जोखिम में महिलाओं की जान, हाई रिस्क पे्रगनेंसी को पहचानने में नाकाम हो रहा स्वास्थ्य विभाग

प्रदेश में एक लाख से अधिक महिलाएं हैं पीडि़त नवजातों की सेहत पर भी पड़ रहा असर

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। प्रदेश में गर्भवती महिलाओं की जान जोखिम में है। हाई रिस्क प्रेगनेंसी से पीडि़त महिलाओं की तादाद एक साल में 27 हजार से बढक़र एक लाख हो गयी है। हाई रिस्क प्रेगनेंसी वाली महिलाओं के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च करती है, बावजूद उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। यही नहीं स्वास्थ्य विभाग ऐसी गर्भवती महिलाओं को चिंहित करने में नाकाम साबित हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों की हालत और भी खराब है। हाई रिस्क प्रेगनेंसी के कारण नवजात बच्चों की सेहत पर भी असर पड़ रहा है।
हाईरिस्क प्रेगनेंसी को लेकर भले ही सरकार गंभीर हो लेकिन स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह लापरवाह बना हुआ है। करोड़ों के बजट के बाद भी स्थितियां लगातार बिगड़ती जा रही है। एक साल में हाई रिस्क प्रेगनेंसी से पीडि़त महिलाओं में कई गुने का इजाफा हो चुका है। इनको चिंहित करने के लिए सरकार ने गांव-गांव में आशा बहुओं व आंगनबाड़ी कार्यकत्र्रियों को लगा रखा है। ऐसी महिलाओं के खानपान के लिए सरकार अच्छी धनराशि दे रही है। प्रोत्साहन राशि मिलने के बावजूद आशा बहुएं और आंगनबाड़ी कार्यकत्री हाई रिस्क प्रेगनेंसी महिलाओं का पता नहीं लगा पा रही है। इतना ही नहीं जिला अस्पताल में आने वाली गर्भवती महिलाओं का भी पता नहीं लग पा रहा है। स्थिति गंभीर होने पर ऐसे केस को रेफर कर दिया जाता है। गर्भवतियों की जांच के लिए जनवरी-फरवरी 2016 में मातृत्व सप्ताह का प्रदेश के सभी जिलों में आयोजन किया गया। इसमें 16 लाख महिलाओं की जांच हुई। सर्वे में गर्भावस्था के दौरान एक लाख से ज्यादा महिलाओं को हाई रिस्क प्रेगनेंसी की श्रेणी में रखा गया। इसके अलावा इसका सीधा असर होने वाले बच्चों पर पड़ रहा है और करीब 22.5 बच्चे ढाई किलो से भी कम वजन के पैदा हो रहे हैं। वर्ष 2015 में सर्वे किया गया। शासन ने सभी जिलों में वजन दिवस का आयोजन किया था। इस दौरान आंगनबाड़ी केंद्रों पर नवजात से लेकर पांच साल उम्र के बच्चों का वजन तौला गया। इस अभियान में 14.60 लाख अतिकुपोषित बच्चे चिंहित किए गए।

केस-1
मलिहाबाद शंकरपुर निवासी किरन गर्भवती थी। पहला बच्चा होने के कारण परिजन ने शुरू से ही जिला अस्पताल में उसका परीक्षण करा रहे थे। इसके बावजूद डॉक्टर किरन के हाई रिस्क प्रेगनेंसी को ट्रेस नहीं कर पाए। उसका बीपी बढऩे लगा और झटके आने लगे। किरन की जेठानी गुडिय़ा ने बताया कि जिला अस्पताल के बाद डॉक्टर ने हाई रिस्क प्रेगनेंसी का मरीज बताकर किरन को क्वीन मेरी अस्पताल में रेफर कर दिया।

केस-2

इटौंजा सीएचसी से रेफर होकर आई सीमा को भी हाई रिस्क प्रेगनेंसी व एक्लेमसिया की शिकायत होने कारण झटके आने लगे। माल सीएचसी में इलाज होने के बाद भी महिला को न तो एचआरपी के लिए ट्रेस किया गया और न ही महिला के एनीमिक होने के बारे में परिवार को बताया गया। उसे भी हाईरिस्क प्रेगनेंसी बताकर क्वीन मेरी अस्पताल रेफर कर दिया गया। डॉक्टरों के मुताबिक सीमा की हालत नाजुक थी।

क्या कहती है रिपोर्ट
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक हाई रिस्क प्रेगनेंसी और अन्य वजहों से हर पांच मिनट पर एक महिला की मौत होती है। हर साल प्रसव के दौरान पांच लाख 29 हजार महिलाओं की मौत होती है। उनमें एक लाख 36 हजार यानी 25.7 फीसदी मौतें अकेले भारत में होती हैं।

जागरूकता जरूरी: डॉ. रेखा सचान

डॉ. रेखा सचान का कहना है कि हाई रिस्क प्रेगनेंसी से बचने के लिए महिलाओं को जागरूक रहना चाहिए। अगर गर्भवती महिला स्वस्थ नहीं है तो डॉक्टर की देख-रेख में कुछ खास तरह के टेस्ट नियमित रूप से करवाते रहना चाहिए ताकि हाई रिस्क प्रेगनेंसी की स्थिति नहीं बने। गर्भवतियों को हरी सब्जियों व फलों का भरपूर मात्रा में सेवन करना चाहिए। महिला को सक्रिय बने रहना चाहिए ताकि शरीर में मूवमेंट होता रहे। डॉक्टर से परामर्श लेकर कुछ व्यायाम भी करते रहना चाहिए।

राजधानी के सभी अस्पतालों और गावों में एचआरपी ट्रेस की जा रही है, जिन महिलाओं को एचआरपी के कारण क्वीनमेरी रेफर किया गया है वे एचआरपी पंजीकृत थी या नहीं इसका पता तो रजिस्टर देखने के बाद ही चलेगा।
-अजय राजा, एसीएमओ

Back to top button