इंकार कर रहे अस्पताल

भुगतान नहीं होने के कारण कंपनियों ने बंद की दवा आपूर्ति, मरीज हो रहे हलकान
करोड़ों की लागत से बने कैंसर संस्थान की भी हालत खराब, नहीं संचालित हो रही ओपीडी
राजधानी के कई अस्पतालों में भी चिकित्सा सुविधाओं का अभाव

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। गोरखपुर में बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में कई दर्जन बच्चों की मौतें स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की एक बानगी भर है। पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं वेंटिलेटर पर हैं। पूर्वांचल से लेकर बुंदेलखंड तक और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर राजधानी लखनऊ तक, आम लोगों और गरीबों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं का हाल खराब है। कहीं अस्पताल में बेड नहीं है तो कहीं करोड़ों की लागत से बनाए गए अस्पतालों में मरीजों के लिए चिकित्सा सुविधाएं नहीं हैं। कहीं दवा का पैसा बाकी है तो कही ऑक्सीजन के नाम पर खेल चल रहा है। वहीं स्वास्थ्य विभाग इन सबसे बेखबर है।
प्रदेश के कई सरकारी मेडिकल कालेजों और अस्पतालों में ऑक्सीजन की सप्लाई करने वाली कंपनियों ने भुगतान न मिलने पर सप्लाई रोक देने की चेतावनी दे रखी है। ऐसा ही कुछ एसजीपीजीआई और केजीएमयू में भी है। एसजीपीजीआई में लगभग 30 लाख तो केजीएमयू में 50 लाख रुपए का बकाया है। दूसरी ओर बुंदेलखंड के गरीब लोगों के लिए इलाज के सबसे बड़े केंद्र के रूप में संचालित झांसी के महारानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कॉलेज पर ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का 35 लाख रुपए का बकाया है। जुलाई माह में ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी ने पत्र लिखकर भुगतान जल्द करने और भुगतान न होने पर सप्लाई बाधित करने की चेतावनी दी है। बावजूद इसके कम्पनी को मेडिकल कॉलेज ने बकाये का भुगतान अभी नहीं किया है। राजधानी लखनऊ के चक गंजरिया में 938 करोड़ रुपए की लागत से बन रहे कैंसर इंस्टीट्यूट में औपचारिक रूप से नौ महीने पूर्व ओपीडी सेवाओं की शुरुआत कर दी गई थी, लेकिन अभी भी यह इंस्टीट्यूट कैंसर रोगियों के लिए किसी तरह से मददगार साबित नहीं हो पा रहा है। मरीजों की जांच के लिए मूलभूत सुविधाएं और उपकरण तक यहां उपलब्ध नहीं हैं। ओपीडी सेवाओं की शुरुआत हुए भले ही नौ महीने हो गये हों लेकिन यहां अभी भी प्रतिदिन औसतन छह या सात मरीज ही आते हैं। मरीजों के लिए इस अस्पताल में अभी तक 20 डॉक्टरों की तैनाती हो चुकी है। इंस्टीट्यूट के सीएमएस डॉ. देशपाल कहते हैं कि अभी ओपीडी सेवा पूरी तरह से शुरू नहीं हो सकी है क्योंकि इनडोर की सुविधा नहीं है।
यहां आने वाले मरीजों को परीक्षण के बाद किसी अन्य सेंटर के लिए रेफर कर दिया जाता है। ऐसा कुछ हाल लोहिया संस्थान के महिला अस्पताल का भी है। राजधानी से गुजर रहे शहीद पथ के बगल में भव्य इमारत बनवा दी गई है, लेकिन सुविधा के नाम पर यहां कुछ भी नहीं है। प्रोफेसरों की तैनाती की जा चुकी है, लेकिन यहां पर अभी तक ओपीडी सही से संचालित नहीं हो पा रही है।

बैठकें कर स्वास्थ्य मंत्री दे रहे हिदायत
प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने सीएमओ के साथ वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए राजधानी में बैठकें कर रहे हैं, अधिकारियों को व्यवस्था सुधारने की हिदायत भी दे रहे हैं, लेकिन जो वह चाहते हैं वह हो नहीं पा रहा है, क्योंकि कर्मचारी और अधिकारी उसे करना नहीं चाह रहे हैं। जो मामला मीडिया के सुर्खियां बन जाती है उसे तो दूर किया जा रहा है, लेकिन स्थितियां सुधरने का नाम नहीं ले रही हैं।

इन अस्पतालों पर है करोड़ों की देनदारी
राजधानी के सिविल, बलरामपुर, लोहिया, रानी लक्ष्मी बाई, डॉक्टर राम मनोहर लोहिया अस्पताल समेत अन्य अस्पतालों पर दवा कंपनियों का करोड़ों रुपए बकाया है, लेकिन कंपनियों का बकाया चुकता करने के बारे में कोई भी नहीं सोच रहा है। जिससे कंपनियां दवाओं की आपूर्ति तक बंद किए हुए हैं। इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है।

स्वाइन फ्लू और दिमागी बुखार से मौतों का सिलसिला जारी

दिमागी बुखार के पूर्वांचल में कहर का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इस साल अब तक पूरे उत्तर प्रदेश में हुई कुल 200 से अधिक मौतों में मरने वाले 160 से अधिक लोग पूर्वांचल और आसपास के क्षेत्रों के हैं। इस वर्ष पूरे प्रदेश में दिमागी बुखार के 1700 मामले सामने आ चुके हैं जिनमें से 170 की मौत हो चुकी हंै। उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में जहां दिमागी बुखार कहर बरपा रहा है तो दूसरी ओर राजधानी लखनऊ और गाजियाबाद जैसे शहरों में स्वाइन फ्लू पैर पसार रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अकेले राजधानी लखनऊ में इस वर्ष अब तक स्वाइन फ्लू के दो हजार से अधिक मरीजों को अपनी गिरफ्त में ले चुका है जिनमें से राजधानी में ही केवल दस लोगों की मौत हो चुकी है।

लोहिया व केजीएमयू ने मुफ्त कैंसर का इलाज देने से किया मना

डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान व केजीएमयू ने कैंसर की बीमारी से पीडि़त गरीब मरीजों का इलाज करने से इंकार कर दिया है। लोहिया संस्थान ने इसके पीछे बजट की कमी को कारण बताया है। जो मरीज भर्ती हैं और जिनका मुफ्त में इलाज चल रहा था, उनसे अब अपने खर्च पर इलाज कराने को कहा जा रहा है। संस्थान का कहना है कि सरकार से उन्हें बजट आवंटित नहीं किया गया है इसलिए वे गरीब मरीजों का इलाज नहीं कर पा रहे हैं। संस्थान की ओर से बताया गया कि शासन गरीब कैंसर मरीजों के लिए जो फंड देता है, वह खत्म हो चुका है। हॉस्पिटल फंड से अभी तक मरीजों का इलाज किया जा रहा था लेकिन अब वह संभव नहीं है। जब शासन फंड रिलीज करेगा तब मरीजों के मुफ्त इलाज की व्यवस्था शुरू हो सकेगी। केजीएमयू पर 20 करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया है, जिसे चुका पाने में केजीएमयू प्रशासन नाकाम हो रहा है। जिससे उसे मरीजों पर नहीं बल्कि कर्जे पर ध्यान देना पड़ रहा है।

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