अब शुरू होगा US-भारत के बीच दुश्मनी का दौर, जानें कौन किस पर ज्यादा पड़ेगा भारी

यूएस की ईरान से तेल आयात को दी गई छूट 2 मई को खत्म हो रही है. ईरान के साथ भारत की ऊर्जा और व्यापारिक साझेदारी को देखते हुए यूएस-भारत की दोस्ती में दरार पैदा हो सकती है.
भारत अपनी तेल जरूरतों का 80 फीसदी हिस्सा आयात से पूरा करता है. यूएस के ईरान न्यूक्लियर डील से बाहर हटने से पहले ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश था. इससे पहले यूएस ने भारत को सीमित समय के लिए ईरान से तेल आयात करने की छूट दी थी जिसके बाद भारत ने ईरान से 1.25 लाख टन तेल की खरीदारी की थी. यह आंकड़ा वॉशिंगटन के ईरान से न्यूक्लियर डील तोड़ने से पहले किए जा रहे आयात का केवल 70 फीसदी ही था.
ईरान से तेल आयात करने की वजह से भारत को कई तरह के फायदे होते हैं. कीमतों और इंश्योरेंस जैसे समेत कई मामलों में ईरान भारत को सुविधाजनक शर्तों पर तेल उपलब्ध कराता है जिससे कुल लागत में करीब एक-चौथाई पैसे की बचत होती है. ईरान के साथ तेल आयात में भारत को यूएस डॉलर में भुगतान नहीं करना पड़ता है.
भारत ईरान को रुपए में भुगतान करता है और यह पैसा भारत में एक खास अकाउंट में जमा होता है. ईरान इस पैसे का इस्तेमाल भारत से चावल और दवाइयों जैसी चीजों को मंगाने में खर्च कर लेता है. ये पूरी व्यवस्था भारत के हक में जाती है.
यूएस में वर्तमान राजनीतिक स्थिति को देखते हुए यह असंभव ही लग रहा है कि वह भारत को आर्थिक तौर पर कोई छूट देगा. यूएस तेल निर्यातक इस मौके को भारत को तेल आपूर्ति करने के तौर पर देख रहे हैं. हालांकि, अमेरिकी कंपनियों की शर्तें लुभावनी नहीं हैं और व्यापार का वॉल्यूम भी सीमित है. इसके अलावा, भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए यूएस पर पूरी तरह से आश्रित नहीं होना चाहता है.
ईरान से तेल आयात पर छूट के खत्म होने के बाद भारत की तेल आयात की लागत में बढ़ोतरी हो जाएगी और यूएस डॉलर में भुगतान बढ़ने से भारत का निर्यात राजस्व भी घट जाएगा. नतीजतन, भारत की आर्थिक वृद्धि और विनिमय दर की स्थिरता भी भारी दबाव में आ सकती है.
ईरान से तेल के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध से तेल की अंतरराष्ट्रीय तेल कीमते भी बढ़ जाएंगी जिससे भारत का कुल आयात बिल भी बढ़ जाएगा. भारत के आर्थिक हितों के प्रभावित होने पर यूएस के साथ रिश्तों में तल्खी आना तय है.
अफगानिस्तान पर भी यूएस और भारत की साझेदारी भी प्रभावित हो सकती है. भारत-ईरान के रिश्ते की सबसे मजबूत नींव तेल व्यापार ही है. दोनों देश अफगानिस्तान और पाकिस्तान पर लंबे समय से एकसमान रणनीतिक राय भी रखते रहे हैं. ईरान अफगानिस्तान के साथ अपने रिश्ते मजबूत करना चाहता है. दूसरी तरफ, भारत भी ईरान से होते हुए अफगानिस्तान में अपनी पहुंच बनाने की तैयारी कर रहा है. भारत ने अफगानिस्तान की मदद के लिए 2001 के बाद से करीब 3 अरब डॉलर की आर्थिक मदद की है ताकि अफगानिस्तान के लोगों में भारत के लिए सकारात्मक नजरिया बना रहे.
इसके अलावा, भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह में भी निवेश कर रहा है ताकि भारत-अफगानिस्तान के बीच एक मजबूत लिंक बन सके.
यूएस अफगानिस्तान से अपनी सेनाओं की वापसी की घोषणा कर चुका है जिससे अफगानिस्तान की स्थिरता और भारत के इस देश में किए गए निवेश को खतरा पैदा हो सकता है. साथ ही, यूएस के थोपे गए प्रतिबंध की वजह से ईरान-भारत के बीच चाबहार बंदरगाह पर सहयोग में गतिरोध पैदा हो सकता है.
इन सारी वजहों से भारत और ईरान के बीच दूरियां आने के साथ-साथ यूएस-भारत की अफगानिस्तान पर रक्षा साझेदारी भी प्रभावित हो सकती है.
ईरान को लेकर यूएस और भारत के रुख में गंभीर मतभेद दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. भारत यूएस का करीबी सैन्य सहयोगी है और वॉशिंगटन की भारतीय-प्रशांत रणनीति का अहम हिस्सा भी है.





