40 हजार परिवार, 3600 करोड़ खर्च करने के बावजूद मुश्किल में सरकार

बड़वानी/ इंदौर.मानसून आधा बीत चुका है मगर निमाड़ के इस इलाके में भारी उमस है। बादल रुककर कहीं-कहीं बारिश का अहसास करा रहे हैं। नर्मदा नदी पर गुजरात में 138 मीटर की ऊंचाई तक बनकर तैयार सरदार सरोवर बांध के बैकवॉटर पर सबकी निगाहें हैं। गांवों में विस्थापन की दहशत है। पुनर्वास के तय स्थानों पर सरकारी हलचल है। चिखल्दा गांव में मेधा पाटकर की मौजूदगी ने माहौल गरमाया हुआ है।

आठ अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का इंतजार है। मुआवजे और पुनर्वास पर 3600 करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद सरकार की मुश्किलें कायम हैं। सरदार सरोवर की 30 साल की कहानी के एक सिरे पर सरकार है, दूसरे पर असली प्रभावित परिवार, जिनके आंकड़ों का जटिल जाल है। सरकार के अनुसार डूब में पहले 38 हजार परिवार थे, अब 23 हजार हैं। नर्मदा बचाओ अांदोलन (एनबीए) की नजर में 40 हजार हैं।
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15 हजार परिवार कहां गए? दरअसल 1992 के सर्वे के मुताबिक 38 हजार परिवार डूब में माने गए थे। तब बांध नहीं थे। जब इंदिरा सागर और सरदार सरोवर बनकर तैयार हुए तो 2008 में सेंट्रल वॉटर कमीशन ने बैक वॉटर का नए सिरे से सर्वे कराया। इसमें 23 हजार परिवार ही डूब में पाए गए।
इस तरह पुराने सर्वे से 24 गांव और 15 हजार परिवार बाहर हो गए। इनमें सबसे बड़ी बस्ती धरमपुरी भी शामिल है। एनबीए का आरोप है कि जिम्मेदारी से बचने के लिए फेर में आंकड़े कम किए गए। निसरपुर का उदाहरण-यहां पहले 2800 परिवार डूब में थे। फिर 365 बाहर हो गए। मुआवजा सबको मिला। अब इनकी दलील है कि हम पानी से घिरकर रहेंगे कैसे? हमें पुनर्वास चाहिए। दस साल पहले पुनर्वास स्थल पर प्लाट मिले, लेकिन बमुश्किल दस फीसदी लोगों ने ही घर बनाए। हिसाब चुकता होने के बावजूद ज्यादातर पुरानी बस्ती में ही डटे रहे। मुआवजे की रकम यहां-वहां खर्च हो गई। अब मेधा पाटकर की अगुवाई में आंदोलन का शोर है।
कब-क्या हुआ
1992 : सर्वे में 192 गांव अौर 38 हजार परिवार डूब में माने गए।
2004: इंदिरा सागर बांध बना। इसका पानी सरदार सरोवर भरेगा।
2008: सेंट्रल वॉटर कमीशन डूब क्षेत्र का नया सर्वे किया।
15 हजार परिवार डूब से बाहर।
15 हजार परिवार डूब से बाहर।
2017: एनवीडीए का दावा 178 में से 107 गांव खाली हो चुके है।





