यूपी- मायावती का इस्तीफा: सिमट रहे वोट बैंक बचाने की बेचैनी

बहुजन समाज यानी दलित, पिछड़ों, वंचितों व शोसितों की राजनीति करने वाली मायावती का राज्यसभा से इस्तीफा देने का फैसला जल्दबाजी या अचानक नहीं है। वह बिना सोचे-सम कभी कोई काम नहीं करती..। उनके हर फैसले के पीछे लंबी सोच और रणनीति होती है। राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना भी एक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

जानकार कहते हैं कि मायावती के इस्तीफे के पीछे हाथ से रेत की तरह फिसल रहे अपने वोट बैंक को सहजने की बेचैनी दिख रही है। मायावती यूपी की सत्ता में दलित और पिछड़े वोट बैंक के सहारे राज करती रही हैं। वह अपनी सभाओं में इन्हीं दलितों, पिछड़ों, वंचितों और शोसितों को हक दिलाने की वकालत भी करती रही हैं। वर्ष 2007 में 206 सीटों पर जीत दर्ज कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा वर्ष 2012 के चुनाव में 80 सीटों पर पहुंच गई।
सके बाद से बसपा का जनाधार धीरे-धीरे खिसकने लगा। वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा की ऐसी लहर चली कि बसपा का खाता तक नहीं खुल सका।मायावती ने लोकसभा के ठीक तीन साल बाद 2017 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में दलित, पिछड़े के साथ अल्पसंख्यकों का दांव खेला, पर 19 विधायक ही जिता पाने में सफलता मिल पाई। छह सालों में बसपा का ग्राफ लगातार गिर रहा है।
एक-एक कर उनके अपने साथ छोड़ने लगे या बाहर किए गए। बाबू सिंह कुशवाहा, स्वामी प्रसाद मौर्य, आरके चौधरी हो या नसीमुद्दीन सिद्दीकी.. या तो खुद चले गए या निकाल दिए गए। मायावती के इशारों पर चलने वाले इन नेताओं ने दूसरे ठौर तलाश लिए। मायावती नहीं चाहती कि उनका बेस वोट उनके खिसके..। इसीलिए वह दलित आंदोलन को धार देने में जुटी हुई हैं। दलितों पर हो रहे अत्याचार पर वह केंद्र व प्रदेश की सरकारों को घेरती रही हैं।
राज्यसभा में मंगलवार को मायावती ने सहारनपुर में दलितों पर हुए अत्याचार के मामले पर बोलना शुरू किया तो तीन मिनट बाद ही उन्हें बैठने का इशारा कर दिया गया। जानकार कहते हैं कि मायावती ऐसे ही मौके की तलाश में थी कि दलितों के हक की आवाज उठाने से उन्हें रोका जाए और वह बड़ा मुद्दा बनाएं। इस्तीफे के सहारे वह हाथ से फिसल रहे वोट बैंक को बचाना चाहती हैं।
मायावती का राजनीतिक सफर
5 जनवरी 1956 को गौतमबुद्धनगर के गांव बादलपुर में जन्म
1977 दिल्ली में शिक्षिका के रूप में करियर की शुरुआत
14 अप्रैल 1984 में बसपा की स्थापना के साथ शिक्षिका की नौकरी छोड़कर राजनीतिक सफर की शुरुआत
अप्रैल 1984 में कैराना से लड़ा पहला विधानसभा चुनाव
1989 में बसपा ने चुनाव में जीती 13 सीटें, बिजनौर से जीतकर बनीं सांसद
1995 में भाजपा के समर्थन से प्रदेश की पहली बार मुख्यमंत्री बनीं
1995 में मुख्यमंत्री बनकर प्रदेश की सबसे युवा मुख्यमंत्री और पहली दलित मुख्यमंत्री होने का बनाया रिकार्ड
1997 में भाजपा के समर्थन से दोबारा मुख्यमंत्री बनी
2001 में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित
2002 में भाजपा के समर्थन से तीसरी बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी
2007 में पूर्ण बहुमत लेकर प्रदेश की चौथी बार मुख्यमंत्री बनी
बसपा के लिए सबसे बुरे साल 2014 और 2017 गुजरे हैं। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी और 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी बसपा का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा और वह मात्र 19 सीटों पर ही सिमट कर रह गई।





