बैंक और बीमा कंपनियों को हर राज्य में कराना पड़ेगा GST रजिस्ट्रेशन

  • नई दिल्ली.जीएसटी में बैंकों, एनबीएफसी और बीमा कंपनियों को हर राज्य में रजिस्ट्रेशन कराना पड़ेगा। सरकार ने उनके लिए सेंट्रलाइज्ड रजिस्ट्रेशन से इनकार कर दिया है। सरकारी बैंकों के प्रमुखों के साथ सोमवार को अरुण जेटली की मीटिंग के बाद रिवेन्यू सेक्रेटरी हसमुख अढिया ने कहा, ‘बैंकों के सामने कोई ऑप्शन नहीं है। जीएसटी कानून में यही प्रावधान है। बैंकों को इसके लिए तैयार हो जाना चाहिए।’ हालांकि बैंकों को कुछ राहत दी गई है। उन्हें राज्यों के लिए हर महीने सिर्फ एक इनवॉयस जेनरेट करना होगा। हर ट्रांजैक्शन के लिए अलग इनवॉयस जेनरेट करने की जरूरत नहीं होगी।
    बैंक और बीमा कंपनियों को हर राज्य में कराना पड़ेगा GST रजिस्ट्रेशन
    अभी बैंकों की कई सर्विसेज सेंट्रलाइज्ड…
    – दरअसल, बैंक, एनबीएफसी और बीमा कंपनियां देश भर में सेवाएं देती हैं। इसलिए ये अभी की तरह सिंगल रजिस्ट्रेशन चाहते हैं। उनका कहना है कि हर राज्य में रजिस्ट्रेशन से प्रोसेसिंग और कंप्लायंस की दिक्कतें आएंगी। अभी बैंकों की कई सर्विसेज सेंट्रलाइज्ड होती हैं। मसलन, चेक बुक इश्यू करना।
    – फाइनेंस मिनिस्टर के साथ मीटिंग में एक सेशन जीएसटी पर भी रखा गया था। अढिया ने कहा कि हमने बैंकों की कुछ परेशानियां दूर कर ली हैं। अब वो यह नहीं कह सकते कि अभी जीएसटी के लिए तैयार नहीं हैं।

    ये भी पढ़े: 50 साल से घट रही है बरसाती बादलों की मोटाई, एक दिन कम हुआ मानसून सीजन

    केंद्र ई-वे बिल टालने के पक्ष में, पर कई राज्य जुलाई से ही लागू करना चाहते हैं
     
    -मिनिस्ट्री के एक सीनियर अफसर ने बताया कि रविवार को जीएसटी काउंसिल की मीटिंग में केंद्र सरकार ने ई-वे बिल को कुछ महीने के लिए टालने का प्रपोजल रखा। हालांकि कई राज्य इसके लिए राजी नहीं थे। पश्चिम बंगाल और बिहार समेत कई राज्य इसे जीएसटी के साथ ही लागू करना चाहते हैं।
    – अब नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (एनआईसी) देखेगा कि राष्ट्रीय ई-वे बिल सिस्टम जून अंत तक तैयार किया जा सकता है या नहीं। शुरू के तीन महीने जीएसटी नेटवर्क नए टैक्स नियमों को लागू करने में लगा रहेगा। इसलिए ई-वे बिल का प्लेटफॉर्म तैयार करने में छह महीने लग सकते हैं।
    – काउंसिल ने अप्रैल में इसका ड्राफ्ट जारी किया था। इसमें 50,000 रुपए से ज्यादा के सामान की ढुलाई के लिए जीएसटीएन पर रजिस्ट्रेशन करना और ई-वे बिल जेनरेट करना जरूरी है। हालांकि इसके रूल्स अभी फाइनल नहीं हुए हैं। रूल्स बनने के बाद ही सॉफ्टवेयर तैयार होगा।
     
    गारमेंट सेक्टर को ड्यूटी ड्रॉबैक जारी रखने के लिए बदल सकते हैं नियम
    -गारमेंट एक्सपोर्टर्स के बीच कॉम्पिटीशन के लिए जीएसटी नियमों में कुछ फेरबदल हो सकते हैं। टेक्सटाइल मिनिस्ट्री के ज्वाइंट सेक्रेटरी सुब्रत गुप्ता ने बताया कि अभी एक्सपोर्टर्स को ड्यूटी ड्रॉबैक मिलता है। जीएसटी में इसे कैसे एडजस्ट किया जाए, यह देखा जा रहा है। इंडस्ट्री का भी फीडबैक लिया जा रहा है।
    – मिनिस्ट्री ने पिछले साल ‘रिबेट ऑफ स्टेट लेवीज’ नाम से खास ड्रॉबैक स्कीम का एलान किया। अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन अनिल बुचसिया ने बताया कि हम ड्रॉबैक पर ही जिंदा हैं। इस स्कीम का फायदा हमारी लागत के 4% के बराबर है।
     
