बागी सुर वाले पार्टी विधायकों के प्रति संघ और भाजपा के तेवर हुए सख्‍त…

पिछले दो साल के दौरान हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहर लाल की सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करने वाले भाजपा विधायकों पर भाजपा और राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के तेवर तल्‍ख हैं। ऐसे विधायकों के टिकट पर तलवार लटकी हुई है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल और उनकी कोर टीम के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख पदाधिकारी भी इन विधायकों को दोबारा चुनावी रण में उतारने के हक में नहीं हैैं। अब ये विधायक अपने टिकट बचाने के लिए संघ की शरण में हैं और मुख्यमंत्री मनोहरलाल के समक्ष अपनी सफाई पेश करने की कोशिश कर रहे हैैं।  

दो साल पहले सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की थी इन विधायकों ने

मुख्यमंत्री ने मंगलवार को खुद संकेत दिया कि 29 सितंबर से पहले किसी दावेदार के टिकट घोषित नहीं होंगे। ऐस में तब तक टिकट कटने, बरकरार रहने तथा सूची में दोबारा नाम जुडऩे के कयास लगते रहेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश लौटते ही संसदीय बोर्ड की बैठक में उन नामों पर मुहर लगने की औपचारिकता निभाई जाएगी, जिनके नाम हरियाणा भाजपा की चुनाव समिति पैनल बनाकर भेजेगी।

संघ और भाजपा नहीं चाहते दोबारा चुनावी रण में उतारें, सीएम कुछ नामों पर तैयार

भाजपा ने इस बार पैनल बनाने के तरीके में भी बदलाव किया है। एक सीट पर अमूमन तीन दावेदारों के नाम का पैनल बनता है,  लेकिन भाजपा हाईकमान ने प्रदेश नेतृत्व को सिंगल नाम के पैनल बनाकर भेजने को कहा है। जिन सीटों पर अधिक पेंच फंसा हुआ है, वहां दो नाम के पैनल हो सकते हैैं। तीन नाम के पैनल वाली सीट कोई-कोई ही होगी।

प्रदेश में भाजपा हाईकमान, संघ और मुख्यमंत्री की टीम ने दावेदारों को लेकर अंदरूनी सर्वे कर रखा है। प्रदेश नेतृत्व द्वारा भेजे जाने वाले पैनल के नामों का हाईकमान की सर्वे रिपोर्ट से मिलान होगा, जिसके आधार पर टिकट फाइनल किए जाएंगे। सूत्रों के अनुसार दो से तीन साल पहले तक जिन 17 विधायकों ने मुख्यमंत्री को परेशान किए रखा, उनमें एक दर्जन विधायक ऐसे हैैं, जिनके टिकट पर असमंजस बना हुआ है।

सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री ने दरियादिली दिखाते हुए बागी सुर वाले विधायकों में से कुछ को टिकट की पैरवी की है। ये विधायक वे हैैं, जिन्हें जल्द ही अपनी गलती का एहसास हो गया और अब चुनाव जीतने की स्थिति में हैैं, लेकिन उन्हें टिकट मिलेगा या नहीं, इसका फैसला अभी लंबित है।

भाजपा के कड़े रुख पर सांसदों ने अचानक बदले सुर

भाजपा पहले ही उन सांसदों को मना कर चुकी, जो अपने परिवार के सदस्यों के लिए टिकट मांग रहे हैैं। भाजपा के इस रुख के बाद सांसद धर्मवीर, केंद्रीय राज्य मंत्री रतनलाल कटारिया, सांसद रमेश कौशिक, नायब सिंह सैनी और डा. अरविंद शर्मा ने कहना शुरू कर दिया कि उन्होंने खुले तौर पर अपने परिवार के सदस्यों के लिए कभी टिकट नहीं मांगा। केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत और कृष्णपाल गुर्जर को अभी भी बेटी व बेटे के लिए टिकट की उम्मीद है, जबकि हिसार के सांसद बृजेंद्र सिंह की मां प्रेमलता को मौजूदा विधायक के नाते भाजपा फिर उचाना से चुनावी रण में उतार सकती है।

मंत्रियों के टिकट को लेकर किसी तरह का संशय नहीं

सोनीपत में महिला एवं बाल विकास मंत्री कविता जैन के स्थान पर उनके पति पूर्व मीडिया सलाहकार राजीव जैन को चुनाव रण में उतारने की रिपोर्ट आ रही है। इंद्री में राज्य मंत्री कर्ण देव कांबोज को लेकर संशय था, जिसे अब दूर कर लिया गया है। उन समेत पार्टी तमाम मंत्रियों को दोबारा टिकट देने जा रही है। भिवानी में भाजपा घनश्याम सर्राफ के साथ-साथ डा. शिव शंकर भारद्वाज के नाम पर भी विचार कर रही है। उनका नाम तोशाम में भी है। कलायत में भी पेंच है। यहां भाजपा के पैनल पर आरएसएस के डा. सुखदेव कुंडू, पूर्व सीपीएस रामपाल माजरा और धर्मपाल शर्मा टिकटार्थी हैैं।

शिरोमणि अकाली दल ने भी बढ़ाई भाजपा की मुश्किल

गुरुग्राम की सीट पर सबसे ज्यादा पेंच फंसा है। यहां किसी महिला अथवा नए वैश्य दावेदार को लाया जा सकता है। फतेहाबाद में इनेलो से भाजपा में आए बलवान सिंह दौलतपुरिया के टिकट पर संशय है। वह मंगलवार को सीएम से भी मिले थे। यहां चौ. दूड़ा राम का नाम चल रहा है। भाजपा को यदि शिरोमणि अकाली दल को दो या तीन सीटें देनी पड़ी तो पिहोवा, कालांवाली, असंध और अंबाला शहर पर विचार किया जा सकता है।

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