जानिए रविशंकर प्रसाद, शत्रुघ्न सिन्हा दोनों कभी थे दोस्त अब प्रबल प्रतिद्वंद्वी हैं

मौजूदा लोकसभा चुनाव की शुरुआत से ही पश्चिम बंगाल में सियासी आक्रामकता, कट्टरता और नेताओं की बदजुबानी से अगर आप सचमुच तंग आ गए हैं तो पटना साहिब चले आइए। यहां आपको चुनाव जीतने के सियासी दांव-पेच तो दिख सकते हैं, लेकिन सियासी शालीनता और भाषा का अनुशासन कहीं से भी टूटता नजर नहीं आएगा।

पटना साहिब में 19 मई को मतदान है। यह चुनाव का आखिरी दौर बेशक है, लेकिन दो राष्ट्रीय दलों की प्रतिद्वंद्विता के बीच प्रत्याशियों में घमासान का नया अंदाज भी है।

सदियों पहले दुनिया को सबसे पहले लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाली वैशाली के बगल के संसदीय क्षेत्र में दो राष्ट्रीय पार्टियों में आरपार की लड़ाई है। भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद हैं तो कांग्रेस की ओर से फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा।

दोनों कभी दोस्त थे। दल भी एक था। अब प्रबल प्रतिद्वंद्वी हैं। एक की जीत से दूसरे की हार तय है। इतनी कड़ी और बड़ी लड़ाई में लोग अक्सर भाषा की मर्यादा भूल जाते हैं। धमकी से भी आगे बढ़कर मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। मारपीट और हिंसा तक हो जाती है।

पश्चिम बंगाल तो पटना से बहुत दूर है, बिहार में ही ऐसे कई उदाहरण हैं। चुनावी सत्र में यहां भी कई बार जुबान जहरीली हुई, गाली-गलौज तक हुई। जनसभाओं से मुद्दे गायब हैं। लपलपाती ज़ुबान के रास्ते ही डायनासोर, शुतुरमुर्ग और नाली के कीड़े तक निकल आए हैं।

ऐसे हालात में रविशंकर प्रसाद और शत्रुघ्न सिन्हा का एक दूसरे के प्रति सियासी व्यवहार अन्य क्षेत्रों के प्रतिद्वंद्वियों के लिए सबक की तरह हो सकता है। पटना साहिब के इन दोनों प्रतिद्वंद्वियों का यह आचरण बताता है कि नेता जब शालीन रवैया अपनाते हैं तो उनके कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए भी भाषाई शिष्टता बनाए-बचाए रखना मजबूरी होती है, जबकि बड़बोले और बदजुबान नेताओं के समर्थक भी उसी जुबान में बात करने लगते हैं।

एक दूसरे का नाम लेने से भी परहेज

पटना साहिब में दोनों प्रत्याशी नजीर पेश करते दिख रहे हैं। यहां चुनाव प्रचार के दौरान वाणी में तल्खी नहीं है। व्यवहार में कटुता नहीं है। आचरण में उत्तेजना नहीं है। छिछले स्तर के आरोप-प्रत्यारोप भी नहीं है। यहां तक कि प्रचार के दौरान या जनसभाओं में दोनों एक-दूसरे का नाम लेने से भी परहेज करते दिख रहे हैं। सिर्फ विरोधी दल एवं उसकी नीतियों, योजनाओं एवं कार्यक्रमों की ही आलोचना करते हैं।

दोनों की भाषा उस वक्त भी हद में ही रही, जब 11 मई को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का पटना में रोड शो हुआ और काफिला शत्रुघ्न सिन्हा के मोहल्ले से गुजरा। चुनाव की मुनादी होते ही धीरे-धीरे गंदी होती भाषा के बीच दोनों प्रत्याशियों के वाणी-व्यवहार से सियासी शिष्टाचार नई उम्मीद कर सकता है।

मैदान में आते ही मित्र बताया

दरअसल रविशंकर और शत्रुघ्न दोनों ने चुनाव मैदान में उतरते ही सार्वजनिक कर दिया था कि सियासत की इस रस्साकशी में वे अपने पुराने संबंधों को असहज नहीं होने देंगे। एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाएंगे। पार्टियों और नीतियों की बात तो जरूर होगी, लेकिन परवरिश, परिवेश और परिवार पर चर्चा नहीं करेंगे। दोनों आज तक निभा रहे हैं।

बहरहाल, कमोबेश पूरे देश भर में विषाक्त और कड़वे होते चुनावी माहौल के बीच बिहार की राजधानी में यह विलक्षण नजारा है। पटना इसे महसूस कर रहा है। अन्य प्रत्याशियों को भी सीखने की जरूरत है। निर्वाचन आयोग को भी नोटिस लेकर पूरे देश को प्रेरित-प्रोत्साहित करना चाहिए।

Back to top button