यूपी पुलिस का क्रूर चेहरा

मुखिया जी
19 मार्च, 2०17 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते वक्त योगी आदित्यनाथ से सुरक्षा, सम्मान, विकास की जो उम्मीद प्रदेश के लोगों ने की थी, वह 18 माह बाद ही दम तोड़ गई है। सुरक्षा का जिम्मा पुलिस पर है, लेकिन आज की डेट में ओहदे वाले शख्स से लेकर अदने व्यक्ति तक से पूछिए, तो वे इसका जवाब देने में तौबा कर लेते हैं। उनमें खाकी वर्दी का खौफ इतना समा गया है कि पुलिस नाम की परछाई से भी वे बचना बेहतर समझते हैं।
प्रदेश के लोगों में यह भय यूं ही नहीं समा गया, बल्कि तिल-तिल कर समाया है। सरकार के सत्तासीन होने के साथ एंटी रोमियो स्क्वायड में लगे सिपाहियों की कतिपय युवा-युवतियों के साथ ज्यादतियों से इसकी शुरुआत हुई, जो आये दिन एनकाउंटर की लगती झड़ी पर उठते सवाल, गौ रक्षा के नाम पर हुए तांडव से गुजरते हुए 29 सितम्बर, 2०18 को करीब 1:3० बजे रात मुख्यमंत्री आवास से कुछ किलोमीटर दूर पाश इलाके गोमतीनगर में पुलिस की गोली से एपल के सेल्स मैनेजर विवेक तिवारी की हत्या तक पहुंचते-पहुंचते पुलिस का चेहरा पूरी तरह क्रूरता में तब्दील हो गया। पुलिस की सर्विस रिवाल्वर से मारे गये विवेक तिवारी अपनी कार से अपनी सहकर्मी सना खान को उसके घर छोड़ने जा रहे थे, क्योंकि उस रात उनकी कंपनी का एक कार्यक्रम देर रात तक चला था। दो पुलिस वालों प्रशांत चौधरी और संदीप कुमार ने उन्हें कार रोकने के लिए कहा था और उन्होंने कार रोकी नहीं थी। उनकी कार रुकी, तो प्रशांत द्वारा उनकी गोली मारकर हत्या किये जाने के बाद।
विवेक तिवारी की आंखों देखी हत्या पर से जब घटना के वक्त साथ रही उनकी सहकर्मी सना खान ने पर्दा उठाया कि प्रशांत चौधरी और संदीप कुमार ने किस तरह उन्हें मारा, तो पूरा प्रदेश ही सन्न रह गया। हर कोई दहल गया। सोचने पर मजबूर हो गया कि जब पुलिस वाले ही कातिल हो जाएंगे, तो उनकी सुरक्षा कैसे होगी। बहरहाल, चारों तरफ से लोगों और राजनीतिक दलों की तरफ से विरोध की आवाज जब उठनी शुरू हुई, तो सदन हो या सदन के बाहर एनकाउंटर पर पुलिस वालों की पीठ थपथपाने वाले मुख्यमंत्री को यह कहने के लिए बाध्य होना पड़ा कि यह एनकाउंटर नहीं, मर्डर है। जरूरत पड़ी, तो वह इसकी जांच सीबीआई को भी सौंप देंगे। इसी के साथ सत्ता पक्ष ने पीड़ित परिवार तक पहुंच बनाने की कोशिश शुरू की, ताकि विरोधी पार्टियां इस मामले को उठाकर भाजपा सरकार को जनता की नजरों में न गिराने पायें। मुख्यमंत्री खुद विवेक की विधवा कल्पना तिवारी से अपने आवास पर मुलाकात करते हैं और उन्हें 4० लाख रुपये और नौकरी की मदद के जरिए मनाते हैं कि वह अब और आवाज न उठायें। उन्हें उनकी सरकार पूरी तरह न्याय दिलाएगी।
बहरहाल उत्तर प्रदेश पुलिस को जनप्रिय-पुलिस बनाने की बजाय क्रूर-पुलिस बनाने का इल्जाम विपक्षी दल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर एनकाउंटर-दौर शुरू होने के वक्त से ही लगाते आ रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बेशक कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए पुलिस के हाथ खोले, लेकिन 18 माह में 5 दर्जन से ज्यादा तथाकथित अपराधियों की मुठभेड़ों में हुईं मौतों में सभी सही हैं या नहीं, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कुछ पर अपनी अंगुली उठाकर योगी आदित्यनाथ की सरकार पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। इसी परिप्रेक्ष्य में देश की सर्वोच्च अदालत तक ने राज्य सरकार से जवाब तलब कर लिया था। बहरहाल, विवेक तिवारी मामले में सना खान चश्मदीद है, लेकिन इस वारदात के साथ लोगों के जेहन, खासकर उन परिजनों में अपनों की सूरत घूम गयी जिनके अपने नहीं रहे। ये नाम हैं गुरमीत, नौशाद, सरवर, इकराम, नदीम, शमशाद, जान मोहम्मद, फुरकान, मंसूर, वसीम, विकास, सुमित, नूर मोहम्मद, शमीम, शब्बीर, बग्गा सिंह, मुकेश राजभर, अकबर, रेहान, विकास। ये सभी बीते डेढ़ बरस के योगी सरकार के दौर में एनकाउंटर में मारे गये। 