भाजपा के अतिउत्साह पर ग्रहण बनते सवाल

भाजपा 2019 को लेकर केवल इसलिए अतिउत्साहित है कि विपक्ष बिखरा हुआ है। विपक्षी नेताओं का कोई लक्ष्य ही निर्धारित नजर नही आ रहा है। इसके बावजूद अगर यह मान लिया जाए कि भाजपा को वाकओवर मिल गया है तो यह सच नही है। 2019 में जनता भाजपा नेताओं के सामने सवालों की लम्बी लिस्ट लेकर खड़ी होगी जिसका जबाब शायद ही भाजपा नेता दे पाए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अब तक के कार्यकाल में कितने करोड़ युवाओं को रोजगार दिया? गंगा मैया कितनी साफ हुई? बुलेट ट्रेन के कितने कोच तैयार हुए? मेक इन इंडिया का क्या परिणाम रहा? कितने दागी नेता जेल गए? धारा 370 पर क्या हुआ ?
कितने कश्मीरी पंडितों का घर मिला? डीजल पेट्रोल कितना सस्ता हुआ? मंहगाई कितनी कम हुई? आम जनता के लिए क्या किया? लाहौर और करांची पर कहाँ तक कब्जा किया? सेना को कितनी छूट मिली? चीन थर-थर कांपा क्या? देश ईमानदार देशों की श्रेणी में आ गया? स्टार्ट-अप इंडिया का क्या हाल है? जवानों का खाना सुधरा क्या? बिहार को 175 लाख करोड़ का पैकेज मिला? अलगाववादी नेताओं की सुविधाएं बंद की क्या?, ओवैसी और वाड्रा जेल गए क्या ?,राम मन्दिर बना क्या?, सांसद आदर्श ग्राम योजना में कितने गाँव खुशहाल हुए?,नोटबन्दी से आतंकवाद और नक्सलवाद की कमर टूट गई क्या?,देश में कितनी खुशहाली आई ?, गुलाबी क्रांति गौ हत्या रुकी क्या?, मोदी के विदेशी दौरों से क्या मिला?, 100 दिन में विदेशों से काला धन आया क्या?, मुस्लिम आबादी कितनी कम हुई?, टैक्स सुधार कितना हुआ?,संसद, विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिला? लोकपाल नियुक्त हुआ या नहीं?, कितनी नदियों को जोड़ा गया?,
तीन तलाक पर रोक लगी या नहीं?, प्रॉपर्टी के दाम कितने कम हुए?,अच्छे दिन आ गए क्या?, डॉलर का मूल्य रूपये के मुकाबले कितना कम हुआ?, कितने स्मार्ट सिटी तैयार हो गये?, महिलाओं पर अत्याचार रुक गया क्या ?, बीफ एक्सपोर्ट में भारत को एक नम्बर किसने बनाया?, कितने लोगों को 15 लाख मिले ?, देश में घूसखोरी बंद हो गई क्या?,स्वच्छता अभियान कितना सफल रहा ?,हिन्दू आबादी कितनी बढ़ी?, इंस्पेक्टर राज कितना कम हुआ?, बैंक का अरबों डकारने वाले कितने पूंजीखोर जेल गए?, पार्टी के नाम पर काली कमाई वाले कितने नेता जेल गए?, कितने स्कूल, कॉलेज, अस्पताल खुले?, हिंदी का उपयोग कितना बढ़ा?, सिंचाई की सुविधा कितनी बढ़ी?, किसानों की आत्महत्या रुक गई क्या?, कितने नए वैज्ञानिक प्रयोग हुए?, सबको आवास मिल गया?, अदालतों में कितने जज बहाल हुए?,
भारत कितने दिन में विश्वगुरू बनेगा?, कॉमन सिविल कोड लागू हो गया?, बलूचिस्तान को भारत में मिला लिया?, नेपाल से रिश्ते अच्छे हुए, कि खराब?, देश की इकॉनोमी कैशलेस हो गई?, हिन्दू तिथि से नववर्ष को सरकारी मान्यता मिल गई? कितने बंगलादेशी खदेड़े गए?, रामसेतु को ऐतिहासिक स्थल बनाया कि नहीं? यही यक्ष प्रश्न है जिनका सामना भाजपा को करना है। इसके बावजूद बीजेपी के वरिष्ठ नेता आत्मविश्वास से लबालब भरे दिखते हैं। उनके बयानों से लगता है जैसे तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी जीत पक्की है। ‘अजेय बीजेपी, अजेय भारत, अटल भारत’ का नारा जगह-जगह पोस्टरों पर दिख रहा है। अमित शाह लगातार कह रहे हैं कि ‘हमारी सरकार ने जो काम किया है उसके आधार पर ही हम चुनाव लड़ेंगे और लोग हमें फिर से निर्वाचित करेंगे।’