    1) सप्लाई का वक्त
     
    -नई टैक्स व्यवस्था में सप्लाई के समय का काफी अहम है, क्योंकि इसी से तय होगा कि सप्लायर पर टैक्स की देनदारी कब बनती है।
    किसके लिए
    – गुड्स के लिए टाइम ऑफ सप्लाई
     
    क्या कहता है कानून
     
    – सप्लायर द्वारा जारी इनवॉयस की तारीख, नियमानुसार इनवॉयस जारी करने की आखिरी तारीख या जिस तारीख को सप्लायर को पेमेंट मिली – इनमें से जो भी पहले होगा वही तारीख मानी जाएगी।
    – बिल से ज्यादा पेमेंट किया (जैसे, फोन बिल 1,400 रु. का, दिए 1,500 रु.)। एक्स्ट्रा पेमेंट 1,000 रुपए तक है तो सप्लायर जिस तारीख को उस रकम के बदले बिल जेनरेट करेगा, उसे माना जा सकता है।
     
    खास बातें-इनवॉयस जारी करने की आखिरी तारीख
    -अगर गुड्स का मूवमेंट होता है (जैसे किसी सामान की डिलीवरी) तो विक्रेता की दुकान से सामान ले जाते वक्त इनवॉयस जारी होना चाहिए।
    – अगर गुड्स का मूवमेंट नहीं होता है (जैसे अचल संपत्ति) तो हैंडओवर की तारीख को इनवॉयस जारी होना चाहिए।
     
    2) सप्लायर को पेमेंट मिलने की तारीख
     
    – सप्लायर के अकाउंट बुक में पेमेंट की एंट्री या जिस तारीख को पैसे उसके बैंक खाते में जमा हुए, दोनों में जो तारीख पहले होगी उसे माना जाएगा।
     
    किसके लिए
     
    -रिवर्स चार्ज मेकैनिज्म में सप्लाई
     
    क्या कहता है कानून
    -जिस तारीख को सामान मिला, जिस तारीख को बैंक खाते में पैसे जमा हुए या इनवॉयस जारी करने के 30 दिन तक- इनमें से जो पहले होगा वह माना जाएगा।
     
    खास बातें
    – संभव है कि किन्हीं हालातों में ये तीनों शर्तें लागू न हों। ऐसी हालत में सामान प्राप्त करने वाले के बुक्स में एंट्री की जो तारीख होगी, उसे ही सप्लाई का समय माना जाएगा।
    – ब्याज, लेट फीस या पेनाल्टी : जिस तारीख को सप्लायर को यह रकम मिलेगी, उसे टाइम ऑफ सप्लाई माना जाएगा।
     
    # टैक्स बदला तो गुड्स या सर्विस की सप्लाई की तारीख से तय होगा रेट
    1) मान लीजिए 1 सितंबर से किसी गुड्स/सर्विस पर टैक्स रेट 18% से बढ़कर 20% हो गया। गुड्स/सर्विस की सप्लाई इससे पहले हो गई और इनवॉयस भी 1 सितंबर से पहले जेनरेट किया गया। लेकिन पैसे का भुगतान 1 सितंबर के बाद किया गया। ऐसे में कौन सा टैक्स रेट लागू होगा?
    – गुड्स/सर्विस पर 18% टैक्स लगेगा, क्योंकि सप्लाई 1 सितंबर से पहले हो चुकी थी।
     
    2) मान लीजिए 1 सितंबर से किसी गुड्स/सर्विस पर टैक्स रेट 18% से बढ़कर 20% हो गया। एडवांस पेमेंट 1 सितंबर से पहले मिल गया, लेकिन गुड्स/सर्विस की सप्लाई इस तारीख के बाद हुई और इनवॉयस भी बाद में जेनरेट हुआ। ऐसी परिस्थिति में कौन सा टैक्स रेट लागू होगा?
     
    – गुड्स/सर्विस पर 20% टैक्स लगेगा, क्योंकि सप्लाई 1 सितंबर के बाद हुई।
     
     
Back to top button