शोध में हुआ ये बड़ा खुलासा चींटियां भी पड़ती है बीमार, लेती है लीव नहीं करती यह काम

चींटियां भी लेती हैं बीमारी के समय काम से छुट्टी ले लेती है। इन दिनों चींटियों को शोध में खास तवज्जो दी जा रही है, क्योंकि ये माना जाता है कि उनमें सुपरह्यूमन पावर होती है। इसी शोध से इस बात का पता चला है। इस मौसम में सर्दी-बुखार होना आम है। इसकी वजह से दफ्तरों में बड़ी संख्या में कर्मचारी छुट्टी पर जाते हैं, जिसे प्रोडक्टिविटी लॉस के तौर पर भी जाना जाता है। सर्दी-जुकाम में इंसानों का काम से छुट्टी लेना तो आप जाते हैं लेकिन चींटियों के बारो में इस प्रकार की जानकारी वाकई में चौकाने वाली है। 
दरअसल, उनके काम से छुट्टी लेने की वजह भी मानव जाति से मिलती-जुलती है। एक चींटी की बीमारी दूसरे को न लग जाए इसलिए चींटियां ऐसा करती है। साइंस नामक विज्ञान और चिकित्सा जर्नल में ये खोज प्रकाशित हुईं है। इसके अनुसार बीमार चींटियां अपने दूसरी चींटियों को बीमारी से बचाने के लिए अपने रूटीन और व्यवहार में कई बदलाव करती हैं, बीमारी में छुट्टी लेना इनमें से एक है।
चींटियों का समुदाय एकजुटता और संगठन का अनोखा उदाहरण है। दुनियाभर में चींटियों की करीब 14 हज़ार प्रजातियां हैं। हर चींटी को अपनी उम्र और योग्यता के अनुसार अलग-अलग काम दिया जाता है, जो उसे करना ही होता है, जैसे नई-नई मां बनी चींटियां शिशु चींटी की देखभाल तो अधिक उम्र की चींटियां अपने अनुभवों से खाना एकत्र करती हैं। बिना भाषा के भी ये आपस में संवाद करती हैं, जिसे विज्ञान की भाषा में एंटरनेट नाम दिया गया है। एक खास हॉर्मोन के जरिए ये कनेक्शन बनता है और आपसी तालमेल का काम करता है।
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चींटियां अपने वजन से लगभग 50 गुना ज्यादा वजन उठा सकती हैं। वहीं एशियन वेबर चींटी अपने वजन से सौ गुना ज्यादा वजन उठा लेती है। कान न होने के बाद भी ये नन्हा सा जीव वाइब्रेशन के जरिए साथी चींटियों का सिग्नल सुनता है। सबसे दिलचस्प तथ्य ये है कि चींटियों के दो पेट होते हैं। एक पेट में इक_ा खाना वे खुद खाती हैं, तो दूसरे पेट का खाना वे साथियों के लिए ले जाती हैं। इस प्रक्रिया को
बीमारी के दौरान इनका व्यवहार समझने के लिए ऑस्ट्रिया और स्विटरजरलैंड के शोधकतार्ओं ने चींटियों के व्यवहार पर शोध किया। इसके लिए उन्होंने चींटियों की बस्ती जिसे कॉलोनी भी कहते हैं, का चुनाव किया, जहां ज्यादा संख्या में चींटियां रहती थीं। इन बस्तियों में लगभग 22सौ चींटियों की रिहाइश थी। यहां पर इंफ्रारेड कैमरा लगाया गया ताकि उनकी हरेक गतिविधि पर नजर रखी जा सके।
इसके बाद लगभग 10 प्रतिशत चींटियों को एक ऐसे फंगस के संपर्क में लाया गया जो चींटियों में बीमारी फैलाने का काम करते हैं। शोधकतार्ओं ने इस फंगस का लो-डोज़ उन्हें दिया ताकि वे मरे नहीं लेकिन उनकी काम करने की क्षमता कम हो जाए।
ऑस्ट्रिया के इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की मुख्य शोधकर्ता सिल्विया क्रेमर के अनुसार फंगस के संपर्क में आने के बाद चींटियों का व्यवहार बदल गया। बीमार चींटियां अपने साथियों से दूर रहने लगीं ताकि उनकी बीमारी दूसरों को न लग जाए। बीमार चींटियां साथ रहने लगीं और मुख्य दल से एकदम अलग-थलग हो गईं।
बीमार चींटियां खासकर शिशु और रानी चींटियों से अलग रहने लगीं ताकि उनकी जिंदगी खतरे में न आए। ऐसा करने की प्रक्रिया में मरीज चींटियां काम या तो बंद कर देती हैं या उसे न्यूनतम कर देती हैं। ऐसा इसलिए करती है कि वे दल से दूर रह सकें। ये हम लोगों की सिक-लीव से मिलती-जुलती प्रक्रिया है।
शोध में पाया गया कि अक्सर बाहर खाना एकत्र करने वाली चींटियां पैथोजन के संपर्क में आती और बीमार होती हैं। ऐसे में वे बाकी समूह से खुद को अलग-थलग कर लेती हैं. ये एक तरह से वैक्सिनेशन की तरह काम करता है। दोबारा उसी पैथोजन के संपर्क में आने पर चींटियों में प्रतिरक्षा तंत्र तेजी से काम करता है और पैथोजन उन पर बेअसर रहता है।