लेकिन अगर हम 2014 की परिस्थितियों और आज के हालात की तुलना करें तो पाएंगे कि पिछले लोकसभा चुनाव के समय का माहौल बिल्कुल अलग था। नरेंद्र मोदी लोगों की नजर में हीरो बनकर खड़े थे। जहां भी बीजेपी का जनाधार था वहां उसे ऐसी सफलता मिली, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की हो। अब केंद्र और अधिकतर राज्यों में उसकी सरकारें है तो 2014 के उनके उत्साही समर्थक सरकार के कार्यों का मूल्यांकन भी करेंगे। वे देखेंगे कि जिन अपेक्षाओं पर उन्होंने मत दिया था, उन पर केंद्र और राज्यों की सरकारें खरी उतर पाई या नहीं। अब बाॅत करे तीन प्रमुख राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में राज्य सरकारों का कार्य और स्थानीय नेतृत्व प्रमुख कारक होगा। राजस्थान में वसुंधरा राजे को लेकर असंतोष है, पार्टी के अंदर भी उनसे नेताओं और कार्यकर्ताओं का एक वर्ग नाखुश है।
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चैहान के प्रति असंतोष तो नहीं है, लेकिन उन्हें लेकर उत्साह भी नहीं है। 15 वर्षों से सरकार होने से सत्ता विरोधी रुझान भी दिख रहा है। यही बातें छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के साथ भी लागू होती हैं। 2014 में अलग-अलग लोगों और समूहों की मोदी से तरह-तरह की उम्मीदें थीं। मोदी बहुविध आकांक्षाओं के प्रतीक बन गए थे। आज लोग अपनी-अपनी आकांक्षाओं को ही ध्यान में रखकर सरकार का मूल्यांकन कर रहे हैं। किसी को रोजगार की अपेक्षा थी तो कोई कारोबार के लिए बेहतर वातावरण चाहता था। स्वरोजगार की आकांक्षा वाले युवा चाहते थे कि मोदी राज में उन्हें बैंकों से आसान कर्ज मिल जाएगा। किसानों की अलग अपेक्षाएं थीं।
शहरी मध्य वर्ग की अपनी उम्मीदें थीं। एक तबका विदेश में भारत की धाक चाहता था। लेकिन हर वर्ग को निराशा मिली। इन सबसे बढ़कर मोदी के संदर्भ में एक बड़ी चुनौती है जिस पर कम लोगों का ध्यान जा रहा है। वह है, मोदी की छवि। वह हिंदुत्व और उससे जुड़े राष्ट्रवाद का चेहरा थे। ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं थी जो उनसे हिंदुत्व के मामले में खुलकर भूमिका निभाने की उम्मीद कर रहे थे। राममंदिर निर्माण को लेकर अपने गहने और जेवर यहाॅ तक की जान निछावर करने वाला वर्ग भी निराश है। पुरानी पेंशन बंद करना, पदोन्नति में कोटा,अनुसूचित जाति-जनजाति कानून पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटना बड़ा मुद्दा बन चुका है। विपक्ष इसमें शामिल था, लेकिन वह प्रयास कर रहा है कि पूरा गुस्सा बीजेपी के विरुद्ध चला जाए। सवर्णों का बड़ा वर्ग विद्रोह की मुद्रा में है। एक बड़ा वर्ग नोटा बटन दबाने का मन बना चुका है। सचाई यह है कि बीजेपी के वोटरों के एक बड़े वर्ग में दुविधा है। अगर उसे दूर नहीं किया गया तो वह छिटक सकता है। बीजेपी नेता मानें न मानें, पार्टी का जनाधार अभी हिला हुआ है जिसे फिर से एकजुट करना एक कठिन काम है।





