देश के 5 प्राचीन मंदिर, जो विज्ञान के लिए आज भी हैं पहेली

भारत को अगर मंदिरों का देश कहा जाए, तो कुछ गलत नहीं होगा। हमारे देश में हर गली-नुक्कड़ पर मंदिर मिल जाएंगे, लेकिन कुछ मंदिर ऐसे हैं जो सिर्फ पूजा-पाठ की जगह नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा अजूबा हैं।
सोचिए, सैकड़ों-हजारों साल पहले जब न कोई कंप्यूटर था, न बड़ी-बड़ी मशीनें और न ही कोई आधुनिक तकनीक, तब हमारे पूर्वजों ने ऐसे मंदिर बना दिए जिन्हें देखकर आज के इंजीनियर भी हैरान रह जाते हैं। आइए जानते हैं भारत के ऐसे ही 5 प्राचीन मंदिरों के बारे में, जिनका विज्ञान आज भी दुनिया को हैरत में डाल देता है।
कैलाश मंदिर, महाराष्ट्र
दुनिया भर में जितनी भी इमारतें या मंदिर बनते हैं, वो हमेशा नीचे से ऊपर की तरफ बनते हैं। यानी पहले नीव, फिर दीवारें, फिर छत, लेकिन महाराष्ट्र के एलोरा में मौजूद कैलाश मंदिर दुनिया की इकलौती ऐसी इमारत है जिसे ऊपर से नीचे की तरफ तराशा गया है।
इसे ईंट-पत्थर जोड़कर नहीं, बल्कि एक ही पूरे पहाड़ को ऊपर से नीचे की तरफ छैनी और हथौड़े से काटकर बनाया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसे बनाने में करीब 4 लाख टन पत्थर काटकर बाहर निकाला गया होगा। बिना किसी आधुनिक मशीन के इतना सटीक डिजाइन कैसे बनाया गया, यह आज के बड़े-बड़े इंजीनियरों के लिए भी एक अनसुलझी पहेली है।
बृहदेश्वर मंदिर, तमिलनाडु
1000 साल से भी ज्यादा पुराने इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे बनाने में किसी भी तरह के सीमेंट, प्लास्टर या मिट्टी का इस्तेमाल नहीं हुआ है। इसके पत्थरों को पजल की तरह एक-दूसरे में फंसाकर खड़ा किया गया है। और यह इतना मजबूत है कि पिछले हजार सालों में कई बड़े भूकंप आने के बाद भी इसका बाल तक बांका नहीं हुआ।
इस मंदिर के शिखर पर एक बहुत बड़ा पत्थर रखा है, जिसे ‘कुंभम’ कहते हैं। इस अकेले पत्थर का वजन करीब 80 टन है। सोचने वाली बात यह है कि उस जमाने में बिना किसी क्रेन के 80 टन का पत्थर इतनी ऊंचाई पर कैसे पहुंचाया गया होगा?
लेपाक्षी मंदिर, आंध्र प्रदेश
इस मंदिर में कुल 70 खंभे हैं, जिनमें से एक खंभा जमीन से थोड़ा ऊपर उठा हुआ है और हवा में झूलता रहता है। लोग इस खंभे के नीचे से कपड़ा निकालकर देखते हैं कि क्या वाकई यह हवा में है। इसे ‘हैंगिंग पिलर’ कहा जाता है।
इसका सारा वजन छत पर टिका है। यह कैसे संभव है कि इतने भारी खंभे ने छत को नहीं गिराया और बिना जमीन के सहारे लटका हुआ है, यह कोई नहीं जानता।
कोणार्क सूर्य मंदिर, ओडिशा
कोणार्क का सूर्य मंदिर सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि एक विशालकाय रथ के आकार में बना हुआ है, जिसे 7 घोड़े खींच रहे हैं। इस रथ में 24 बड़े पहिए लगे हैं और ये पहिए सिर्फ सजावट के लिए नहीं हैं।
ये पहिए असल में एक ‘सनडायल’ का काम करते हैं। इन पहियों पर पड़ने वाली सूरज की परछाई को देखकर आज भी आप समय का बिल्कुल सटीक अंदाजा लगा सकते हैं। यहां तक कि मिनट भी सही-सही गिने जा सकते हैं। इसके अलावा, कहा जाता है कि प्राचीन काल में इस मंदिर की चोटी पर एक विशाल चुंबक लगा था, जिसकी वजह से मंदिर के अंदर मौजूद भगवान की मूर्ति हवा में तैरती रहती थी।
विट्ठल मंदिर, कर्नाटक
पत्थरों से अगर आप पत्थर टकराएंगे, तो सिर्फ खट-खट की आवाज आएगी। लेकिन कर्नाटक के हम्पी में मौजूद विट्ठल मंदिर एक म्यूजिकल अजूबा है। इस मंदिर के अंदर 56 खास खंभे हैं। जब आप इन खंभों को अपने हाथों से धीरे से थपथपाते हैं, तो इनमें से संगीत के सातों सुरों की आवाज निकलती है। इन्हें ‘म्यूजिकल पिलर्स’ कहा जाता है।
अंग्रेजों ने इस रहस्य को जानने के लिए दो खंभों को कटवाकर देखा था कि कहीं इनके अंदर कोई पाइप या तार तो नहीं है, लेकिन अंदर सिर्फ ठोस पत्थर ही निकला। पत्थर से संगीत कैसे पैदा होता है, इसका जवाब आज का विज्ञान भी नहीं दे पाया है।





