सच्ची कहानी: इस बुज़ुर्ग ने अपने बेटे को दिलाया था यह बंग्ला, लेकिन अब इसमें घुसने की इजाज़त नहीं है क्योंकि…

इस उम्मीद के साथ कि उनका बेटा बुजुर्ग होने पर उन्हें अपने साथ रखेगा.पूरी पूंजी लगा दी कि उन्हें खुद भी तो बेटे-बहू के साथ इस घर में ज़िंदगी के आखिरी पल तक रहना है, बहू को लाड़ प्यार दिया था

इस लालच के साथ कि घर में यही तो बुजुर्ग होने पर मेरी देखभाल करेगी.लेकिन आज जब सबकुछ अपने बेटे और बहू को दे दिया है तो बुजुर्ग बाप, बेचारा बाप आज जिस हालत में है वह तस्वीरों में आप देख रहे हैं ,मखमली गद्दों पर से रहे कलयुगी बेटे नें पिता को सोने से लिये चादर तक नहीं दिया, क्या नहीं किया इन्होंने बेटे के लिए बेटे की वाइफ के लिए? सब कुछ तो इन पर न्योछावर कर दिया, पूरी जिंदगी भर की कमाई इनके नाम कर दी .बच्चे पाले ,आशियाना बनाया, बच्चे को सेट किया और अब जब बेटे और बहू से यह सिला मिला है.

उसके बावजूद परिवार को संभालने की जीवटता और मोह तो देखिए आज भी सुबह शाम दुत्कार खाने (सही भाषा में गाली खाने) के बाद भी प्यार से बच्चों के बच्चे पाल रहे हैं , उनका ध्यान रख रहे हैं ,बदले में मिलती है तो सिर्फ नौकरों की तरह सुबह और शाम की रोटी और रात में पूरे दिन की मेहनत के इनाम के तौर पर घर की चौखट के बाहर रोड पर थोड़ी सी जगह सोने को मिल जाती है, यह जिंदगी तो नौकरों की तरह भी नहीं नौकरों से भी बदतर है खानाबदोश से भी बदतर है,

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यह सिलसिला पिछले लंबे समय से यूं ही चल रहा है, लेकिन आज जब मैंने पहली बार देखा तो सिहर उठा, सोचने पर मजबूर हो गया ,यह कैसे लोग हैं ? किस मिट्टी के बने हैं ? उनकी भावनाएं कहां है ? उनका दिल और दिमाग इतना निष्ठुर होने की इजाजत कैसे दे देता है ? क्या बुजुर्ग होने का ये मतलब नहीं समझते? क्या इन्हें समाज का कोई डर नहीं? जो पूरे दिन इनके बच्चे खिलाता है उसे यह बाहर सुलाते हैं, क्या अपने बच्चों को यही परवरिश दे रहे हैं ये पति पत्नी? ये हम किस तरफ जा रहे हैं जहां बेटे को बाप की ही फिक्र नहीं है?

क्या पत्नी सगे बाप से बड़ी हो गई? बस बुझे मन से इतना ही कहूंगा कि धिक्कार है ऐसे लोगों पर,ऐसी सोच और मानसिकता पर. भगवान करे इन पति पत्नी के बच्चे बड़े होकर इनके साथ भी यही करें. क्योंकि आज भले ही वो बहुत छोटे हैं लेकिन सीखेंगे तो बच्चे अपने घर से ही और मां बाप से ही.

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