तो क्या हनुमानजी की पूंछ में आग लगाने की ये थी वजह

जब रावण माता सीता जी का अपहरण कर लंका ले गया, तब श्रीराम ने उन्हें काफी खोजा, लेकिन जब उन्हें पता चला तो उन्होंने हनुमानजी को दूत बनाकर लंका की राजसभा में भेजा।हनुमानजी लंका पहुंचे। रावण ने उनके साथ अनुचित व्यवहार किया। उन्हें जब बैठने के लिए सिंहासन नहीं दिया गया तो उन्होंने अपनी पूंछ को इतना बड़ा कर सर्पाकर में व्यवस्थित किया कि हनुमानजी की पूंछ का सिंहासन रावण की पूंछ के सिंहासन से काफी बड़ा हो गया।

यह देख घमंडी रावण ने अपने सैनिकों से हनुमानजी की पूंछ में आग लगाने के लिए कहा। हनुमानजी की पूंछ में आग लगा दी गई। तब हनुमानजी ने सारी लंका को जला दिया।
और वह प्रभु राम की शरण में पहुंचे और उन्हें सीता जी द्वारा दी गई अंगूठी और लंका दहन का पूरा विस्तार से वर्णन किया।
जब श्रीराम को बनाया अहिरावण ने बंदी
आनंद रामायण में वर्णित है कि, मैरावण जिसे महिरावण जब श्रीराम और लक्ष्मण को बंदी बनाकर अपनी राजधानी महाकावती ले जाता है।
वह दोनों राजकुमारों की बलि निकुम्भिला देवी के मंदिर में देने ही वाला होता है, तब हनुमानजी वहां पहुंचते हैं और राम-लक्ष्मण को बचाते हैं। इसके बाद वह अपने पुत्र को मकरध्वज को पाताल लंका का राजा बना देते हैं।
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भावार्थ रामायण में उल्लेखित है कि, लंका के एक उपनगर में रावण की बहन और घर्घरासुर की विधवा पत्नी 1800 सौ दासियों के साथ निवास करती थी। यहां हनुमानजी ने क्रौच का वध कर दिया। यही पौराणिक कथा श्रीराम विज(मराठी) में भी दोहराई गई है।





