दो औरतें बनाम दो पत्नियां…कौन कितना सही?

आपके तर्क से आपका पक्ष सही लग सकता है और सही हो भी सकता है लेकिन वही तर्क अगर आप के विपक्ष की बातों को भी सही करता है तो क्या आप अपने तर्क को ही गलत मानने या बोलने लगते हैं ? अगर ऐसा है तो आपका पक्ष ही गलत है और आप किसी एक पक्ष की तरफ पक्षपाती हैं।
कांस्टेबल प्रशांत चौधरी की पत्नी अपने पति को बचाने के लिए दिन रात दौड़ रही हैं, अपने ही डिपार्टमेंट से लड़ रही है, अपने लिए लोगों को एकजुट कर रही हैं। पुलिसिया राजनीति, जाति सब के नाम पर सहानुभूति की उम्मीद रख रही हैं, रातो रात क्राउड फंडिंग के जरिए उनके अकॉउंट में कुछ सौ रुपयो को कई लाख रुपयों में बदल रही हैं।

इतना सब कुछ हो रहा है, इतना सब कुछ वो कर रही हैं जबकि प्रथम दृष्टया कांस्टेबल प्रशांत चौधरी ही दोषी लग रहे हैं तो क्या उनकी पत्नी कुछ भी ना करें ? हाथ पर हाथ रखे बैठी रहे या प्रशांत को खुद से दोषी मान उससे संबंध खत्म कर ले ? वो अपने परिवार, अपने पति को बचाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है ना….तो क्या गलत है ?…मेरी नजर में तो…नही…गलत तो बिल्कुल भी नहीं।
अब बात करते हैं विवेक तिवारी की पत्नी कल्पना तिवारी की…वह अपने पति की मौत के बाद अगर सरकार से मुआवजा मांग रही है, उसकी जान की कीमत तय कर रही है ( जबकि ये लाइन कहना ही गलत है) तो गलत क्या है ?…पति कैसा था ?..किसके साथ था ?…किन हालत में था ?… यह अलग बहस का मुद्दा है…लेकिन था तो उस औरत का पति ही ना।
उसके जाने के बाद इस औरत को अपने भविष्य को लेके हर निर्णय लेने का पूरा हक है और अगर आप इसमें पति की लाश बेचने जैसा कुछ देखते हैं तो गलत आप हैं वह नहीं। क्योंकि बरखुरदार आपकी सहानुभूति या घटिया आरोपो से न तो उस औरत का पेट भर सकता है और न ही उसके दो बच्चो का भविष्य सुरक्षित हो सकता है।
और अब बात करते है इन दो औरतों के बीच मे आयी एक अनवांछित औरत का…सना का…जिससे किसी की भी सहानुभूति नही होगी…न विवेक तिवारी के परिवार की और न ही प्रशांत चौधरी के परिवार की। इतना ही नही इस घटनाओं में उसकी स्थिति इतनी जटिल है कि वो दो धर्मो के तराजुओं में भी तौली जाएगी…एक चश्मदीद के नाते वो हर रोज कोर्ट कचहरी के धक्के खाएगी, कोई मनचला तेज़ाब भी लेके पड़ सकता है उसके पीछे…और इन सब से जरूरी सवाल ये है कि…इस अनवांछित औरत का भविष्य अब क्या है…? क्योंकि अभी तक तो सभी अपने भविष्य को लेके लड़ रहे है लेकिन सना के भविष्य के लिए लड़ाई तो दूर की बात है, उसका तो पूरा वर्तमान ही खतरे में पड़ गया है।
राहुल इलाहाबादी की कलम से

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