ग्वालियर.खगोलीय घटनाक्रम के चलते 12 अगस्त की रात में आकाश में उल्कापिंडों का आतिशी नजारा दिखेगा। यह नजारा उत्तर दिशा में देखने को मिलेगा। दरअसल, हर साल 10 से 14 अगस्त तक पृथ्वी, स्विफ्ट टटल नामक धूमकेतु के सबसे सघन मार्ग से गुजरती है। इस दौरान पृथ्वी पर उल्कापात की घटनाएं प्रति घंटा 80 उल्कापात की तुलना में दो से तीन गुना ज्यादा बढ़ जाती हैं। इसके चलते आकाश में आतिशी नजारा देखने को मिलता है।

12 अगस्त को होता है सबसे सघन मार्ग
पृथ्वी हर साल 12 जुलाई से 24 अगस्त के दौरान स्विफ्ट टटल नामक धूमकेतु के पूर्व में छोड़े गए अवशेषों के मार्ग से होकर गुजरती है। इस मार्ग में धूल, पत्थर आैर हिमकण की लाखों किलोमीटर लंबी पट्टी होती है। पृथ्वी के गुजरने से वायुमंडल में इस पट्टी के साथ घर्षण होता है, जिसके कारण ये कण जल उठते हैं। इनमें से कुछ तो जलकर नष्ट हो जाते हैं, जबकि कुछ कण एक लकीर सी बनाकर सुंदर दृश्य उपस्थित करते हैं। 12 अगस्त को पृथ्वी इस धूमकेतु के सबसे सघन मार्ग से गुजरते हुए रोमांचक नजारा दिखाती है। उल्कापिंडों की बौछार जिस तारामंडल के निकट होती है, उसी के नाम से उस माह की उल्का बौछार का नाम रखा जाता है। अगस्त की बौछार परसीडस तारामंडल के निकट होती है। इसलिए इसे परसीडस बौछार भी कहते हैं।
क्या है उल्कापिंड व धूमकेतु
आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का (meteor) और साधारण बोलचाल में ‘टूटते हुए तारे’ अथवा ‘लूका’ कहते हैं। उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुंचता है उसे उल्कापिंड कहते हैं। प्रायः प्रत्येक रात्रि को उल्काएं अनगिनत संख्या में देखी जा सकती हैं, किंतु इनमें से पृथ्वी पर गिरनेवाले पिंडों की संख्या काफी कम होती है। धूमकेतु सौर मंडलीय निकाय है जो पत्थर, धूल, बर्फ और गैस के बने हुए छोटे-छोटे खण्ड होते हैं। यह ग्रहों के समान सूर्य की परिक्रमा करते हैं। छोटे पथ वाले धूमकेतु यह परिक्रमा एक अण्डाकार पथ पर करीब ६ से २०० वर्ष में पूरी करते है। लम्बे पथ वाले धूमकेतु एक परिक्रमा करने में हजारों वर्ष लगाते हैं।
घटना से डरें नहीं, आनंद लें
जिस तरह हम सूर्योदय और चंद्रोदय का आनंद लेते हैं, वैसे ही इस घटना का भी आनंद लें। इससे डरें नहीं। यह एक खगोलीय घटना है जो हर वर्ष होती है। भारतीय खगोलशास्त्र में वराहमिहिर के काल अर्थात छठवीं शताब्दी तक उल्का की संरचना और पतन के कारण अज्ञात थे, लेकिन वैज्ञानिक शोधों से अब यह घटना सामान्य हो गई है।
बृजेंद्रशरण श्रीवास्तव, खगोलविद्