12 मामले अदालत की चौखट पर हैं पर गवाह गायब हैं। चश्मदीद नदारद हैं। ऐसे में कौन सामने आये और कौन कहे कि उन लोगों ने इनकी मौत देखी है।
कहने में गुरेज नहीं कि जब किसी व्यक्ति या फिर कानून के रखवालों को यह लगने लगे कि उसके ऊपर मुख्यमंत्री का हाथ है, तो भला वह अपनी मनमानी क्यों नहीं करेगा। ऐसा ही कुछ उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ भी होता दिखता है। पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति के मसले को ही ले लें। ओम प्रकाश को डीजीपी देखने के लिए मुख्यमंत्री ने केन्द्ग सरकार को कैसे राजी किया। जब तक ओपी नहीं आ गये, मुख्यमंत्री उनकी राह तकते रहे, भले ही डीजीपी का पद कुछ वक्त के लिए खाली रहा। ओपी के आने के बाद एनकाउंटर पर, जो विराम कुछ वक्त के लिए लग गया था, फिर से शुरू हुआ। पुलिस का मनोबल बढ़ता गया। पुलिस की निरंकुशता की पराकाष्ठा, तो विवेक तिवारी हत्याकांड से पूरी तरह सामने आ ही चुकी है, इस कांड के पहले अलीगढ़ में लाइव एनकाउंटर के लिए मीडिया को मौके पर बुलाना भी दर्शाता है कि पुलिस जो चाहेगी, वही करेगी। कहा जाता है कि इससे पहले कभी भी लाइव एनकाउंटर की मीडिया कवरेज नहीं हुई थी। विवेक तिवारी कांड में ही देख लीजिए कि पुलिस ने किस तरह पहले मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की थी। एक ही मामले की दो-दो बार एफआईआर यूं ही नहीं दर्ज हुई।
अपराधियों में पुलिस का भय, जो होना बहुत जरूरी है, भी सामने आता रहा है, जब कुछ ने खुद थाने में जाकर आत्मसमर्पण कर दिया था। एक अपराधी ने, तो गत्ते पर यह लिखकर गले में लटकाकर एक थाने में पहुंच गया था कि मुझे मुठभेड़ में न मारा जाए, मैं आत्मसमर्पण कर रहा हूं, अब अपराध नहीं करूंगा। यह खबर पब्लिक को भी बहुत अच्छी लगी थी, लेकिन जब उसके सामने ये बातें आने लगीं कि पुलिस ने मुठभेड़ों में अपनी कामयाबी का मजमून एफआईआर में तकरीबन एक जैसा बनाया है, तो लोगों का पुलिस पर से विश्वास उठने लगा। इसी क्रम में गौर करें कि बेशक बजरंगी सिंह दुर्दांत था, लेकिन जेल में उसका मार गिराया जाना भी प्रदेश में कानून व्यवस्था के सुदृढ़ हो जाने के दावे की धज्जियां उड़ा दी थीं। रोज-रोज कहीं न कहीं होने वाली आपराधिक वारदातों हत्या, बलात्कार आदि को भी गिन लिया जाए, तो कानून व्यवस्था कहीं दिखती ही नहीं।
प्रदेश के लोगों ने, जो उम्मीद खासकर संत मुख्यमंत्री से लगाई थी, उसे तार-तार होते देख अब गूगल पर मुख्यमंत्री से लेकर उनके मंत्रियों की कुंडली खंगालनी शुरू कर दी है। इलेक्शन वाच की एक रिपोर्ट के मुताबिक योगी के मंत्रिमंडल में 45 फीसदी मंत्री दागदार हैं, जिन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें शामिल हैं उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, कुल केस-11, आईपीसी की गंभीर 15 धारायें। कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी, कुल केस-7, आईपीसी की 1० गंभीर धारायें। कैबिनेट मंत्री सत्यपाल सिंह बघेल, कुल