पत्नी की योनि पर पिछले चार सालों से जड़कर रखा था ताला, इलाज के दौरान पता चला कि उसकी योनि ताले में जकड़ी हैं तो फिर…

इंदौर के एक (भले) आदमी ने अपनी स्त्री की योनि पर पिछले चार सालों से ताला जड़कर रखा था. परेशान स्त्री जहर खाकर जान देने जा रही थी-अफरातफरी में जब उसे अस्पताल ले जाया गया तो इलाज के दौरान पता चला कि उसकी योनि ताले में जकड़ी हुई है.
अगर यह घटना घटित नहीं होती तो किसी को पता भी नहीं चलता कि इस 21वीं सदी में, अक्षरशः योनि को ताले में बंद किया जाता है. चाबी पतिदेव के जिम्मे. किसी अन्य पुरुष का लिंग उसकी योनि में प्रवेश न कर पाए, इसलिए ताले-चाबी का इंतजाम किया गया. अपनी जरूरत के मुताबिक पति ही उसकी योनि का ताला खोला करता था.
इस खबर को पढ़ने के बाद, मुझे याद आया कि यूरोप के अंधकार युग में वहां की लड़कियों की देह पर भी लोहे से निर्मित कौमार्य बंधन या ‘चेस्टिटि बेल्ट’ बांधा जाता था. दूर देशांतर जाने के पहले स्त्रियों की योनि पर भारी-भरकम ‘चेस्टिटि बेल्ट’ नाम का लौह पिंजर डालकर ही लोग बाहर जाते थे.
स्त्रियां उस लौह पिंजर को तब तक नहीं खोल पाती थीं, जब तक स्वयं स्वामी आकर उसका ताला न खोलें. यानी, योनि की अधिकारिणी स्त्रियां नहीं, उनके मालिक हैं. वे अपनी व्यक्तिगत संपदा की रक्षा चाहे जैसे करें. जो पुरुष सत्तात्मक मानसिकता उस अंधकार युग में स्त्रियों की योनि पर ताला जड़ती थी, उसी मानसिकता के चलते इंदौर वासी सज्जन ने स्त्री योनि पर ताला लगाया था.
उस युग और वर्तमान युग के बीच कई शताब्दियां गुजर चुकी हैं, लेकिन उस मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है. इस घटना को जानने के बाद लोगों ने उस आदमी को बहुत दुत्कारा, शैतान, कमीना आदि कहकर गालियां दीं. ठीक ही है कि यह घटना ताला जड़ने वाली है पर यह मानसिकता तो चारों ओर से घेरे हुए है. इसी मानसिकता वाले लोग आज का समाज चला रहे हैं. चूंकिताला दृश्यमान है, इसलिए लोगों को आपत्ति है. अदृश्य ताले के लिए किसी को कोई आपत्ति नहीं.
स्त्री सिर्फ पति की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है, वह पूरे समाज की व्यक्तिगत संपत्ति है. स्त्री विवाह के पहले किसी के साथ यौन संपर्क करेगी कि नहीं, विवाह के बाद किसके साथ किस प्रकार चलेगी-रहेगी, रात कितनी देर तक बाहर रहेगी, किसके साथ बातें करेगी, किससे नहीं मिलेगी, किसके साथ हंसेगी, घर में कौन-कौन आएंगे, कौन नहीं आएंगे, किसके साथ सोएगी और किसके साथ नहीं-यह सब उसका पति या परिवार ही नहीं, पूरा समाज बता देता है, तर्जनी उठाकर धमका देता है. नारी के चारों ओर हाथ में हथियार उठाए सैनिक तैनात रहते हैं या फिर पत्थर फेंकने के लिए, कारा यातना के लिए या फिर फाड़ खाने को तैयार रहते हैं.
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समाज की हर लड़की के यौनांग पर एक अदृश्य ताला जड़ा हुआ है. जिस मर्दवादी मानसिकता ने स्त्रियों को ‘चेस्टिटि बेल्ट’ या ताला जड़ने को बाध्य किया था, उसी मानसिकता ने आज अदृश्य ताला डालने को बाध्य किया है. ताला दिखता नहीं, लेकिन ताला है. यह अदृश्य ताला यदि समाज की किसी लड़की के यौनांग पर न हो तो खासा हंगामा खड़ा हो जाए.
उस लड़की को समाज मान्यता नहीं देता, अगर उसके यौनांग पर वह अदृश्य ताला यथास्थान न लगा हो. इस अदृश्य ताले का नाम है पितृ सत्ता तंत्र या पुरुष सत्ता तंत्र. इस पितृ सत्ता तंत्र या पुरुष सत्ता तंत्र के कठघरे में स्त्रियां कैद हैं.
पारिवारिक और सामाजिक सीखचे में स्त्रियां कैद हैं, इसलिए उनके लिए अलग से किसी लौह पिंजर या लोहे के ताले गढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती. इस पुरुष सत्ता तंत्र में पुरुष की भूमिका है-प्रभु की, कर्ता की, नियामक की और भोग करने वाले स्वामी की. स्त्रियों की भूमिका है कि वह पुरुषों की दासी है-उसकी यौन वस्तु है, पुरुष की संतान पैदा करने वाली मशीन है. यही सब उसके हिस्से हैं-कई तरह के नियम बनाकर, रंग-रोगन पोतकर.
क्या ऐसी कोई प्रजाति है जो अपनी ही प्रजाति के भिन्न यौनांग होने के कारण उसे हाशिए पर धकेल अपमानित करती है. आज भी नारी के विरुद्ध उस विषमता को दूर नहीं किया जा सका है. अभी भी स्त्रियां यौन-दासी हैं, आज भी लड़कियां यौन-लिप्सा की शिकार हैं, घरेलू हिंसा, ऑनर किलिंग, बलात्कार, सामूिहक कुकृत्य, कन्या-शिशु हत्या, कन्या-भ्रूण हत्या, तेजाब की शिकार और दहेज प्रथा की यातना झेल रही हैं. दहेज चुकाने में असमर्थ होने पर घर-घर में स्त्री-दाह, ब की हत्या-यानी स्त्री-विरोधी कोई नृशंसता समाज से दूर नहीं हुई है.
कई लोगों का कहना है कि शिक्षित होने पर नारी समस्या का निदान हो जाएगा. लेकिन देखा यह गया है कि एक शिक्षित नारी पुरुष सत्ता तंत्र की नियमावली जितनी अच्छी तरह सीख सकती है, उतनी अच्छी तरह एक अनपढ़ स्त्री नहीं.
सीखने की क्षमता शिक्षितों में अधिक होती है. शिक्षित स्त्रियों का विवाह होने पर वे मायके से उसी तरह ससुराल जाती हैं, जिस तरह एक अनपढ़ और गरीब स्त्री. शिक्षित स्त्री अपना सरनेम बिसार कर पति का सरनेम लपक लेती है. पुरुषों के लिए होता है पिता का सरनेम, मां का नहीं. इसका मतलब हुआ, स्त्री और उसकी संतान पुरुष पति के अधीन हैं.





