19 साल बीत गए न सड़क बन पाई न स्कूल, कारगिल शहीद का कुछ ऐसे हो रहा ‘सम्मान’

अतुल अवस्थी
बहराइच। कारगिल विजय दिवस पर हम शहीदों को नमन कर रहे हैं। उनके सपनों का भारत बनाने का संकल्प ले रहे हैं। लेकिन सीने पर गोलियां खाकर कारगिल की चोटी पर तिरंगा फहराने वाले बहराइच के शहीद मेजर बलिकरन का परिवार उपेक्षा का शिकार है। कारगिल विजय को 19 वर्ष बीत गए। मेजर के शहीद होने पर सरकार ने तमाम वायदे किए। लेकिन अब तक एक भी सरकारी वायदा पूरा नहीं हो सका। शहीद मेजर के घर तक जाने वाली सड़क पर दबंग काबिज हैं। शहीद के नाम पर स्कूल भी नहीं बन सका। सरकारी वायदो को पूरा कराने के लिए शहीद मेजर की पत्नी अधिकारियों की चौखट पर भटक रही है।
सैनिक सदैव ही रणभूमि में अपने पराक्रम व शौर्य का प्रदर्शन करते रहे हैं। हजारों सैनिकों ने रणभूमि में अपना बलिदान देकर सीमाओं की रक्षा की व दुश्मन को मार भगाया। कारगिल में ऐसी ही संघर्ष गाथा के गवाह बने थे सूबेदार बलिकरन सिंह। उन्होंने दुश्मनों का मुकाबला करते हुए 28 मई 1999 को कारगिल में शहादत पाई, लेकिन इस शहीद की शहादत का मूल्य सरकार ने चंद सिक्कों में तौल दिया।
हुजूरपुर क्षेत्र के त्रिकोलिया गांव में वर्ष 1971 में जन्मे बलिकरन सिंह 1951 में 23 राजपूत रेजीमेंट में भर्ती हुए। सेना में नौकरी के दौरान देश के अनेक प्रांतों में उनकी तैनाती हुई, जहां उन्होंने सदैव देश विरोधी तत्वों का मुंहतोड़ जवाब दिया। वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान बलिकरन सिंह की तैनाती कश्मीर प्रांत के बटालिक क्षेत्र में थी। मोर्चे पर डटे बहादुर बलिकरन ने अकेले ही कई शत्रुओं को ढेर कर दिया। कारगिल की चोटी पर दुश्मनों से लड़ते हुए भारत माता का लाडला 28 मई 1999 को शहीद हो गया। जांबाज बलिकरन सिंह की शहादत पर सरकार ने उनके घर तक पक्की सड़क व उनके नाम पर अस्पताल व स्कूल खुलवाने का वादा किया था। लेकिन अभी भी घर जाने के लिए लोगों को पगडंडी का सहारा लेना पड़ता है। अस्पताल तो दूर स्कूल भी सरकार ने खुलवाना मुनासिब नहीं समझा है।
बहराइच के तत्कालीन जिलाधिकारी इंद्रजीत वर्मा ने शहादत के बाद परिवारीजनों को तीन एकड़ जमीन उपलब्ध कराई थी। इसके अलावा शहीद बलिकरन सिंह के बड़े बेटे सुनील को रेलवे में नौकरी दी गई। तत्कालीन डीएम ने परिवार को एक पेट्रोल पंप या गैस एजेंसी देने का वायदा किया था, लेकिन न तो शहीद के परिवार को पेट्रोल पंप मिल सका न ही शहीद के नाम पर गांव की सड़क बन सकी। गांव जाने वाले रास्ते पर दबंगों का कब्जा है । 19 साल में 4 बार सड़क की पैमाइश हो चुकी है बरसात में कीचड़ और जलभराव के बीच निकलना दूभर होता है। शहीद की पत्नी फूलमती कई बार जिलाधिकारी से भी मिल चुकी है लेकिन सिर्फ आश्वासन ही मिला है।
प्रशासन ने गाँव का नामकरण भी नहीं स्वीकारा
ग्रामीणों ने शहीद बलिकरन सिंह के सम्मान में गांव का नाम बलिकरनसिंह पुरवा रखा है। लेकिन आज भी यह गांव राजस्व अभिलेखों में त्रिकोलिया के नाम से दर्ज है। प्रशासन ने भी गांव को बलिकरन सिंह पुरवा के नाम से स्वीकार नहीं किया है। बनाया गया स्मारक भी बदहाल है।
शहीद मेजर बलि करन का जीवन परिचय
जन्म- वर्ष 1951
मृत्यु- 28 मई, 1999
पिता- दानबहादुर सिंह
माता- कंवरिपती
पत्नी- फूलमती
पुत्र- एक बेटा व चार बेटियां।
शिक्षा- बसंतपुर प्राथमिक पाठशाला व जूनियर हाईस्कूल हुजूरपुर।
19 साल से लगा रहे हैं चक्कर
शहीद मेजर बलिकरान की पत्नी फूलमती का कहना है कि पति के शहीद होने के बाद सरकार द्वारा किए गए वायदों का चौथाई भी पूरा नहीं हुआ। 19 साल से अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
बनेगी सड़क सँवरेगा गाँव
कारगिल शहीद मेजर बलिकरन सिंह बहराइच का सम्मान है उनका सम्मान सुरक्षित रखना भी हमारी जिम्मेदारी है। कारगिल शहीद के परिवार का मान भी बरकरार रहे इसकी कवायद की जा रही है। शीघ्र ही सड़क निर्माण करवाया जाएगा। कारगिल की पत्नी के द्वारा समस्याओं का पता चला है सभी समस्याओं का निराकरण होगा।
शंभू कुमार, जिलाधिकारी बहराइच