केस-7, आईपीसी की 1० गंभीर धाराएं। कैबिनेट मंत्री दारा सिंह चौहान, कुल केस -2, आईपीसी की 7 गंभीर धारायें। कैबिनेट मंत्री सूर्यप्रताप शाही, कुल केस-3, आईपीसी की 5 गंभीर धाराएं। कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर, कुल केस 1, आईपीसी की गंभीर 2 धाराएं। कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, कुल केस-1, आईपीसी की गंभीर 2 धारायें। कैबिनेट मंत्री रीता जोशी, कुल केस 2, आईपीसी की गंभाीर एक धारा। कैबिनेट मंत्री आशुतोष टंडन, कुल केस-1, आईपीसी की एक गंभीर धारा। कैबिनेट मंत्री ब्रजेश पाठक, कुल केस 1, आईपीसी की 3 गंभीर धारायें। राज्य मंत्री उपेन्द्र तिवारी, कुल केस-6, आईपीसी की गंभीर 6 धारायें। राज्य मंत्री सुरेश कुमार राणा, कुल केस-4, आईपीसी की गंभीर 6 धारायें। राज्य मंत्री भूपेन्द्र चौधरी, कुल केस-2, आईपीसी की गंभीर 2 धारायें। राज्यमंत्री गिरीश चन्द्र यादव, कुल केस-1, आईपीसी की 4 गंभीर धारायें। राज्यमंत्री मनोहर लाल, कुल केस-1, आईपीसी की 3 गंभीर धारायें। राज्यमंत्री अनिल राजभर, कुल केस-2, आईपीसी की एक गंभीर धारा। वैसे सीएम बनने से पहले तक सांसद योगी आदित्यनाथ पर भी तीन मुकदमे थे। उन पर भी आईपीसी ती 7 धारायें थीं। हालांकि सीएम बनने के बाद कैबिनेट निर्णय से उनके सारे मामले खत्म हो गये।
ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वाकई यूपी में कानून-व्यवस्था सुधारने के नाम पर फर्जी एनकाउंटर हो रहे हैं? फिलहाल असलियत क्या है, पर फर्जी एनकाउंटर के मामले में पिछले साल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें कहा गया था कि फर्जी एनकाउंटर की शिकायतों के मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस देश में सबसे आगे है। आयोग ने पिछले 12 साल का आंकड़ा जारी किया था, जिसमें देशभर में फर्जी एनकाउंटर की कुल 1241 शिकायतें आयोग के पास पहुंची थीं। इसमें अकेले 455 मामले यूपी पुलिस के खिलाफ थे। हालांकि सरकार के आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं। इसी साल फरवरी में एक आधिकारिक आंकड़ा जारी किया गया था, जिसमें बताया गया था कि योगी सरकार के सत्ता में आने के 1० महीने के अंदर पूरे राज्य में करीब 11०० पुलिस एनकाउंटर हुए। इनमें 34 अपराधी मारे गए, 265 घायल हुए और करीब 2,7०० हिस्ट्री-शीटरों को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा पुलिस द्बारा किए गए कई एनकाउंटर ऐसे भी थे, जिन्हें फर्जी करार दिया गया। मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले एक संगठन सिटीजंस अगेंस्ट हेट ने हाल ही में एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें दावा किया गया था कि यूपी पुलिस द्बारा किए गए करीब 16 एनकाउंटरों में गड़बड़ियां हैं।
कहानी बहुत लम्बी हो सकती है, लेकिन एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या योगी सरकार में मौत की सौदेबाजी चल रही है? न जाने कितने परेशान, भुखमरी के शिकार, बेरोजगार और किसान आये दिन मौत को गले लगा रहे हैं, लेकिन उनके परिजनों को कोई मुआवजा नहीं मिलता। ऐसे में विवेक तिवारी की मौत पर मुआवजा किसी सौदेबाजी से कम नहीं लगता। सच तो यही है कि विवेक के परिजनों को तत्काल मुआवजा से थोड़ी राहत जरूर मिल जाएगी, लेकिन विवेक की बेवा और बेटियों को यह टीस सदैव रहेगी कि योगी राज में उनके निर्दोष पति और पापा पुलिस की गोली से मारे गये थे।

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